पुणे: महाराष्ट्र के पुणे की एक फैमिली कोर्ट ने 10 साल के लड़के की अंतरिम कस्टडी उसके पिता को सौंप दी है। कोर्ट ने यह फैसला इस आधार पर लिया कि पिता की देखरेख में बच्चे की भलाई, भावनात्मक विकास और भविष्य के हितों की बेहतर सुरक्षा होगी। कोर्ट ने पाया कि मां अपने पति के साथ सम्मान से पेश नहीं आती थीं, घर ठीक से नहीं संभालती थीं और परिवार में अच्छा माहौल बनाए रखने में नाकाम रहीं।
‘गार्जियन्स एंड वार्ड्स एक्ट’ के तहत कस्टडी से जुड़े विवाद पर फैसला सुनाते हुए फैमिली कोर्ट के प्रभारी जज गणेश घुले ने कई बातें कहीं। उन्होंने पति के प्रति मां के व्यवहार, परिवार में उनकी भूमिका और चल रहे वैवाहिक झगड़े का बच्चे पर पड़ने वाले असर पर गौर किया।
पुणे की अदालत ने क्या कहा?
अदालत ने कहा कि आम तौर पर एक पत्नी से यह उम्मीद की जाती है कि वह अपनी शादी की जिम्मेदारियां निभाए, अपने पति का शारीरिक और भावनात्मक रूप से ख्याल रखे, उसकी भलाई का ध्यान रखे, घर में तालमेल बनाए रखे और परिवार का माहौल अच्छा बनाने में योगदान दे। चूंकि मां ऐसा व्यवहार करने में नाकाम रही इसलिए अगर बच्चा ऐसे माहौल में रहता है तो उसका भविष्य सुरक्षित नहीं होगा।
यह विवाद तब शुरू हुआ जब पुणे में रहने वाला परिवार 2022 में सिंगापुर चला गया। बच्चा मार्च 2025 तक अपने माता-पिता के साथ वहीं रहा और पढ़ाई की जिसके बाद मां उसे लेकर भारत लौट आई।
इसके बाद पिता ने बच्चे की कस्टडी पाने के लिए पुणे फैमिली कोर्ट में अर्जी दी। उन्होंने तर्क दिया कि जब वे बिजनेस ट्रिप पर बाहर गए थे तब उनकी सहमति के बिना बच्चे को सिंगापुर से हटा दिया गया था। उन्होंने कहा कि बच्चे का सामान्य निवास स्थान सिंगापुर था जहां उसने अपनी पढ़ाई और रोजमर्रा की जिंदगी में लगभग तीन साल बिताए थे।
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इस अर्जी का विरोध करते हुए मां ने आरोप लगाया कि पिता ने उनके साथ घरेलू हिंसा, भावनात्मक शोषण और बेवफाई की थी। उन्होंने कहा कि बच्चा पुणे में आराम से बस गया है, पढ़ाई में अच्छा प्रदर्शन कर रहा है और उनके साथ ही रहना चाहता है।
नकारात्मक बातें सुनने से बच्चे के दिमाग पर पड़ता है असर
रिकॉर्ड पर मौजूद दलीलों और सबूतों की जांच के बाद कोर्ट को शुरुआती तौर पर ऐसे संकेत मिले कि बच्चे को उसके पिता के खिलाफ भड़काया जा रहा था। कोर्ट ने माना कि पिता के बारे में लगातार नकारात्मक बातें सुनने से माता-पिता और बच्चे के रिश्ते को कभी न ठीक होने वाला नुकसान पहुंच सकता है। कोर्ट ने यह चिंता भी जताई कि अगर बच्चे की कस्टडी मां के पास रहती है तो वह पति-पत्नी के झगड़े में एक मोहरा बन सकता है।
फैमिली कोर्ट ने यह भी गौर किया कि मां का ध्यान आपसी झगड़े को सुलझाने के बजाय कानूनी लड़ाई लड़ने पर ज्यादा था। कोर्ट के मुताबिक एक तरफ तो वह अपने पति से आर्थिक मदद चाहती थी लेकिन दूसरी तरफ उसने सुलह करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई और इसके बजाय पति को दुश्मन की तरह समझा।
सुनवाई के दौरान अदालत ने बच्चे की भावनात्मक परेशानी को दिखाने वाले सबूतों पर भी ध्यान दिया। इस बात को खास अहमियत दी गई कि लड़के ने मौत से जुड़े गाने के बोल लिखे थे; कोर्ट ने इसे गंभीरता से लेने लायक मामला माना। कोर्ट ने कहा कि ऐसे हालात में बच्चे की भावनात्मक और मानसिक भलाई की सुरक्षा के लिए तुरंत दखल देने की जरूरत थी।
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अदालत ने बच्चे की भावनात्मक परेशानी को दिखाने वाले सबूतों पर भी ध्यान दिया। इस बात को खास अहमियत दी गई कि लड़के ने मौत से जुड़े गाने के बोल लिखे थे। कोर्ट ने इसे गंभीरता से लेने लायक मामला माना। कोर्ट ने कहा कि ऐसे हालात में बच्चे की भावनात्मक और मानसिक भलाई की सुरक्षा के लिए तुरंत दखल देने की जरूरत थी।
एक और बात जिस पर कोर्ट ने गौर किया वह यह आरोप था कि मां ने बार-बार पिता और बच्चे के मिलने में रुकावट डाली। इससे ‘पैरेंटल एलियनेशन’ (बच्चे का एक माता-पिता से दूर हो जाना) की स्थिति बनी। हालांकि कोर्ट ने माना कि बच्चे को उसके ननिहाल में प्यार और देखभाल मिलती थी लेकिन उसने यह निष्कर्ष निकाला कि बच्चे की कुल भलाई, पढ़ाई-लिखाई और भविष्य की संभावनाओं को सुरक्षित करने के लिए पिता बेहतर स्थिति में थे।



