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पीएम मोदी ने देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन को दिखाई हरी झंडी; स्पीड, किराया, रूट, कोच से लेकर फ्यूल तक जानिए 5 बड़ी बातें

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A man in traditional Indian attire waves a green flag beside a decorated train during an inauguration ceremony under red and white drapes.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हरी झंडी दिखाने के बाद यह ट्रेन हरियाणा के जींद- सोनीपत रेलखंड पर नियमित रूप से संचालित होगी। IANS

जींद: भारत रेलवे के इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हरियाणा के जींद रेलवे स्टेशन से देश की पहली हाइड्रोजन से चलने वाली पैसेंजर ट्रेन को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। इसके साथ ही भारत हाइड्रोजन ट्रेन का संचालन करने वाले दुनिया के चुनिंदा देशों में शामिल हो गया। अब तक जर्मनी, जापान, चीन और अमेरिका इस तकनीक पर काम कर चुके हैं।

उद्घाटन से पहले देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन को फूलों और रंग-बिरंगे गुब्बारों से आकर्षक ढंग से सजाया गया। जींद रेलवे स्टेशन पर बड़ी संख्या में लोग इस ऐतिहासिक पल के गवाह बनने पहुंचे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हरी झंडी दिखाने के बाद यह ट्रेन हरियाणा के जींद- सोनीपत रेलखंड पर नियमित रूप से संचालित होगी।

हाइड्रोजन ट्रेन के ट्रेन मैनेजर नितिन पारिख ने बताया कि यह 10 कोच वाली दुनिया की सबसे लंबी हाइड्रोजन ट्रेन है। उन्होंने कहा, “यह हाइड्रोजन फ्यूल सेल तकनीक से चलती है और इसके संचालन के दौरान केवल पानी निकलता है, इसलिए यह लगभग प्रदूषण-मुक्त है। भारतीय रेलवे पहले इलेक्ट्रिक, डीजल और सीएनजी ट्रेनों का सफल संचालन कर चुका है, लेकिन यह अपनी तरह की पहली हाइड्रोजन ट्रेन है।”

करीब 89 किलोमीटर लंबे जींद-सोनीपत रेलखंड पर चलने वाली यह ट्रेन 14 स्टेशनों पर रुकेगी और महज पानी की भाप छोड़ते हुए स्वच्छ रेल परिवहन की नई शुरुआत करेगी। आखिर इस ट्रेन में ऐसा क्या खास है कि इसे भारतीय रेलवे के लिए ‘गेमचेंजर’ माना जा रहा है? आइए जानते हैं इसकी 5 बड़ी बातें।

Blue hydrogen-powered passenger train curving along tracks through a green landscape on an overhead-line route.
भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन फोटोः IANS

1. रूट, स्पीड और किराया: 89 किमी का सफर, 14 स्टेशनों पर ठहराव

देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन हरियाणा के जींद जंक्शन से सोनीपत के बीच चलेगी। करीब 89 किलोमीटर लंबे इस रूट पर यह ट्रेन लगभग दो घंटे में सफर पूरा करेगी। रास्ते में जींद सिटी, पांडू पिंडारा, ललित खेड़ा, भंभेवा, इसापुर खेड़ी, बुटाना, खंडराई, गोहाना, रभराह, लाठ, मोहाना, बरवासनी, सोनीपत न्यू और सोनीपत समेत कुल 14 स्टेशनों पर इसका ठहराव होगा।

10 कोच वाली इस ट्रेन में करीब 2,600 यात्री सफर कर सकेंगे। इसकी अधिकतम परिचालन गति 75 किलोमीटर प्रति घंटा होगी, जबकि डिजाइन स्पीड 110 किलोमीटर प्रति घंटा रखी गई है। रेलवे ने शुरुआती चरण में इसका किराया 5 रुपये से 25 रुपये के बीच रखा है। ट्रेन प्रतिदिन दो फेरे लगाएगी और रोजाना करीब 356 किलोमीटर की दूरी तय करेगी।

Interior of a train car with blue seats facing each other along a central aisle, windows on the sides.
Indias first hydrogen powered train

2. आखिर हाइड्रोजन ट्रेन चलती कैसे है?

इस ट्रेन में पारंपरिक डीजल इंजन नहीं है। यह प्रोटॉन एक्सचेंज मेम्ब्रेन (PEM) फ्यूल सेल तकनीक पर आधारित है। ट्रेन में मौजूद सिलेंडरों में भरी हाइड्रोजन हवा में मौजूद ऑक्सीजन के साथ रासायनिक प्रतिक्रिया करती है। इसी प्रक्रिया से बिजली पैदा होती है, जो मोटरों को चलाकर ट्रेन को गति देती है।

सबसे बड़ी बात यह है कि इस प्रक्रिया में कार्बन डाइऑक्साइड, धुआं या अन्य प्रदूषक गैसें नहीं निकलतीं। उप-उत्पाद के रूप में केवल पानी की भाप और थोड़ी गर्मी निकलती है। यही कारण है कि इसे रेलवे के लिए सबसे स्वच्छ और पर्यावरण अनुकूल तकनीकों में माना जा रहा है।

हाइड्रोजन की ऊर्जा क्षमता भी डीजल से कहीं अधिक है। जहां डीजल की ऊर्जा क्षमता करीब 43 मेगाजूल प्रति किलोग्राम होती है, वहीं हाइड्रोजन की क्षमता लगभग 120 मेगाजूल प्रति किलोग्राम है।

Diagram of a proton-exchange membrane fuel cell showing H2 input, O2 input, anode, cathode, and electrolyte with water byproduct.
image 2

3. फ्यूल कहां से आएगा?

इस परियोजना के लिए हरियाणा के जींद में देश का पहला और सबसे बड़ा रेलवे हाइड्रोजन स्टोरेज एवं रिफ्यूलिंग स्टेशन बनाया गया है। यहां पानी को इलेक्ट्रोलिसिस प्रक्रिया से हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में अलग किया जाता है। तैयार हाइड्रोजन को उच्च दबाव वाले टैंकों में सुरक्षित रखा जाता है और फिर विशेष रिफ्यूलिंग स्टेशन के जरिए ट्रेन में भरा जाता है।

इस केंद्र में एक बार में करीब 3,000 किलोग्राम हाइड्रोजन स्टोर की जा सकती है। फिलहाल सामान्य रेलवे स्टेशनों पर हाइड्रोजन फ्यूल स्टेशन नहीं बनाए गए हैं। पायलट प्रोजेक्ट के तहत यह पूरी व्यवस्था केवल जींद में विकसित की गई है। एक बार फ्यूल भरने पर ट्रेन करीब 356 किलोमीटर तक चल सकती है।

Hydrogen facility at Jind: storage area with red cylinders in yellow racks (top left) and a view of the site with a blue building (top right). Safer, concise alt texts for each panel: Storage racks with red gas cylinders; Facility exterior with equipment and blue structure; White H2 compressor container; Hydrogen dispenser setup at station.
जिंद में हाइड्रोजन स्टोरेज एवं रिफ्यूलिंग स्टेशन PIB

4. सुरक्षा के लिए क्या इंतजाम हैं?

हाइड्रोजन अत्यधिक ज्वलनशील गैस है, इसलिए रेलवे ने इस परियोजना में सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। ट्रेन और रिफ्यूलिंग स्टेशन पर हाइड्रोजन लीकेज डिटेक्टर, फ्लेम डिटेक्टर, ऑटोमैटिक गैस कट-ऑफ सिस्टम और 24 घंटे निगरानी की व्यवस्था की गई है। अगर कहीं गैस रिसाव, धुआं या अधिक तापमान का पता चलता है तो सिस्टम अपने आप हाइड्रोजन की सप्लाई बंद कर देगा।

रेलवे बोर्ड ने फैसला किया है कि शुरुआती तीन महीनों तक हर यात्रा में प्रशिक्षित तकनीकी विशेषज्ञों की टीम ट्रेन के साथ रहेगी, ताकि किसी भी तकनीकी समस्या का तुरंत समाधान किया जा सके। लोको पायलट को पूरी प्रणाली की रियल-टाइम जानकारी देने के लिए विशेष मॉनिटरिंग सिस्टम भी लगाया गया है।

Interior of a maintenance compartment with red insulated pipes, metal walls, and two large front-loading machines in the foreground; a rack of circular components sits at the far end under various warning signs.

5. क्यों है यह रेलवे के लिए गेमचेंजर? लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं

भारतीय रेलवे अभी भी हजारों किलोमीटर लंबे नेटवर्क पर डीजल इंजनों का इस्तेमाल करती है। इससे हर साल बड़ी मात्रा में कार्बन उत्सर्जन होता है और कच्चे तेल के आयात पर भी भारी खर्च आता है।

हाइड्रोजन ट्रेनें इन दोनों समस्याओं का समाधान पेश करती हैं। इनमें न तो डीजल जलता है और न ही लगातार ओवरहेड बिजली लाइनों की जरूरत होती है। ट्रेन अपने भीतर मौजूद फ्यूल सेल से खुद बिजली तैयार करती है। इससे प्रदूषण कम होगा, ईंधन आयात पर निर्भरता घटेगी और गैर-विद्युतीकृत रेल मार्गों पर भी स्वच्छ परिवहन का विकल्प मिलेगा।

हालांकि, इस तकनीक के सामने चुनौतियां भी हैं। ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन अभी काफी महंगा है। इसके अलावा हाइड्रोजन स्टोरेज, रिफ्यूलिंग स्टेशन और सुरक्षा संबंधी बुनियादी ढांचा तैयार करने में भी बड़ा निवेश करना पड़ता है। यही वजह है कि फिलहाल इसे पायलट प्रोजेक्ट के रूप में शुरू किया गया है। अगर यह सफल रहता है, तो आने वाले सालों में भारतीय रेलवे डीजल इंजनों की जगह बड़े पैमाने पर हाइड्रोजन ट्रेनों का इस्तेमाल कर सकती है।

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अनिल शर्मा
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...

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