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लालू के ‘साथ’ से भाजपा के भरोसेमंद सिपाही बनने तक, जानिए…कैसा रहा है सम्राट चौधरी का सियासी सफर

सम्राट चौधरी ने 1990 में सक्रिय राजनीति में कदम रखा। उनकी राजनैतिक पारी की शुरुआत लालू प्रसाद यादव की राष्ट्रीय जनता दल (राजद) से हुई। वे 19 मई 1999 को राबड़ी देवी की सरकार में कृषि राज्य मंत्री बने। हालांकि इसको लेकर विवाद भी हुआ।

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बिहार की राजनीति में हाल के वर्षों में जिस नाम ने तेजी से पहचान बनाई है, वह है सम्राट चौधरी। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाते हुए वे आज राज्य की सत्ता के शीर्ष तक पहुंच चुके हैं। सीएम नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद मंगलवार हुई भाजपा विधायक दल की बैठक में सम्राट चौधरी को नेता चुना गया। पार्टी सूत्रों के अनुसार, सम्राट चौधरी बुधवार को सुबह 11 बजे मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे।

सम्राट चौधरी का राजनीतिक सफर कई उतार-चढ़ाव, दल-बदल और विवादों से होकर गुजरा है। राजनीतिक पृष्ठभूमि होने के चलते उन्होंने बचपन में ही सियासत की बारीकियों को सीखना शुरू कर दिया था। उनके पिता शकुनी चौधरी बिहार के प्रभावशाली नेताओं में रहे हैं। वे सात बार विधायक और सांसद रह चुके हैं, जबकि उनकी मां पार्वती देवी भी तारापुर सीट से विधायक रही हैं। यही वजह रही कि सम्राट ने कम उम्र में ही राजनीति का रुख किया।

राबड़ी सरकार में कुछ समय के लिए मंत्री भी रहे

सम्राट चौधरी ने 1990 में सक्रिय राजनीति में कदम रखा। उनकी राजनैतिक पारी की शुरुआत लालू प्रसाद यादव की राष्ट्रीय जनता दल (राजद) से हुई। वे 19 मई 1999 को राबड़ी देवी की सरकार में कृषि राज्य मंत्री बने, जो किसी भी युवा नेता के लिए एक बड़ी उपलब्धि थी। हालांकि कम उम्र के विवाद को लेकर उन्हें पद छोड़ना भी पड़ा।

राजद से अलग होने के बाद उन्होंने जनता दल (यूनाइटेड) का दामन थामा। इसके बाद 2014 में जीतन राम मांझी की सरकार में मंत्री बने। सम्राट को यह कद और पद यूं ही नहीं मिला था। दरअसल इससे पहले उन्होंने 2000 और 2010 में परबत्ता विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीतकर अपनी जमीनी पकड़ साबित की। इसी दौरान वे विधानसभा में विपक्षी दल के मुख्य सचेतक भी बनाए गए। यहीं से धीरे-धीरे उनका राजनीतिक कद बढ़ता गया।

साल 2018 उनके राजनीतिक जीवन का अहम पड़ाव साबित हुआ, जब उन्होंने भाजपा का दामन थामा। भाजपा में आने के बाद उनका कद तेजी से बढ़ा। 2019 में उन्हें प्रदेश उपाध्यक्ष बनाया गया और संगठन में उनकी सक्रियता लगातार बढ़ती गई। सामाजिक समीकरणों पर पकड़ और आक्रामक राजनीतिक शैली ने उन्हें पार्टी के प्रमुख चेहरों में शामिल कर दिया। 2021 में उन्हें पंचायती राज मंत्री बनाया गया, जिससे उन्हें जमीनी स्तर पर काम करने का मौका मिला।

नीतीश के अलग होने के बाद मिला बड़ा मौका

जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भाजपा से अलग होकर राजद के साथ सरकार बनाई, उस दौर में सम्राट चौधरी को विपक्ष की राजनीति में बड़ा मौका मिला। उन्हें विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष बनाया गया। इसी दौरान उन्होंने एक प्रतीकात्मक राजनीतिक संदेश देते हुए सिर पर मुरैठा बांध लिया और कहा कि जब तक नीतीश कुमार सत्ता से बाहर नहीं होंगे, वह इसे नहीं उतारेंगे। इस ऐलान के बाद वे काफी सुर्खियों में आ गए थे।

2023 में, सम्राट चौधरी भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बने। उनके नेतृत्व में, भाजपा ने राज्य में अपनी पकड़ मजबूत की और आने वाले चुनावों के लिए एक मजबूत आधार तैयार किया। जब नीतीश कुमार दोबारा से एनडीए में वापस आए, तो सम्राट चौधरी को 2024 में उपमुख्यमंत्री की जिम्मेदारी सौंपी गई। 20 नवंबर 2025 को उन्होंने फिर उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली।

इसके साथ ही, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उन्हें उप मुख्यमंत्री के साथ गृह मंत्रालय की जिम्मेदारी भी सौंप दी। यह एक ऐतिहासिक क्षण था क्योंकि बिहार में पहली बार हुआ था जब नीतीश कुमार ने सीएम रहते हुए गृह मंत्रालय की जिम्मेदारी छोड़ी थी। अब सीएम के रूप में उनको बड़ी जिम्मेदारी मिलने जा रही है तो आने वाले समय में उनकी भूमिका बिहार की राजनीति को किस दिशा में ले जाएगी, इस पर सबकी नजरें बनी रहेंगी।

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अनिल शर्मा
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...

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