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दृश्यम: जबलपुर में बाल रंगमंच की नई उड़ान- रंगशिविरों में खिल रहा है बचपन

जबलपुर की सशक्त रंगपरंपरा अब बच्चों की मुस्कान, कल्पना और रचनात्मकता में अपना भविष्य तलाश रही है। साहित्य, शास्त्रीय रंगधारा और समकालीन सामाजिक सरोकारों से बच्चों को जोड़ते ये शिविर न केवल नई पीढ़ी के कलाकार तैयार कर रहे हैं, बल्कि आत्मविश्वासी, संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक भी गढ़ रहे हैं। गर्मी की छुट्टियों में आयोजित विवेचना, समागम और रंगाभरण थिएटर ग्रुप के रंगशिविर ने यह साबित कर दिखायाते कि रंगमंच केवल अभिनय के प्रशिक्षण का नाम नहीं ; बल्कि अभिव्यक्ति, संवेदना, संस्कृति और जीवन-मूल्यों का सशक्त विद्यालय होता है। साहित्य, शास्त्रीय रंगधारा और समकालीन सामाजिक सरोकारों से बच्चों को जोड़ते ये शिविर न केवल नई पीढ़ी के कलाकार तैयार कर रहे हैं, बल्कि आत्मविश्वासी, संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक भी गढ़ रहे हैं।

जबलपुर में नाटक करना और देखना एक सजीव परंपरा है। जबलपुर के रंगकर्म की तूती पूरे देश में बजती है। यही परंपरा अब नई पीढ़ी तक पहुँच रही है और बच्चों के लिए आयोजित रंगकर्म शिविर इस सांस्कृतिक सेतु का महत्वपूर्ण माध्यम बन रहे हैं। गर्मी की छुट्टियों में आयोजित इन शिविरों ने बच्चों के लिए सीखने, समझने और स्वयं को अभिव्यक्त करने के नए द्वार खोले हैं। गर्मी की छुट्टियों पर आयोजित ये शिविर बच्चों के व्यक्तित्व विकास, आत्मविश्वास और रचनात्मक अभिव्यक्ति के लिए एक सशक्त माध्यम बनते जा रहे हैं। रंगमंच केवल अभिनय सीखने का मंच नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की कला भी सिखाता है। जब बच्चे किसी पात्र को आत्मसात करते हैं, उसके भावों और परिस्थितियों को समझते हैं, तब उनमें संवेदनशीलता, अनुशासन और टीम भावना का विकास होता है। वे संवाद बोलना ही नहीं सीखते, बल्कि सुनने, समझने और सामूहिक रूप से कार्य करने की क्षमता भी अर्जित करते हैं। पिछले दो तीन वर्षों से जिस तरह से जबलपुर में बाल रंगमंच फल फूल रहा है उसकी ओर पूरे देश के रंगकर्म की निगाह बनी रहती है।

पिछले वर्ष की गर्मी की तरह इस बार भी गर्मियों की छुट्टि‍यों में इस वर्ष जबलपुर के विभिन्न रंग समूहों ने बाल रंगमंच की संभावनाओं को नई ऊर्जा प्रदान की है। विवेचना थिएटर ग्रुप ने वरिष्ठ साहित्यकार नरेश जैन की चर्चित कहानी ‘ये कुत्ता किसका है’ का नाट्य रूपांतरण प्रस्तुत किया, जिसने बच्चों और युवाओं को साहित्य और रंगमंच के अंतर्संबंधों से परिचित कराया। वहीं समागम रंगमंडल ने संस्कृत नाट्य परंपरा के महत्त्वपूर्ण रचनाकार महाकवि भास के प्रसिद्ध नाटक ‘मध्यम व्यायोग’ का मंचन कर नई पीढ़ी को भारतीय शास्त्रीय रंगधारा से जोड़ने का सराहनीय प्रयास किया। दूसरी ओर रंगाभरण थियेटर ग्रुप की प्रस्तुति ‘खुल जा सिम सिम’ ने बालमन की कल्पनाशीलता, मनोरंजन और सीख को एक साथ मंच पर साकार किया।

तीनों संस्थाओं के श‍िविरों में खास बात यह रही कि पिछले वर्ष इस प्रकार के श‍िविर में शामिल हुए अध‍िकांश बच्चों ने इस बार के श‍िविर में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया। जबलपुर की तीनों नाट्य संस्थाओें के श‍िविर में शामिल बच्चों की शैक्षण‍िक, सामाजिक, आर्थि‍क, सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, परिवेश व बुद्ध‍िमत्ता बिल्कुल अलग-अलग रही।

Group of children in traditional robes performing on a theater stage, holding swords and props with a colorful backdrop and stone set piece.

विवेचना थियेटर ग्रुप के श‍िविर में 8 से 16 साल के 18 बच्चों ने हिस्सा लिया। शिविर का निर्देशन युवा रंगकर्मी आदित्य रूसिया ने किया। शिविर में बच्चों को रंगमंच की बारीकियों के साथ थियेटर गेम्स और थियेटर इम्प्रोवाईजेशन के माध्यम से रंगमंच से परिचित कराया गया। बच्चों को संगीत की प्रारंभिक शिक्षा सुरों का ज्ञान कराया गया। बच्चों को चित्रकला और क्राफ्ट की कलाओं से परिचित कराया गया। एक तरह से बच्चों को शिविर में कलाओं की विविध विधाओं से परिचय मिला। पूरे माह बच्चों ने नाटक की रिहर्सल की। उन्हें जानकारी मिली कि नाटक के कॉस्ट्यूम, मेकअप, लाइट व साउंड का क्या महत्व है। एक माह के सघन प्रशिक्षण के बाद बच्चों ने एक हास्य व्यंग्य नाटक ‘ये कुत्ता किसका है ?’ नाटक गांव के परिवेश का था और गांवों में छुआछूत और ग्रामीणों की चालाकियों पर कटु प्रहार करता नज़र आया। एक मरे कुत्ते के आसपास घूमते इस नाटक को देखकर महसूस हुआ कि भारतीय समाज अभी भी पुरानी परंपरा से कितना घि‍रा हुआ है। समापन अवसर पर बच्चों द्वारा शंकर शैलेन्द्र का गीत- ‘तू जिन्दा है तू जिन्दगी की जीत पर यकीन कर, जीवन यदु का गीत- जब तक रोटी के प्रश्नों पर रखा रहेगा भारी पत्थर और दुष्यंत कुमार का गीत- ले मशालें चल पड़े हैं लोग मेरे गांव के’ प्रस्तुत करके जनगीत को साकार कर दिया।

समागम रंगमंडल पिछले कुछ वर्षों से नियमित पेशेवर रंगकर्म के अलावा चिल्ड्रन थ‍ियेटर क्लब के माध्यम से बच्चों व लेडिज थ‍ियेटर क्लब से महिलाओं के लिए सुव्यवस्थि‍त रूप से थ‍ियेटर कक्षाओं को आयोजित कर रही है। समागम रंगमंडल अपने वरिष्ठ व अनुभवी रंगकर्मियों को उनके सामूहिक कार्य से बच्चों व महिलाओं के रंगकर्म से जोड़कर अनोखा प्रयोग कर रही है। समागम रंगमंडल ने इस बार बच्चों से महाकवि भास का संस्कृत नाटक ‘मध्यम व्यायोग’ का मंचन करवाया। यह नाटक वीर रस, करुण रस और पारिवारिक संवेदनाओं का अत्यंत प्रभावशाली समन्वय प्रस्तुत करता है।

इस नाटक की कथा महाभारत के वनपर्व से प्रेरित है। कथा का केंद्र बिंदु भीमसेन और उनके पुत्र घटोत्कच का अप्रत्याशित मिलन है। कहानी के अनुसार, एक ब्राह्मण परिवार जंगल से गुजर रहा होता है। उसी समय राक्षसपुत्र घटोत्कच अपनी माता हिडिम्बा के लिए मनुष्य-भोजन की खोज में निकलता है और उस परिवार के एक सदस्य को अपने साथ चलने के लिए कहता है। परिवार का प्रत्येक सदस्य स्वयं को बलिदान करने के लिए तैयार हो जाता है, किंतु अंततः मध्यम पुत्र को भेजने का निर्णय होता है। इसी कारण नाटक का नाम ‘मध्यम व्यायोग’ पड़ा। उसी समय भीम वहाँ पहुँचते हैं और ब्राह्मण परिवार की रक्षा के लिए स्वयं घटोत्कच के साथ जाने का निश्चय करते हैं। पिता और पुत्र एक-दूसरे को पहचान नहीं पाते हैं और उनके बीच संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। बाद में हिडिम्बा के आने पर दोनों का परिचय होता है और अत्यंत मार्मिक पुनर्मिलन होता है।

‘मध्यम व्यायोग’ को संस्कृत नाट्य साहित्य की श्रेष्ठ कृतियों में गिना जाता है। यह न केवल भास की नाट्य-कौशल का परिचायक है, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों, परोपकार, पारिवारिक प्रेम और धर्मनिष्ठा को भी उजागर करता है।

मध्यम व्यायोग नाटक मंचन की दृष्ट‍ि से कोई आसान नाटक नहीं है। जब इस नाटक का मंचन बच्चों से करवाना हो तो चुनौती और बढ़ जाती है। इस चुनौती को आशीष पाठक व स्वाति सहर्ष स्वीकार करके बच्चों से ऐसा काम करवाते हैं जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती है। निर्देशक स्वाति ने नाटक की अद्भुत डिजाइनिंग की है। नाट्य मंचन के प्रत्येक तत्व अभ‍िनय, गीत-संगीत, लाइट्स, वेशभूषा में कोई दोष नहीं दिखता है। फिन‍िश‍िंग बेमिसाल है। नाटक देखकर महसूस होता है कि निर्देशक और कलाकारों ने खूब मेहनत की है। बच्चों का मंच पर अनुशासन देखते ही बनता है। नाटक में अभ‍िनय कर रहे सभी बच्चे ईमानदारी से अपने पात्रों को जीते हुए नज़र आते हैं।

रंगाभरण थि‍येटर ग्रुप और निर्देशक अक्षय सिंह ठाकुर जबलपुर के प्रोजेक्ट फ्लैशलाइट्स के साथ मिलकर पिछले तीन वर्षों से विकास से कोसों दूर शहरी बस्त‍ियों में रहने वाले बच्चों के साथ रंगकर्म कर रहे हैं। शहरी बस्ति‍यों में रहने वाले यह बच्चे निर्धन परिवार के हैं। नाटक में काम कर रहे अध‍िकांश बच्चे निरक्षर हैं। वे स्क्रि‍प्ट पढ़ नहीं पाते और न ही एक अक्षर लिखने की उनकी क्षमता है। ऐसे बच्चों को नाटक के संवाद याद करवाना एक मुश्क‍िल काम है। प्रतिदिन बच्चों को रिहर्सल में लाना उससे भी कठिन काम रहा। इस प्रकार अक्षय सिंह ठाकुर ने बहुत चुनौतीपूर्ण परिस्थि‍तियों में बच्चों से ‘खुल जा सिम सिम’ नाटक में जो अभ‍िनय कराया है वह दिल को छू लेता है।

Large auditorium filled with a diverse crowd seated in rows, facing a stage on the right with colorful flower decorations.

अक्षय सिंह ठाकुर जब बच्चों के साथ काम करने आए, तब उनके पास कोई स्क्रि‍प्ट नहीं थी। बच्चों के साथ बातचीत करते हुए उन्हें महसूस हुआ कि बचपन केवल उम्र का एक पड़ाव नहीं, बल्क‍ि सपनों, कल्पनाओं, खेल और सीखने की सबसे सुंदर दुनिया है। जब किसी बच्चे से उसका ख‍िलौना, उसकी किताब या उसकी मुस्कान छिन जाती है, तो केवल एक वस्तु नहीं खोती, बल्क‍ि उसके सपनों का एक हिस्सा भी उससे दूर हो जाता है। इस बात को ध्यान में रखकर अक्षय सिंह ठाकुर ने प्रसिद्ध अरेबियन कहानी ‘खुल जा सिम सिम’ में परिवर्तन करके एक विचार को जन्म दिया और बच्चों के माध्यम से उसको मंच पर उतारा। ‘खुल जा सिम सिम’ बच्चों की दुनिया से जोड़ते हुए एक नए दृष्टि‍कोण के साथ प्रस्तुत करती है। इस नाटक में गुफा का खज़ाना सोना-चांदी का नहीं, बल्क‍ि बच्चों की खुश‍ियां हैं। उनकी किताबें, ख‍िलौने, पतंगें, खेल और सपने। चोर केवल कहानी के खलनायक नहीं हैं, बल्क‍ि वे उन सभी शक्तियों का प्रतीक हैं, जो बच्चों से उनका बचपन, उनकी श‍िक्षा और उनकी खुश‍ियां छीनने का प्रयास करती हैं।

अक्षय सिंह ठाकुर का कहना है कि ‘खुल जा सिम सिम’ नाट्य प्रस्तु‍ति का उद्देश्य मनोरंजन नहीं, बल्क‍ि बच्चों और दर्शकों तक एक महत्वपूर्ण संदेश पहुंचाना है कि सबसे बड़ा खज़ाना धन नहीं, श‍िक्षा है। ख‍िलौने हमें खुशी दे सकते हैं, लेकिन किताबें हमें भविष्य देती हैं। ज्ञान हमें सोचने, समझने और बेहतर समाज बनाने की शक्ति देता है।

इस नाट्य प्रस्तुति की खास बात यह थी कि नाटक का विषय केवल एक कहानी नहीं, बल्क‍ि इसमें अभ‍िनय करने वाले बच्चों और उनके अभ‍िभावकों के जीवन से गहराई से जुड़ा हुआ है। यह नाटक गंदी बस्त‍ियों के बच्चों के लिए अभ‍िनय नहीं, बल्क‍ि स्वयं को समझने, व्यक्त करने और अपने भीतर की छिपी संभावनााओं को पहचानने का एक माध्यम भी बना।

‘खुल जा सिम सिम’ नाटक प्रस्तुति न सिर्फ गुदगुदाती है, बल्क‍ि अपने मूल संदेश को आसानी से लोगों तक पहुंचाती है। बच्चों ने अपने संवेदनशील अभ‍िनय से नाटक के मूल भाव को सम्प्रेषि‍त करने में पूर्णत: सफल रहे। रंगाभरण थि‍येटर ग्रुप और निर्देशक अक्षय सिंह ठाकुर ने इन बच्चों के साथ जिस प्रकार की मेहनत की है वहा काबिले तारीफ़ है।

रंगाभरण थ‍ियेटर ग्रुप की प्रस्तुति ‘खुल जा सिम सिम’ का निर्देशन करते वक्त अक्षय सिंह ठाकुर को जिन चुनौतियों का सामना करना पड़ा उनका जिक्र करना जरूरी हो जाता है। इस नाटक में अभ‍िनय करने वाले अध‍िकांश बच्चे 13 साल से छोटे थे। ये सब बच्चे जबलपुर के सूरतलाई से दीनदयाल चौक के आसपास रहते हैं। उनके घर के पास ही गायत्री मंदिर के नजदीक एक स्कूल में रिहर्सल करना तय किया गया। अक्षय सिंह ठाकुर ने जब श‍िविर की शुरुआत की तब ही वे विचार कर रहे थे कि बच्चों की समस्या पर ही कोई नाटक तैयार करेंगे। बच्चों के साथ दो-तीन दिन बात करने के बाद उनको समझ में आ गया कि बच्चों की सबसे बड़ी समस्या श‍िक्षा है।

नाटक में मुख्य भूमिका निभाने वाले कार्तिक नट का श‍िविर में आने का यह दूसरा वर्ष था। कार्तिक नट के माता-पिता नहीं हैं। वह दादी के साथ रहता है। कार्तिक तीन भाई-बहिन है। अध‍िकांश बच्चे अपने छोटे भाई-बहनों की घर में देखभाल करते हैं या संभालते हैं। इनमें भी अध‍िकांश परिवार के लिए भीख मांगते हैं। श‍िविर के लिए जब फ्लैश लाइट ने बच्चों को एकत्र‍ित करना शुरु किया तब कार्तिक नट की दादी ने उसे श‍िविर में भेजने के लिए साफ रूप से मना कर दिया। किसी तरह दादी को मनाया गया। श‍िविर में शामिल हुए अध‍िकांश बच्चों के साथ ऐसा ही किस्सा था।

बच्चों को अलीबाबा 40 चोर की रील दिखाकर नाटक को तैयार किया गया। जैसा की जिक्र किया गया है कि बच्चे पढ़ नहीं पाते थे, इसलिए बच्चों के समक्ष पहले संवाद पढ़कर सुनाए जाते थे जिसको वे याद कर लेते थे। बच्चों की ग्रहणशक्ति अच्छी थी। संवाद बोलने के तरीके पर वे निर्देशक से पूछते थे-‘’भैया कल वाले या परसों वाले तरीके से बोलें।‘’

Group of performers in bright traditional Indian attire dancing on a stage with red and blue curtains behind them.

निर्देशक अक्षय सिंह‍ अपने प्रत्येक नाटक में पंच डालते हैं। खुल जा सिम सिम में भी उन्होंने पंच डाले हैं। नाटक में श‍िक्षा को लेकर जो पंच डाले गए हैं वे समसामयिक हैं। वह दृश्य मज़ेदार है जिसमें चोर इस बात से डर रहे हैं कि बच्चे पढ़ लिख न लें। यदि वे पढ़ लिख लेंगे तो प्रश्न पूछेंगे और डरना छोड़ देंगे। नाटक में कुर्सी राज सिंहासन का प्रतीक है। नाटक में अभ‍िनय करने वाले सारे बच्चे समकालीन राजनीति के मुद्दों से परिचित हैं।

बच्चों के तीनों नाटक देखने के बाद यह स्पष्ट हो गया कि बच्चों ने जो अभ‍िनय किया, दरअसल वही अभ‍िनय है। उनके चेहरे पर कहीं अभ‍िनय का तनाव नहीं दिखता और न ही उनके ऊपर किसी की कोई छाप दिखती है।

‘खुल जा सिम सिम’ के मंचन से बाल कलाकारों ने अपने अभ‍िनय की असीमित क्षमता प्रगट की। उनकी संवाद अदायगी, मंच पर शारीरिक भाव भंगि‍मा, मंच पर गति, आत्मविश्वास और सबसे जरूरी भोलापन, सरलता, निर्दोषता और बचपना जिस प्रकार झलकता है वह अद्भुत है। इन बच्चों की तारीफ के साथ निर्देशक अक्षय सिंह ठाकुर और रंगाभरण थियेटर ग्रुप के सभी कलाकारों की सराहना करनी चाहिए क्योंकि उन्होंने जबलपुर में बाल रंगमंच का आधारभूत वातावरण बनाने में जो पहल की है। ये निर्देशक बच्चों के साथ लगातार मेहनत करके जबलपुर के रंगकर्म का आधारभूत ढांचा मजबूत कर रहे हैं।

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Portrait of a middle-aged man with gray hair and a light beard, wearing a pink plaid shirt, looking at the camera.
पंकज स्वामी
जन्म : 19 जुलाई 1968, जबलपुर शिक्षा: कॉमर्स एवं पत्रकारिता में पोस्ट ग्रेजुएट व ऑडियो प्रोग्राम प्रोडक्शन में डिप्लोमा आठवें दशक के उत्तरार्द्ध में जबलपुर से पत्रकारिता की शुरुआत। युगधर्म, हिन्दी एक्सप्रेस, दैनिक भास्कर, दैनिक मध्य भारत, राष्ट्रीय सहारा, इंडियन एक्सप्रेस में काम किया। जबलपुर, भोपाल व दिल्ली में पत्रकारिता करने के बाद अब एमपी पावर मैनेजमेंट कंपनी में वरिष्ठ जनसम्पर्क अध‍िकारी के रूप में नौकरी कर रहे हैं। पिछले 36 वर्षों से देश की महत्वपूर्ण पत्र पत्रिकाओं के साथ विभिन्न वेबसाइट में नाट्य समीक्षा, सांस्कृतिक पत्रकारिता और आलोचनात्मक विश्लेषण कर रहे हैं। वर्तमान में फ़ेसबुक पर जबलपुर के आधुनिक रंगकर्म का इतिहास विषय पर सीरीज लिख रहे हैं। जबलपुर सफ़रनामा नाम से फेसबुक व यूट्यूब पर चेनल है जिसमें जबलपुर व स्थानीयता को फोकस करके लिखते व वीडियो बनाते हैं। कहानियों का प्रकाशन पहल, बया, कथादेश, परिकथा, पाखी जैसी पत्रिकाओं के साथ देश की उत्कृष्ट साहित्यिक वेब पोर्टल पर नियमित रूप से होता रहता है। लम्बे समय तक 'पहल' के संपादक मंडल में शामिल रहे। एक कहानी संग्रह 'पारसी धर्मशाला' नाम से प्रकाशित और चर्चित है। इनसे संपर्क [email protected] पर किया जा सकता है।
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