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देशभर में ₹1,000 करोड़ का महा-साइबर फ्रॉड, CBI ने 4 चीनी नागरिकों सहित 17 आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की

सीबीआई का आरोप है कि विदेशी हैंडलर्स के निर्देश पर भारतीय सहयोगियों ने अनजान लोगों से पहचान पत्र हासिल किए, उन्हीं के नाम पर कंपनियां और बैंक खाते खोले गए और फिर इन्हें साइबर ठगी की रकम को घुमाने के लिए इस्तेमाल किया गया।

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केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने एक बड़े और संगठित अंतरराष्ट्रीय साइबर धोखाधड़ी नेटवर्क का पर्दाफाश करते हुए 17 आरोपियों और 58 कंपनियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की है। आरोपियों में चार चीनी नागरिक भी शामिल हैं, जिनकी पहचान ज़ोउ यी, हुआन लियू, वेइजियान लियू और गुआनहुआ वांग के रूप में हुई है। सीबीआई के मुताबिक, इन विदेशी हैंडलर्स के निर्देश पर वर्ष 2020 से भारत में शेल कंपनियां खड़ी की गईं और देश के कई राज्यों में फैला एक संगठित सिंडिकेट सक्रिय किया गया।

यह मामला गृह मंत्रालय के अधीन भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) से मिली सूचनाओं के आधार पर दर्ज किया गया था। शुरुआती तौर पर ये अलग-अलग ऑनलाइन ठगी की शिकायतें लग रही थीं, लेकिन गहन विश्लेषण में लोन ऐप्स, फर्जी निवेश योजनाओं, पोंजी और एमएलएम मॉडल, पार्ट-टाइम नौकरी के झूठे ऑफर और धोखाधड़ी वाले ऑनलाइन गेमिंग प्लेटफॉर्म के पीछे एक ही संगठित साजिश सामने आई।

सीबीआई को इस मामले में अक्टूबर 2025 में तीन अहम भारतीय आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद बड़ी सफलता मिली। जांच में सामने आया कि एक समन्वित सिंडिकेट ने अत्याधुनिक डिजिटल और वित्तीय ढांचा तैयार कर हजारों आम नागरिकों को ठगा। एजेंसी के अनुसार, एप्लिकेशन के पैटर्न, फंड के लेन-देन, पेमेंट गेटवे और डिजिटल फुटप्रिंट में समानताएं मिलीं, जिससे यह साफ हुआ कि सभी मामलों की कमान एक ही नेटवर्क के हाथ में थी।

जांच एजेंसी का कहना है कि साइबर अपराधियों ने गूगल विज्ञापन, बल्क एसएमएस, सिम-बॉक्स आधारित मैसेजिंग सिस्टम, क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर, फिनटेक प्लेटफॉर्म और बड़ी संख्या में म्यूल बैंक खातों का इस्तेमाल किया। हर चरण इस तरह डिजाइन किया गया था कि असली नियंत्रकों की पहचान छिपी रहे और कानून प्रवर्तन एजेंसियों से बचा जा सके।

1,000 करोड़ की रूटिंग और फर्जी कंपनियों का जाल

सीबीआई ने 111 शेल कंपनियों का भी खुलासा किया, जिन्हें डमी डायरेक्टर्स, फर्जी या भ्रामक दस्तावेजों और झूठे पते के आधार पर पंजीकृत कराया गया था। इन कंपनियों के जरिए बैंक खातों और पेमेंट गेटवे पर मर्चेंट अकाउंट खोले गए। सैकड़ों खातों के विश्लेषण में 1,000 करोड़ रुपये से अधिक की राशि के संदिग्ध लेन-देन का पता चला है। इनमें से एक खाते में ही कम समय में 152 करोड़ रुपये से ज्यादा जमा हुए।

इससे पहले कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, झारखंड और हरियाणा में 27 स्थानों पर तलाशी ली गई थी। इस दौरान डिजिटल डिवाइस, दस्तावेज और वित्तीय रिकॉर्ड जब्त किए गए, जिनकी फोरेंसिक जांच में यह पुष्टि हुई कि विदेशी नागरिक विदेश से बैठकर पूरे नेटवर्क को नियंत्रित कर रहे थे। अगस्त 2025 तक दो भारतीय आरोपियों के बैंक खातों से जुड़ा एक यूपीआई आईडी विदेश में सक्रिय पाया गया, जिससे विदेश से रियल-टाइम ऑपरेशनल कंट्रोल की पुष्टि हुई।

सीबीआई का आरोप है कि विदेशी हैंडलर्स के निर्देश पर भारतीय सहयोगियों ने अनजान लोगों से पहचान पत्र हासिल किए, उन्हीं के नाम पर कंपनियां और बैंक खाते खोले गए और फिर इन्हें साइबर ठगी की रकम को घुमाने के लिए इस्तेमाल किया गया। कई स्तरों में रकम को ट्रांसफर कर मनी ट्रेल और अंतिम लाभार्थियों को छिपाने की कोशिश की गई।

एजेंसी ने चार विदेशी मास्टरमाइंड, उनके भारतीय सहयोगियों और 58 कंपनियों के खिलाफ आपराधिक साजिश, जालसाजी और अनियमित जमा योजना प्रतिबंध अधिनियम, 2019 सहित अन्य धाराओं में कार्रवाई की है। यह मामला ‘ऑपरेशन चक्र-V’ के तहत साइबर-सक्षम वित्तीय अपराधों के खिलाफ सीबीआई की लगातार चल रही मुहिम का हिस्सा बताया गया है।

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अनिल शर्मा
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...

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