यह वर्ष नामवरसिंह जी का जन्मशती वर्ष है। कहा जा सकता है कि बीसवीं सदी के उत्तरार्ध से इक्कीसवीं सदी के पूर्वार्ध तक हिंदी आलोचना या यों कहें कि हिन्दी साहित्य संसार को विलोड़ित करने वाले नामवरजी की स्मृतियों को लेकर सिर्फ ‘नामवर’ हस्तियों का ही कोष बनाया जाए तो यह स्मृति-कोष कई-कई खंडों को घेर लेगा। फिलहाल यहां खंड तो नहीं, उनके आसपास दूर-दराज से जुड़े लोगों की स्मृतियों के कुछ अंश बटोरे हैं। विशुद्ध रूप से ये संस्मरण ही हैं, किसी नई परम्परा की खोज या कोई नई आलोचनात्मक अध्ययन नहीं। नामवरजी के प्रिय ‘कहना न होगा’ वाली शैली में कहें तो देह – रूप में नामवरजी अब इस लौकिक संसार मे नहीं लेकिन स्मृति-रूप में वे सब में जीवंत है। उनके विश्वस्त और जोधपुर से लेकर अंतिम दिनों में शिवालिक तक में जुड़े रहे उनके शिष्य डॉ. रामबक्ष जाट ने संस्मरण विधा को पुनर्जीवित करते हुए ‘मेरे लिए नामवरजी’ किताब ही बना डाली है। इसमें नामवरजी के संग रहे उनके साथियों से लेकर उनके अपनों तक के संस्मरण हैं। उनका स्मरण करते हुए इसमें उनके जीवन से जुड़े विशिष्ट पहलुओं को विभिन्न हस्तियों के नज़रिए से चर्चा की गई है। यह उनको आदरांजलि है।
वाद-विवाद-संवाद
पैदा होने पर विवाद
नामवर जी हिंदी साहित्य में दुविधा की तरह हैं और वे दुविधा पैदा भी करते हैं। जिसका सीधा संबंध उनके जन्मदिन से है। हम लोग दशकों तक यह जानते थे कि वे एक मई को पैदा हुए हैं। यह हुआ था या नहीं पर मैं मान कर चलता था। कोई उनका जीवनी-लेखक अब तक नहीं बता पाया कि वे कब पैदा हुए थे। उसी तरह नामवर जी जिन कारणों से अपने को एक मई का पैदा हुआ मानकर चलते थे आप अनुमान कर सकते हैं। अब वह बात महत्वहीन हो गई है तो नामवर जी 28 जुलाई को पैदा हो गए। यह दुविधा है।
(मैनेजर पाण्डेय-मेरे लिए नामवर जी)
बकलम खुद
कायदे से यूनिवर्सिटी में जिस पर नौकरी मिलती है वो मेरे रजिस्टर में जन्म दिन 1 मई 1927 है। स्कूल मास्टर और पिता जी ने यही लिख वाया था। क्यों लिखवाया था? इसका महत्त्व वे समझते थे। नहीं जानते थे ये मजदूर आंदोलन का दिन है। जाने क्यों लिखवाया था? उन्हीं के द्वारा इत्तेफाक से कुछ वर्षों के बाद जन्म कुण्डली उन्होंने दी तो मालूम हुआ कि नहीं मेरा वास्तविक जन्मदिन तो 28 जुलाई 1926 है।
(नामवार सिंह, ‘मेरे लिए नामवर जी’ )
बात यह है कि
वाराणसी से तीस मील दूर चंदौली जिले के छोटे से गांव जीअनपुर में 28 जुलाई, 1926 को उनका जन्म हुआ। हालांकि, नामवर सिंह की पुस्तकों में 1 मई (श्रम दिवस), 1927 भी दर्ज रहा है। असली जन्म दिन का पता प्रख्यात पत्रकार प्रभाष जोशी के प्रयास से उन पर आयोजित ‘नामवर के निमित’ (अमृतवर्ष-2002) में चला।
जन्मतिथि तो जन्मतिथि, नाम में भी विवाद !
बनारस के ‘जीअनपुर’ गाँव में जब नागर सिंह जैसे के घर 28 जुलाई 1926 को एक बालक का जन्म हुआ तो परिवार में खूब खुशियाँ मनाई गईं।
…बालक के पिता ने बच्चे के नाम रखने के लिए घर-परिवार व आस-पड़ोस के लोगों को इकट्ठा किया और बड़े प्यार से बालक का नाम ‘रामजी’ रखा। दूसरी ओर, ख़बर मिली कि मास्टर के घर पहला बेटा हुआ है, तो पड़ोस की एक बूढ़ी औरत भी आई और आकर कहा कि इसका नाम ‘नामवर’ रखो ।… वह जाने क्यों आई और आकर कहा कि इसका नाम नामवर रखो। वह अपनी ओर से यह नाम रखकर चली गई और एक हफ़्ते के अंदर कुत्ते के काटने से उसकी मृत्यु भी हो गई। हालाँकि, उनके पिताजी बेटे का नाम ‘रामजी’ रखना चाहते थे। खैर, यह बात तो आई-गई हो गई ।… किंतु बूढ़ी औरत का दिया हुआ यह नाम ही फिर सदा के लिए उनके साथ चिपक गया। बचपन में जब वे बहुत छोटे ही थे, तो उन्हें ‘रामजी’ कहकर बुलाया जाता, तो वे रोने लगते और ‘नामवर’ कहकर बुलाने से चुप हो जाते। फिर यही नाम स्कूल में दाखिले के समय सदा के लिए तय हो गया।
(अंकित नरवाल – अनल पाखी: नामवरसिंह की जीवनी )
मृत्यु के बाद भी विवाद !
अब इसे क्या कहिएगा कि पैदा होने से लेकर जीते-जी विवादों में रहने वाले नामवर जी मृत्यु के बाद भी विवाद से जुड़े रहे। नामवर सिंह के निधन के दो वर्ष बाद युवा आलोचक अंकित नरवाल ने उनकी जीवनी ‘अनल पाखी’ लिखी। इस जीवनी में नामवर सिंह के अतीत के कथित रूप से संघ से जुड़ाव पर हिंदी जगत में उबाल आ गया।
जीवनी में कहा गया कि नामवर सिंह कभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े थे। जब महात्मा गांधी की हत्या हुई तो नामवर भी गिरफ्तार कर लिए गए। उन्हें तीन महीने पुणे तथा लखनऊ जेल में काटने पड़े। जेल से छूटने पर अटल बिहारी वाजपेयी ने जेल के द्वार पर उनका स्वागत किया था लेकिन राहुल सांकृत्यायन की एक पुस्तक ने उनके जीवन को बदल दिया और वे संघी से मार्क्सवादी बन गए। इस बात से हिन्दी संसार में हंगामा हो गया और यह मुद्दा सोशल मीडिया पर छा गया। नामवरजी के वामपंथी समर्थकों ने कड़ा विरोध जताते हुए कहा कि यह गलत है और तथ्य एकदम उलट है। काफी हंगामे, बहसों के बाद में पता लगा कि इसकी शुरुआत ‘अमर उजाला’ समाचार-पत्र में 22 अक्टूबर 2017 को ‘बैठक – जुगलबंदी’ शीर्षक से पूरे पृष्ठ पर नामवर सिंह और डॉ.विश्वनाथ त्रिपाठी के बीच हुई बातचीत थी। ‘अमर उजाला’ में प्रकाशित सामग्री को बाद में नामवरजी के बेटे विजय प्रकाश सिंह ने राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित किताब ‘आमने-सामने’ में इस्तेमाल किया लेकिन इस प्रश्न और उत्तर को नामवरजी से जोड़ दिया। नरवाल ने विजय प्रकाश सिंह की इसी किताब के संदर्भ से ही नामवरजी के संघ से जुड़ाव की बात कही। (अंकित नरवाल -अनल पाखी, संदर्भ ग्रंथ सूची पृष्ठ 359)
हंगामा बढ़ने पर डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी के खंडन और ‘अमर उजाला’ का मूल पृष्ठ देखने के बाद मामला सुलझा।
छात्र-हित चिंतक गुरु गंभीर लोकप्रिय शिक्षक
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय और जोधपुर विश्वविद्यालय में भले ही नामवरजी अनचाहे विवादों में घिरे रहे लेकिन यह भी महत्त्वपूर्ण है कि इन सब बातों-विवादों, प्रसंगों का उन्होंने कभी अपने अध्यापन और विद्यार्थियों पर कोई असर नहीं होने दिया। शिक्षक के रूप में अपने विशद, गहन अध्ययन और पढ़ाने की गुरु-गंभीर रोचक शैली के कारण इतने लोकप्रिय थे कि बकौल कवि-आलोचक शिवमंगल सिद्धान्तकार, “बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में जब वे प्राध्यापक बने थे तो उस समय उनकी क्लास में हिंदी ही नहीं बल्कि दूसरे विषयों के छात्र भी बड़ी संख्या में जा कर बैठते थे और जगह नहीं मिलने की स्थिति में खड़े भी रहते और उनका व्याख्यान सुनते होते थे।
(शिवमंगल सिद्धान्तकार, समालोचन, 18 जनवरी 2021)
जोधपुर से जेएनयू तक नामवरजी के छात्र रहे डॉ. रामबक्ष का मानना है कि “..दरअसल, नामवर जी के छात्रों के कई स्तर हैं। कुछ ऐसे हैं जिन्होंने उनसे कक्षा में पढ़ा है जैसे विश्वनाथ त्रिपाठी, केदारनाथ सिंह। कुछ ऐसे हैं जिन्होंने उनके साथ शोध-कार्य किए हैं। बी.ए. से लेकर पी-एच.डी. तक अध्ययन करने वाला तो मैं इकलौता छात्र ही हूँ। तुलसीराम उनको द्रोणाचार्य की तरह अपना गुरु मानते हैं। राजकमल प्रकाशन के अशोक माहेश्वरी उनके सामने अपने को शिष्यवत् मानते हैं। वे कभी भी किसी छात्र से कुछ नहीं लेते। बेरोजगारी के दौर में भी नामवरजी के इस गुण का उन्होंने अपनी आत्मकथात्मक किताब ‘मेरी चिताणी’ में विस्तार से लिखा है- “…..उस समय नामवर जी डी. टी.सी. की बस में बैठकर नीचेवाले कैम्पस में जाते थे। उस समय 30 पैसे का टिकट मिलता था। नामवर जी हमेशा अपने पास 30 पैसे रखते थे। किसी छात्र को वे इसकी इजाजत नहीं देते थे कि कोई उनका टिकट खरीद ले। वे स्वयं अपना टिकट खरीदते थे। उनके हाथ में कोई किताब हो तो वे भरसक अपने आप ही रखते थे। नामवर जी कभी-कभी अपने किसी छात्र को कह देते थे कि पान ले आओ। परन्तु वे यह कहना नहीं भूलते थे कि पैसे मत देना। इसी तरह कभी किसी पत्रिका, आरक्षण की व्यवस्था कराना, टैक्सी या ऑटो लाना, उनका सामान इधर-का-उधर पहुंचा तरह वे अपना कोई निजी काम किसी छात्र को नहीं बताते। किताब-पेन-पेंसिल कागज खरीदना कभी किसी विद्यार्थी से नहीं करवाया। ज्यादा-से-ज्यादा वे किसी को पुस्तकालय भेज सकते थे। बस। वे धार्मिक रूप से इसमें विश्वास करते रहे हैं कि छात्रों का एक पैसा खर्च नहीं करवाना है।
(रामबक्ष जाट, मेरी चिताणी 149 – 51)
धर्म-प्राण, आस्तिक नामवर जी
भारत के बौद्धिक जगत में वातावरण दशकों से ऐसा निर्मित किया गया है कि जो वामपंथी होगा,वो धर्म से दूर होगा, धर्म से निरपेक्ष होगा। कहना न होगा कि देश के अधिकांश ‘वामपंथी ताउम्र इसी मिथ्या अवधारणा को लेकर एक कृत्रिम जीवन जीते रहे हैं। उनकी यह प्रवृत्ति प्रायः हिन्दू, सनातन धर्म को लेकर अति की सीमा तक मुखर हो जाती है। हाल यह है कि जो जितना हिन्दू, सनातन धर्म के विरुद्ध बोलेगा, हिन्दू धार्मिक मान्यताओं, विश्वासों, प्रतीकों, देवी-देवताओं का मखौल उड़ाएगा, उतना ही ‘प्रगतिशील, धर्मनिरपेक्ष, क्रांतिकारी वामपंथी’ माना जाएगा। बहरहाल, नामवरजी के साथ ऐसा नहीं रहा। वे प्रगतिशील, वामपंथी मूल्यों के पक्षधर अवश्य रहे लेकिन सनातन, हिन्दू धर्म देवी-देवताओं में उनकी आस्था भी अद्भुत रही। यह बात अनेक उदाहरणों से सप्रमाण साबित हो चुकी है। अब उनकी बेटी समीक्षा को ही पढ़िए-
“बनारस में रहते हुए भी मुझे गायत्री मंत्र के बारे में न तो पता था और न ही मैंने कभी ध्यान ही दिया था। दिल्ली में मुझे जब पता चला तो एक दिन मैंने उनसे पूछ लिया कि “क्या होता है गायत्री मंत्र?” उस समय उनके मुँह में पान था, इसलिए उन्होंने एक कागज पर पूरा मंत्र लिख दिया। यही नहीं, उसका भावार्थ भी साथ में लिख दिया। मैंने सोचा शायद मुँह में पान है इसलिए नहीं बोल रहे हैं। लेकिन बाद में भी जब-जब पूछा— चुप! अंततः एक दिन उन्होंने मुझे बता ही दिया— “पण्डिज्जी को ज्योतिष का बहुत ज्ञान था। एक दिन मैंने पण्डिज्जी से पूछा कि ‘आप को ज्योतिष का इतना ज्ञान है, क्या आप इसमें विश्वास करते हैं?’ पण्डिज्जी ने कहा—“जानता हूँ लेकिन मानता नहीं।” ज्ञान होना एक बात है और विश्वास करना दूसरी बात।” इसी तरह की एक और घटना, सम्भवतः शिवरात्रि का दिन था अचानक नानू ने मुझसे कहा—“पूजा-पाठ के पक्ष में तो बिल्कुल नहीं हूँ लेकिन ‘शिवमहिम्न स्तोत्र’ जरूर याद होना चाहिए। कहा जाता है कि इसी स्तोत्र के द्वारा रावण ने शिव की आराधना की थी। इसका पाठ सुनना बहुत अच्छा लगता है।”
‘शिवमहिम्न स्तोत्र’ घर में उपलब्ध नहीं था। जे·एन·यू· में उनके मित्र प्रो. बराल थे। नेपाल के रहनेवाले थे। उनसे माँग कर ले आए, मुझे देकर बोले— “अपने लिए न सही, मेरी खुशी के लिए इसे याद कर लो।”
इसके पाठ करने की भी एक ख़ास शैली है। पढ़कर बताया, सस्वर उसका पाठ सिखाया और अंत में बोले—“एक छंद पर एक रुपया। रोज एक स्तोत्र सुनाओ और एक रुपया पाओ।” (जैसे बच्चों को फुसलाते हैं, वैसे बोले।) फिर अगले दिन से प्रतिदिन नाश्ते के समय एक रुपया लेकर बैठते। सबसे पहले शिव स्तोत्र फिर नाश्ता। इस तरह पूरा ‘शिव स्तोत्र’ मुझे कण्ठस्थ हो गया। यही नहीं, अंतिम दिन नानू ने पूरा ‘शिव स्तोत्र’ सुना। उनके लिए स्टैण्डर्ड रेट था— एक रुपया। ( ‘तद्भव, अंक 43)
नामवरजी की धर्म-ग्रंथों में श्रद्धा का उदाहरण लें।
21 फरवरी 2019 को साहित्य- अकादमी के सभागार में प्रो नामवरसिंह जी की स्मृति में सभा हुई.. इस सभा में कवि लीलाधर जगूडी ने एक संस्मरण सुनाया -… नामवर जी के निधन के कुछ ही दिनों पूर्व वे उनके निवास (शिवालिक अपार्टमेन्ट) पर मिलने गए थे। उनके साथ अरुण कमल भी थे। जगूडी जी ने नामवर जी से पूछा-“अगर कोई एक ही पुस्तक बचानी हो तो आप किसे बचाना कहेंगे।”
नामवर जी ने कहा-“एक नहीं, दो। पहली गीता और दूसरी रामचरितमानस।”
‘तद्भव’ में ही समीक्षा ठाकुर का अपने पिता पर संस्मरण छपा है। उसमें भी उनके अंतिम समय में निकट रखी रहीं चार किताबों की चर्चा है:
१ .गीता
२.रामचरितमानस
३. रवीन्द्र संचयिता
४. दीवान ए ग़ालिब।
कवि-लेखिका अनामिका ने भी बताया है कि –
“… वह नन्हा बच्चा नामवर जिसकी जेब में हनुमान चालीसा खरीदने के भी पैसे नहीं होते थे। श्मशान के रास्ते स्कूल जाते हुए सहपाठी ‘हनुमान चालीसा’ पढ़ता और बताता भी जाता कि हर शब्द में एक जादू छुपा है, तो नन्हें नामवर के मन में जगता कि काश, एक प्रति उनके पास भी होती; प्रति नहीं है- इसकी क्षतिपूर्ति उन्होंने ऐसे की कि ध्यान से सहपाठी का चालीसा-पाठ सुना और दो- एक आवृत्ति में पूरा पाठ हृदयंगम।” ( बहुवचन 50)
परिवार में नामवर, नामवर का परिवार
नामवर सिंह जी की जो सार्वजनिक छवि रही है,उससे यह कल्पना भी असम्भव है कि वे भीतर से एक स्नेहिल पिता,भाई,बेटे होंगे; लेकिन वे थे। आप यदि उनकी बेटी समीक्षा भाई काशीनाथसिंह, भतीजे सिद्धार्थ के अनुभवों को पढ़ेंगे तो वे एक चिंतातुर पिता,भावुक भाई और स्नेहिल बाबूजी के रूप में दिखाई देंगे। समीक्षा ने जीवन का पहला बड़ा हिस्सा अपने चाचा काशीनाथ सिंह के परिवार के साथ बिताया तो करीब एक दशक पिता के साथ। इस प्रसंग में बेटी के विवाह के लिए चिंतातुर पिता का दृश्य है-
“इन्टरमीडिएट की परीक्षा के बाद पापा ने सन् 85 की गर्मियों में दिल्ली का कार्यक्रम बनाया। इस बार पापा के साथ मैं, स्वस्ति और रचना दीदी गए। एक दिन अचानक नामवर सिंह ने मुझे अपने कमरे में बुलाया। अपनी आल्मारी में से कुछ आभूषण निकाल कर दिखाए। हर डिब्बे में आभूषणों के साथ कागज का एक टुकड़ा रखा हुआ था— ‘समीक्षा ठाकुर के विवाह के लिए।’ मुझे दिखाकर बोले— “अगर खुदा न खास्ता मुझे कुछ हो गया या मेरे न रहने पर यह सब तुम ले जाना। ये तुम्हारे लिए हैं।” और यह कि-
“सन् 85 के अगस्त में मैं दिल्ली आई। यह वही साल था जब जे·एन·यू· पुराने कैम्पस से नए कैम्पस में शिफ्ट हो रहा था। इस बार मैं दिल्ली घूमने नहीं, स्थायी रूप से रहने आई थी। मैंने स्वतः ही अपने पिता का चरण-स्पर्श किया। इतने भरे-पूरे परिवार से अचानक दिल्ली में परिवार के नाम पर सिर्फ हम दो लोग, वह भी एक-दूसरे से पर्याप्त अपरिचित। मुझसे ज्यादा वे लाचार थे, उनकी समझ में नहीं आता था, कि क्या बात करें? उनके लिए मैं 17 साल की नहीं 7 साल की बच्ची थी। वही चिंताएं, वैसी ही बातें—
“कुछ खाती पीती ही नहीं, दूध भी नहीं पीती, ऐसे कैसे चलेगा?”
“इस लिफ़ाफे से क्या होगा? अगर ठण्ड लग जाएगी तो?”
क्या-क्या न कर दें जिससे मैं खुश हो जाऊँ। बात-बात पर कहते-
“अगर तुम्हें कुछ हो गया तो काशी को क्या मुँह दिखाऊँगा?”
जैसे मैं उनकी बेटी नहीं, पापा की अमानत हूँ। वह आत्मविश्वास अर्जित करने में उन्हें समय लगा और
पूसी, बिटियारानी, बिटलू, बिट्टो, चित्तो, गप्पू, डी·जी·, कट्टो इत्यादि से लेकर ‘नानू’ संबोधन में भी। ( तद्भव 43)
सही है कि जवाहरलाल नेहरु के इंदिरा के नाम लिखे गए ‘ पिता के पत्र पुत्री के नाम’ बहुत चर्चित लेकिन एक पिता के रूप में नामवर सिंह की बेटी समीक्षा ठाकुर को लिखे पत्रों का संकलन “तुम्हारा नानू” को भी पढ़ कर देखिएगा। वर्ष 1986-2005 के बीच लिखे गए ये पत्र बेटी के प्रति उनके स्नेह और यात्राओं के अनुभवों को व्यक्त करते हैं तो ‘तुम्हारा नामवर’ में परिजनों को लिखे पत्र हैं। मझले भाई रामजी सिंह को सम्बोधित पत्र अनेक दृष्टियों से विशिष्ट हैं। इन पत्रों में आधुनिक एवं पारम्परिक जीवन के द्वन्द्वों के दबावों के अनेक संकेत हैं। सबसे छोटे भाई काशीनाथ सिंह को लिखे पत्र उन स्थितियों और जीवन-प्रसंगों पर रोशनी डालते हैं। ऐसे में यह सहज,स्वाभाविक ही लगता है जब काशीनाथ अपने बड़े भाई के बारे में लिखते हैं-
“मुझे सदा से गर्व रहा कि मैं उनका छोटा भाई हूं। उन्होंने मुझे गोद में खिलाया, पढ़ाया-लिखाया। हर सुख-दुख में मैंने उन्हें साथ पाया। डेढ़ दशक तक बनारस में उनकी छाया की तरह रहा। लेखक के रूप में जहां कहीं मुझमें भटकाव आया, बराबर उनसे बातें की। कुछ अच्छा लिख सका, तो उसके पीछे कहीं-न-कहीं उनके दिए सूत्र रहे। बड़े भइया जब दिल्ली चले गए तो मैं साल में दो तीन-बार, सप्ताह भर के लिए जाता रहा और सेवा वाला क्रम बराबर जारी रखा।” ऐसा नहीं कि काशी का यह भ्रातृत्व प्रेम इकतरफ़ा है, स्नेह-निर्झर उधर भी बहता दिखाई देता है जब भावुक नामवर अपने प्रोफ़ेसर साथी हरि कर्की से ये उद्गार व्यक्त करते हैं-
“…अवसर था नामवर सिंह षष्टिपूर्ति अभिनंदन समारोह का। षष्टिपूर्ति पर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के विधि संकाय सभागार में 28-29 मई 1988 को दो दिवसीय आलोचना सत्र का कार्यक्रम आयोजित हुआ था। कार्यक्रम के बाद जब हम अतिथि गृह पहुंचे तो काशीनाथ जी का संदर्भ नामवर जी ने खुद उठाया। उन्होंने भावुक होते हुए कहा, “कृपा, काशी जैसा भाई न मिलता तो शायद इतने वर्ष मैं न जी पाता। यूनिवर्सिटी में दौ सौ पैंसठ रुपये मिलते थे। काशी ही घर चलाते। उसी में सारे खर्च अंटा लेते। मैंने कुछ नहीं जाना। नौकरी छूटी, तब भी नहीं। जब नौकरी नहीं थी, काशी को पढ़ाने के लिए बनारस लाया था।
काशी को तब भी कठिनाइयों से जूझना पड़ा। बी.एच.यू. में जब वे अध्यापक बन गये तो विश्वविद्यालय की राजनीति के कारण उन्हें क्या-क्या परेशानी नहीं झेलनी पड़ी। काशी जैसा भाई मिला, जन्म सार्थक हो गया। किसी को भी जीवन में काशी जैसा भाई मिले तो और कुछ मिलने की जरूरत नहीं होगी।”



