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मुंबई की बारिश सिर्फ मानसून नहीं, बदलती जलवायु का संकेत… क्या समुद्र किनारे बसे भारत के लिए खतरे की घंटी बज चुकी है?

भारत सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की रिपोर्ट ‘असेसमेंट ऑफ क्लाइमेट चेंज ओवर द इंडियन रीजन’ बताती है कि उत्तर हिंद महासागर में 1874 से 2004 के बीच समुद्र-स्तर बढ़ने की दर 1.06 से 1.75 मिलीमीटर प्रति वर्ष थी। लेकिन 1993 से 2017 के बीच यह बढ़कर करीब 3.3 मिलीमीटर प्रति वर्ष हो गई। यानी समुद्र पहले की तुलना में लगभग दोगुनी गति से ऊपर उठ रहा है।

महाराष्ट्र में तीव्र मानसून की वजह से पिछले कुछ दिनों से मूसलाधार बारिश का दौर जारी है। मुंबई, पालघर, पुणे और आसपास के कई जिलों की स्थिति बेहद खराब हो गई है। आप कह सकते हैं कि मुंबई में ऐसी स्थिति तो हर साल की है। लेकिन वैज्ञानिकों की नजर में यह केवल एक मौसमी घटना नहीं है। अब मानसून का स्वरूप भी बदल रहा है। पहले जहां बारिश कई दिनों तक अपेक्षाकृत समान रूप से होती थी, वहीं अब कम समय में अत्यधिक वर्षा की घटनाएं बढ़ रही हैं। मुंबई में ही इस बार कई इलाकों में कुछ ही घंटों में 300 मिमी से अधिक बारिश दर्ज की गई।

कहना ना होगा कि जलवायु परिवर्तन को लंबे समय से वैश्विक तापवृद्धि से जुड़ी चुनौती माना जाता रहा है। लेकिन अब इसका सबसे बड़ा असर समुद्र किनारे बसे शहरों पर दिखाई देने लगा है। समुद्र का स्तर बढ़ रहा है, अत्यधिक बारिश की घटनाएं बढ़ रही हैं और हाई टाइड के दौरान तटीय शहर पहले से कहीं ज्यादा असुरक्षित होते जा रहे हैं। यही वजह है कि मुंबई की हालिया बारिश को विशेषज्ञ केवल मौसम की घटना नहीं, बल्कि भविष्य की चेतावनी मान रहे हैं।

भारत की 7,500 किमी लंबी तटीय रेखा पर बढ़ता संकट

भारत का तटीय रेखा क्षेत्र करीब 7,500 किमी लंबा है। यह केवल भौगोलिक सीमा नहीं है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा भी है। बड़े बंदरगाह, पेट्रोलियम उद्योग, समुद्री व्यापार, पर्यटन, मत्स्य उद्योग और करोड़ों लोगों की आजीविका इसी तटीय पट्टी पर निर्भर है। इसलिए समुद्र का बढ़ता स्तर केवल पर्यावरणीय चिंता नहीं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक चुनौती भी है।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय की हालिया रिपोर्ट ‘भारतीय तटीय क्षेत्रः जलवायु अनुमान 2021-2040’ के अनुसार अगर वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित नहीं किया गया, तो भारत के तटीय शहरों को अभूतपूर्व जोखिम का सामना करना पड़ सकता है। रिपोर्ट के अनुसार जलवायु परिवर्तन अब केवल समुद्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि रोजगार, सार्वजनिक स्वास्थ्य, पलायन, शहरी नियोजन और सामाजिक असमानता तक इसका असर दिखाई देगा।

भारत सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की रिपोर्ट ‘असेसमेंट ऑफ क्लाइमेट चेंज ओवर द इंडियन रीजन’ बताती है कि उत्तर हिंद महासागर में 1874 से 2004 के बीच समुद्र-स्तर बढ़ने की दर 1.06 से 1.75 मिलीमीटर प्रति वर्ष थी। लेकिन 1993 से 2017 के बीच यह बढ़कर करीब 3.3 मिलीमीटर प्रति वर्ष हो गई। यानी समुद्र पहले की तुलना में लगभग दोगुनी गति से ऊपर उठ रहा है। जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र के वैज्ञानिक पैनल इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) ने भी भारत को समुद्र-स्तर वृद्धि के लिहाज से सबसे संवेदनशील देशों में रखा है।

मुंबई समेत ये बड़े तटीय शहर खतरे में

नोएडा स्थित भू-स्थानिक कंपनी आरएमएसआई ने आईपीसीसी के आंकड़ों के आधार पर मुंबई सहित छह प्रमुख तटीय शहरों का अध्ययन किया। अध्ययन में बताया गया कि अगर मौजूदा रुझान जारी रहे तो 2050 तक मुंबई में लगभग 14.4 किलोमीटर सड़क नेटवर्क और करीब 571 प्रमुख इमारतें समुद्र के बढ़ते जलस्तर से प्रभावित हो सकती हैं।

रिपोर्ट के अनुसार जिन इलाकों पर सबसे अधिक खतरा है, उनमें मीठी नदी का किनारा, कोलाबा के हिस्से, प्रियदर्शिनी पार्क, महालक्ष्मी मंदिर के पीछे का इलाका, ब्रीच कैंडी अस्पताल, हाजी अली दरगाह, वर्ली का तटीय क्षेत्र, माहीम किला, जवाहरलाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट, जुहू एयरपोर्ट और मरीन ड्राइव का कुछ हिस्सा शामिल हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि समुद्र-स्तर वृद्धि और हाई टाइड साथ आए तो इन इलाकों में जलभराव का जोखिम कई गुना बढ़ सकता है।

आरएमएसआई ने मुंबई के अलावा चेन्नई, कोच्चि, विशाखापत्तनम, मंगलूरु और तिरुवनंतपुरम का भी विश्लेषण किया है। इन शहरों में भी समुद्र-स्तर बढ़ने से सड़कें, बंदरगाह, अस्पताल और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पर असर पड़ने की आशंका जताई गई है। चेन्नई में पल्लीकरनई आर्द्रभूमि के सिकुड़ने और समुद्र के बैकवाटर के शहर में घुसने का खतरा बढ़ गया है। दूसरी ओर कोलकाता और सुंदरबन क्षेत्र पहले से ही समुद्री कटाव और चक्रवातों के दोहरे खतरे का सामना कर रहे हैं। यह क्षेत्र समुद्री कटाव और चक्रवातों के दोहरे प्रहार से ‘जलवायु शरणार्थियों’ के नए संकट से जूझ रहा है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि समुद्र का बढ़ता स्तर केवल शहरों, सड़कों को डुबोने का खतरा नहीं लाएगा। इससे समुद्री कटाव तेज होंगे, भूजल में खारापन बढ़ेगा, मछलियों के प्रजनन क्षेत्र प्रभावित होंगे जिसका असर लाखों मछुआरों की आजीविका पर सीधे पड़ेगा। तटीय क्षेत्रों में रहने वाले गरीब और निम्न आय वर्ग के लोग सबसे पहले इसकी चपेट में हैं, क्योंकि उनके घर और रोजगार दोनों समुद्र के सबसे करीब हैं।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय की रिपोर्ट भी कहती है कि जलवायु परिवर्तन का सबसे अधिक असर उन समुदायों पर पड़ेगा जिनकी जीविका सीधे प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है। इसमें मछुआरे, खेतिहर मजदूर, निर्माण श्रमिक, बंदरगाह कर्मी और तटीय पर्यटन से जुड़े लाखों लोग शामिल हैं।

जलवायु परिवर्तन का असर केवल तटीय सड़कों या इमारतों तक सीमित नहीं रहेगा। क्लाइमेट जर्नल के एक अध्ययन के अनुसार, 2050 तक भारत में लगभग 3.6 करोड़ (36 मिलियन) लोग सालाना तटीय बाढ़ के दायरे में आ सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि समुद्र का पानी आगे बढ़ने से तटीय इलाकों के भूजल में खारापन बढ़ेगा जिससे पीने के पानी का संकट पैदा होगा और खेती की जमीन बंजर हो जाएगी।

इसके साथ ही मुंबई के जवाहरलाल नेहरू पोर्ट (JNPT), चेन्नई पोर्ट और विशाखापत्तनम पोर्ट जैसे महत्वपूर्ण समुद्री बंदरगाहों पर भी तटीय बाढ़ का जोखिम बढ़ने की आशंका जताई गई है। चूंकि भारत का बड़ा आयात-निर्यात समुद्री व्यापार पर निर्भर है, इसलिए इसका असर केवल तटीय शहरों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और आपूर्ति शृंखला पर भी पड़ सकता है।

सरकार इसको कितनी गंभीरता से ले रही?

ऐसा नहीं है कि सरकार ने इस खतरे को नजरअंदाज किया है। पिछले कुछ सालों में केंद्र सरकार ने तटीय क्षेत्रों की संवेदनशीलता का वैज्ञानिक आकलन करने और भविष्य के जोखिमों को समझने के लिए कई महत्वपूर्ण पहल शुरू की हैं। इसी क्रम में पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अधीन इंडियन नेशनल सेंटर फॉर ओशन इन्फॉर्मेशन एंड सर्विसेज ने डीप ओशन मिशन के तहत देश के 11 तटीय क्षेत्रों के लिए भविष्य में समुद्र-स्तर बढ़ने और तटीय संवेदनशीलता का अध्ययन किया है। इसके आधार पर मुंबई, चेन्नई और कोलकाता जैसे प्रमुख शहरों के कोस्टल वल्नरेबिलिटी इंडेक्स (CVI) मैप तैयार किए गए हैं, ताकि यह समझा जा सके कि किन इलाकों पर समुद्र का खतरा सबसे अधिक है।

इसी दिशा में सर्वे ऑफ इंडिया ने पूरे तटीय क्षेत्र के लिए हैजर्ड लाइन निर्धारित की है। यह रेखा बताती है कि भविष्य में समुद्र-स्तर बढ़ने, तटीय कटाव या ऊंचे ज्वार की स्थिति में समुद्र का पानी किन क्षेत्रों तक पहुंच सकता है। वहीं नेशनल सेंटर फॉर कोस्टल रिसर्च (NCCR) ने 2022 में नेशनल असेसमेंट ऑफ शोरलाइन चेंजेज जारी कर देश के तटों का विस्तृत विश्लेषण किया। इस अध्ययन में बताया गया कि किन क्षेत्रों में समुद्र तेजी से तट का कटाव कर रहा है, कहां तट अपेक्षाकृत स्थिर है और किन स्थानों पर समुद्र पीछे हट रहा है।

सरकार अब केवल जोखिम का आकलन करने तक सीमित नहीं है, बल्कि अनुकूलन और संरक्षण पर भी जोर दे रही है। इसी उद्देश्य से 2024 में नेशनल डिजास्टर मिटिगेशन फंड के तहत तटीय कटाव रोकने और प्रभावित क्षेत्रों के पुनर्वास के लिए 1,500 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया। साथ ही इंटीग्रेटेड कोस्टल रिस्क मिटिगेशन एंड रेजिलिएंस प्रोग्राम (ICRMRP) के माध्यम से तटीय समुदायों की भागीदारी बढ़ाने, आधुनिक प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली विकसित करने और जलवायु परिवर्तन के अनुरूप शहरी नियोजन को बढ़ावा देने की दिशा में भी काम किया जा रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि ये अनुमान ऐसे हालात पर आधारित हैं, जहां जलवायु परिवर्तन की गति बनी रहती है और पर्याप्त अनुकूलन उपाय नहीं किए जाते। उनका मानना है कि यदि तटीय शहरों में समुद्री सुरक्षा ढांचे को मजबूत किया जाए, मैंग्रोव वनों का संरक्षण और पुनर्स्थापन हो, ड्रेनेज व्यवस्था में सुधार किया जाए तथा वैज्ञानिक आधार पर शहरी नियोजन अपनाया जाए, तो भविष्य के जोखिम और नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

ये भी पढ़ेंः ‘इको-एंग्जायटी’ क्या है? बढ़ती गर्मी और जलवायु संकट नई पीढ़ी के मन पर कैसे डाल रहे असर

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अनिल शर्मा
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...
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दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...
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