जो जन्मा है, उसकी मृत्यु भी होगी, इस शाश्वत सत्य को शास्त्रीय गायक पंडित अमियो रंजन बंद्योपाध्याय ने आत्मसात कर लिया था। तभी तो फरवरी में अपना सौवें जन्मदिन को उन्होनें लाइव कॉन्सर्ट के रुप में तब्दील कर दिया था। उस दिन कलकत्ता के रामकृष्ण मिशन संस्कृति संस्थान के विवेकानंद हॉल में धोती-कुर्ता पहने जिस आत्मविश्वास के साथ पंडित अमियो रंजन ने मंच पर कदम रखा, वह सौवां जन्मदिन मना रहे किसी दूसरे व्यक्ति की नही हो सकता।
दरअसल उनके शिष्य / प्रशंसकों के बीच हर साल जन्मदिन मनाने वाले पंडित अमियो रंजन बंद्योपाध्याय का यह आत्मविश्वास ही उनकी पहचान बन चुका था। सौवा जन्मदिन आते आते वह मृत्यु से आत्म-संवाद कर, जीवन के इस दूसरे छोर याकि अन्तिम छोर को लगभग छकाने के मूड में थे।
पंडित अमियो रंजन बंद्योपाध्याय ने उस दिन एकताल राग में बिहाग के एक बड़े ख्याल से शुरुआत करते हुए, उस राग की मार्मिकता को असाधारण कुशलता से प्रस्तुत किया। इसके बाद उन्होंने द्रुत तीनताल प्रस्तुत किया। बड़े स्वर संक्षिप्त लेकिन विस्मयकारी थे। बिना किसी दोहराव के, उन्होंने राग के विभिन्न रंगों को उजागर किया और उन्हें कोमल मींडों के साथ प्रेमपूर्वक पिरोया।
मृत्यु को जैसे उन्होनें इस शर्त पर राजी कर लिया था कि इस दुनिया से जाऊंगा लेकिन स्वयं के तयशुदा दिन और उन्होनें वह दिन गुरु पूर्णिमा का चुना । गुरु पूर्णिमा के दिन 28 जुलाई की दोपहर 2.30 पंडित अमियो रंजन बंद्योपाध्याय धीरे से इस फानी दुनिया से रुखसत हो गये।
पंडित अमियो रंजन बंद्योपाध्याय का जन्म 21 फ़रवरी 1927 को कोलकाता के एक प्रतिष्ठित संगीत परिवार में हुआ। यह परिवार बंगाल की उस गौरवशाली संगीत-परंपरा का प्रतिनिधि था, जिसने बिष्णुपुर घराने को न केवल संरक्षित किया, बल्कि उसे समृद्ध भी बनाया। उनके पिता संगीताचार्य सत्य किंकर बंद्योपाध्याय स्वयं विख्यात संगीतज्ञ थे और बालक अमियो के प्रथम गुरु भी। घर का वातावरण ही उनका पहला संगीत विद्यालय था, जहाँ रियाज़ केवल दैनिक अभ्यास नहीं, बल्कि जीवनचर्या का अभिन्न अंग था।
किशोरावस्था से ही उनके भीतर असाधारण संगीत-प्रतिभा के संकेत दिखाई देने लगे थे। किंतु प्रतिभा के साथ-साथ उनमें सीखने की विनम्रता और साधना की अद्भुत क्षमता भी थी। वे घंटों रियाज़ करते, बंदिशों के अर्थ पर विचार करते और रागों की सूक्ष्मताओं को आत्मसात करने का प्रयास करते। संगीत उनके लिए केवल स्वर-संयोजन नहीं था; वह भारतीय दर्शन, साहित्य और आध्यात्मिक चेतना से जुड़ा हुआ एक व्यापक सांस्कृतिक अनुभव था।
बिष्णुपुर घराना हिंदुस्तानी संगीत के इतिहास में अत्यंत विशिष्ट स्थान रखता है। इसकी जड़ें ध्रुपद की गंभीर परंपरा में हैं और इसकी सबसे बड़ी विशेषता है, राग की शुद्धता, भाव की गरिमा तथा प्रस्तुति का संतुलित सौंदर्य। इस घराने में राग को कभी चमत्कार का माध्यम नहीं बनाया गया; उसे आत्मानुभूति और सौंदर्यबोध का विषय माना गया। पंडित अमियो रंजन बंद्योपाध्याय ने इसी परंपरा को अपने व्यक्तित्व और गायन का मूलाधार बनाया था।
उनकी शिक्षा केवल पारंपरिक गुरु-शिष्य परंपरा तक सीमित नहीं रही। उन्होंने आधुनिक विश्वविद्यालयीय शिक्षा के साथ भारतीय संगीत के इतिहास, सिद्धांत और सौंदर्यशास्त्र का गंभीर अध्ययन किया। यही कारण है कि आगे चलकर वे केवल मंचीय कलाकार नहीं रहे, बल्कि संगीत के गंभीर चिंतक और विद्वान के रूप में भी प्रतिष्ठित हुए। उनके व्यक्तित्व में परंपरा और आधुनिक बौद्धिक दृष्टि का दुर्लभ संगम दिखाई देता है।

बिष्णुपुर घराने की गायकी अपने संयम, राग की शुद्धता, ध्रुपदांग की गंभीरता और शब्दों की स्पष्टता के लिए जानी जाती है। पंडित अमियो रंजन ने इस परंपरा को अक्षुण्ण रखते हुए उसमें अपनी वैचारिक गहराई भी जोड़ी। उनके गायन में राग का विस्तार अत्यंत धैर्य के साथ विकसित होता था। प्रत्येक स्वर अपने उचित स्थान पर स्थापित होता, प्रत्येक मींड राग के भावलोक को विस्तार देती और प्रत्येक तान राग की प्रकृति के अनुरूप ही आकार ग्रहण करती। वे मानते थे कि कलाकार का दायित्व राग पर अपनी छाप छोड़ना नहीं, बल्कि राग के स्वभाव को पूरी ईमानदारी से प्रकट करना है।
उनकी प्रस्तुतियों में कभी भी अनावश्यक चमत्कार या प्रदर्शन की आकांक्षा दिखाई नहीं देती थी। यही कारण था कि संगीत के गंभीर रसिक उनके गायन को केवल सुनते नहीं थे, बल्कि उसे आत्मसात करते थे। उनकी विलंबित ख़याल की प्रस्तुति विशेष रूप से उल्लेखनीय थी, जिसमें राग का क्रमिक विकास, स्वर-सौंदर्य की सूक्ष्मता और लय का संतुलन श्रोताओं को एकाग्र होकर सुनने के लिए विवश कर देता था। द्रुत रचनाओं में भी उनका नियंत्रण और सौंदर्यबोध समान रूप से प्रभावशाली रहता था।
यदि पंडित अमियो रंजन बंद्योपाध्याय के व्यक्तित्व को केवल एक उत्कृष्ट ख़याल गायक के रूप में देखा जाए, तो यह उनके बहुआयामी योगदान के साथ अन्याय होगा। वे उन विरल संगीताचार्यों में थे जिनके भीतर कलाकार, गुरु, शोधकर्ता, लेखक और चिंतक एक साथ विद्यमान थे। उनके लिए संगीत केवल मंचीय प्रस्तुति का विषय नहीं था; वह भारतीय ज्ञान-परंपरा का जीवंत विस्तार था। इसी कारण उनकी साधना का प्रभाव केवल श्रोताओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने संगीत शिक्षा, शोध और सांस्कृतिक विमर्श को भी समृद्ध किया।
उनकी संगीत-दृष्टि का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष था—शिक्षा। उन्होंने संगीत को केवल गुरु-शिष्य परंपरा तक सीमित रखने के पक्ष में नहीं, बल्कि उसके गंभीर अकादमिक अध्ययन के भी समर्थक रहे। यही कारण है कि उन्होंने लंबे समय तक रवीन्द्र भारती विश्वविद्यालय में अध्यापन किया और संगीत विभाग के विकास में उल्लेखनीय भूमिका निभाई। विभागाध्यक्ष एवं प्राध्यापक के रूप में उन्होंने असंख्य विद्यार्थियों को केवल गायन नहीं सिखाया, बल्कि उन्हें संगीत को समझने, उसका विश्लेषण करने और उसके सांस्कृतिक संदर्भों को पहचानने की दृष्टि भी प्रदान की।
उनकी कक्षाएँ केवल रागों की शिक्षा तक सीमित नहीं रहती थीं। वे संगीत के इतिहास, साहित्य, दर्शन और सौंदर्यशास्त्र पर भी समान अधिकार के साथ चर्चा करते थे। विद्यार्थियों को वे बार-बार यह समझाते थे कि यदि कलाकार का बौद्धिक संसार विस्तृत नहीं होगा, तो उसकी कला भी सीमित रह जाएगी। यही कारण है कि उनके अनेक शिष्य आज उत्कृष्ट कलाकार होने के साथ-साथ अध्यापक, शोधकर्ता और संगीत-चिंतक के रूप में भी प्रतिष्ठित हैं।
पंडित अमियो रंजन बंद्योपाध्याय का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण पक्ष उनका संगीत-लेखन है। उन्होंने भारतीय संगीत के सौंदर्यशास्त्र पर गंभीर चिंतन किया और कई महत्त्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की। उनकी पुस्तकें केवल संगीत विद्यार्थियों के लिए पाठ्य सामग्री नहीं हैं, बल्कि भारतीय संगीत के दार्शनिक आधार को समझने का प्रामाणिक माध्यम भी हैं। उन्होंने संगीत को केवल श्रव्य कला के रूप में नहीं देखा; उनके लिए वह मनुष्य की संवेदना, संस्कृति और आत्मानुभूति का समन्वित रूप था।
पंडित अमियो रंजन बंद्योपाध्याय के संगीत-लेखन से यह स्पष्ट बयां होता है कि परंपरा के समर्थक अवश्य थे, किंतु परंपरा के नाम पर जड़ता के पक्षधर नहीं थे। उनका मानना था कि संगीत का विकास तभी संभव है जब कलाकार अपनी विरासत का सम्मान करते हुए समय की चुनौतियों को भी समझे। इसलिए वे नवाचार का विरोध नहीं करते थे, बल्कि यह आग्रह करते थे कि हर नया प्रयोग शास्त्रीय आधार और सौंदर्यबोध से जुड़ा होना चाहिए।
बीसवीं शताब्दी का मध्य भारतीय शास्त्रीय संगीत के लिए संक्रमण का काल था। दरबारी संरक्षण समाप्त हो रहा था, आकाशवाणी नई भूमिका निभा रही थी और संगीत विश्वविद्यालयों के माध्यम से अकादमिक अध्ययन का विषय बन रहा था। ऐसे समय में पंडित अमियो रंजन बंद्योपाध्याय ने इस परिवर्तन को केवल देखा ही नहीं, बल्कि उसकी दिशा भी निर्धारित की। आकाशवाणी और दूरदर्शन के शीर्ष श्रेणी के कलाकार के रूप में उन्होंने अनेक ऐतिहासिक प्रस्तुतियाँ दीं। देश के प्रमुख संगीत समारोहों में उनकी उपस्थिति श्रोताओं के लिए विशेष आकर्षण होती थी। विदेशों में भी उन्होंने भारतीय शास्त्रीय संगीत की गरिमा का प्रतिनिधित्व किया और यह सिद्ध किया कि राग-संगीत की भाषा सीमाओं से परे मानव संवेदना की सार्वभौमिक भाषा है।
असाधारण विनम्र, साधना और अनुशासित अमियो रंजन बंद्योपाध्याय अन्तिम सांस तक स्वयं को विद्यार्थी मानते रहे। संगीत के प्रति यही विनम्रता उन्हें अपने समकालीनों से विशिष्ट बनाती है।
उनकी शतायु अवस्था तक सक्रिय संगीत-साधना ने उन्हें भारतीय संगीत-जगत में एक जीवित किंवदंती का स्थान दिलाया। सौवे जन्मदिन के अवसर पर उनकी स्वर-साधना, राग-बोध और मानसिक सजगता ने सभी को विस्मित किया। यह उनकी ससत साधना का परिणाम था ।
स्वर-साधना के इस शताब्दी पुरुष का सौ साल का जीवन यह बताने के लिए पर्याप्त है कि महान कलाकार केवल अपनी कला से महान नहीं बनता; वह अपने विचार, अपने आचरण, अपने शिष्यों और अपने सांस्कृतिक उत्तरदायित्व से भी महान बनता है।
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