जैसे-जैसे वैश्विक तापमान नए रिकॉर्ड बना रहा है, देश-दुनिया के कई शहरों में जल संकट गहरा रहा है और नदियां-पहाड़ दम तोड़ रहे हैं, वैसे-वैसे हमारी धरती पर एक नया और अदृश्य संकट भी पैर पसार रहा है। यह संकट पर्यावरण का नहीं, बल्कि इंसानी दिमाग का है। यूनिसेफ के अनुसार, बढ़ती गर्मी, सूखे की मार और बिगड़ते पर्यावरण को देखकर आज की नई पीढ़ी में एक अलग तरह का मानसिक तनाव तेजी से बढ़ रहा है, जिसे विज्ञान की भाषा में ‘इको-एंग्जायटी’ या ‘क्लाइमेट एंग्जायटी’ कहा जाता है।
यह शब्द सुनने में नया लग सकता है, लेकिन इसकी जड़ें बहुत वास्तविक हैं। लगातार बढ़ती गर्मी, पानी की कमी, बाढ़, जंगलों की आग और पर्यावरणीय तबाही की खबरें नई पीढ़ी को यह सोचने पर मजबूर कर रही हैं कि आने वाले दशकों में पृथ्वी कैसी होगी। क्या पीने का पानी मिलेगा? क्या शहर रहने लायक बचेंगे? क्या आने वाली पीढ़ियां सुरक्षित होंगी?
यूनिसेफ के अनुसार 2021 में दुनिया के कई देशों में एक सर्वे कराया गया जिसमें 16 से 25 वर्ष की उम्र के 10 हजार युवाओं से बातचीत की गई। करीब 60 प्रतिशत युवाओं ने कहा कि वे पर्यावरणीय संकट को लेकर बेहद चिंतित हैं। लगभग आधे युवाओं ने माना कि इसका असर उनकी नींद, पढ़ाई, ध्यान और रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ रहा है। 75 प्रतिशत युवाओं ने भविष्य को डरावना बताया, जबकि 83 प्रतिशत को लगा कि पिछली पीढ़ियों ने पृथ्वी की सही देखभाल नहीं की।
यह चिंता केवल अमीर या विकसित देशों तक सीमित नहीं है। भारत, फिलीपींस और नाइजीरिया जैसे देशों में युवाओं में सबसे ज्यादा इको-डिस्ट्रेस दर्ज किया गया। इसकी एक वजह यह भी है कि इन देशों के लोग जलवायु परिवर्तन का असर सीधे महसूस कर रहे हैं।
बात भारत की करें तो यहां हर साल लंबी और अधिक खतरनाक हीटवेव देखने को मिल रही है। इस साल ही ले लीजिए उत्तर प्रदेश का बांदा जिला दुनिया के नक्शे पर सबसे गर्म शहरों में दर्ज किया गया। यहां पिछले कुछ दिनों से तापमान 48 डिग्री से ऊपर बना हुआ है। कई शहरों में पानी का संकट गहराता जा रहा है। गांवों में खेती का चक्र बिगड़ रहा है। ऐसे माहौल में भविष्य को लेकर चिंता स्वाभाविक है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अत्यधिक गर्मी का मानसिक स्वास्थ्य से सीधा संबंध है। शोध बताते हैं कि तापमान बढ़ने के साथ चिंता, अवसाद और चिड़चिड़ापन बढ़ सकता है। ज्यादा गर्मी नींद को प्रभावित करती है, और खराब नींद मानसिक तनाव को और गहरा कर देती है। कुछ अध्ययनों में तापमान बढ़ने के साथ आत्महत्या के मामलों में वृद्धि भी देखी गई है।
इको एंग्जायटी में सोशल मीडिया का भी हाथ!
सोशल मीडिया ने इस चिंता को और बढ़ाया है। आज की पीढ़ी दुनिया भर की पर्यावरणीय तबाही को हर दिन अपनी स्क्रीन पर देख रही है। जंगलों में आग, बाढ़ में डूबते शहर, मरते जानवर और सूखती नदियों की तस्वीरें लोगों के भीतर लगातार भय पैदा करती हैं। कई विशेषज्ञ इसे ‘डूम-स्क्रॉलिंग कहते हैं, यानी लगातार नकारात्मक खबरें देखते रहना।
हालांकि मनोवैज्ञानिक यह भी कहते हैं कि इको-एंग्जायटी हमेशा बीमारी नहीं होती। कई बार यह एक स्वाभाविक मानवीय प्रतिक्रिया होती है। अगर कोई व्यक्ति पृथ्वी को बदलते देखकर डर महसूस करता है, तो यह इस बात का संकेत भी हो सकता है कि वह पर्यावरण और भविष्य की परवाह करता है।
लेकिन जब यह डर व्यक्ति की रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करने लगे, तब मदद की जरूरत पड़ सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे निपटने का सबसे अच्छा तरीका है चिंता को कार्रवाई में बदलना। छोटे-छोटे पर्यावरणीय कदम, सामुदायिक गतिविधियां, प्रकृति के साथ समय बिताना और समान सोच वाले लोगों के साथ जुड़ना मानसिक राहत दे सकता है।
कुछ विशेषज्ञ रैडिकल होप की बात करते हैं। यानी यह मानना कि स्थिति गंभीर है, लेकिन फिर भी बदलाव संभव है। उम्मीद का मतलब आंखें बंद कर लेना नहीं, बल्कि समस्या को समझते हुए उसके समाधान की दिशा में कदम उठाना है।
शायद यही वजह है कि दुनिया भर में बड़ी संख्या में युवा अब जलवायु आंदोलन से जुड़ रहे हैं। वे केवल धरती बचाने की लड़ाई नहीं लड़ रहे, बल्कि अपने भविष्य और मानसिक शांति के लिए भी आवाज उठा रहे हैं।
इको एंग्जायटी से इतर…
हालांकि इको एंग्जायटी शब्द अभी भारत में प्रचलित नहीं है। यह तो भविष्य की बात रही कि युवाओं पर मौजूदा दौर के जलवायु संकट को लेकर क्या असर पड़ा रहा। इससे इतर देखें तो कई शोध और रिपोर्टें साफ दिखाती हैं कि जलवायु परिवर्तन का असर किसानों के मानसिक स्वास्थ्य पर कितना ज्यादा पड़ रहा है।
भारत में महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना और बुंदेलखंड जैसे इलाकों में लगातार सूखा, अनियमित बारिश और फसल बर्बादी ने किसानों के भीतर गहरी मानसिक बेचैनी पैदा की है। कई रिपोर्टों में किसानों ने बताया कि हर मौसम उनके लिए डर लेकर आता है। कभी सूखा फसलें जला देता है तो कभी अचानक आई बाढ़ महीनों की मेहनत बहा ले जाती है।
महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र की एक रिपोर्ट में किसानों ने कहा कि अब खेती उम्मीद से ज्यादा डर का कारण बनती जा रही है। पानी की कमी, कर्ज और जलवायु परिवर्तन की वजह से कई परिवार मानसिक तनाव से जूझ रहे हैं। कुछ मामलों में यह तनाव आत्महत्या तक पहुंच गया।
इंडियन एक्सप्रेस की 2019 की एक रिपोर्ट के मुताबिक महाराष्ट्र सरकार की ‘प्रेरणा’ मानसिक स्वास्थ्य योजना के तहत सूखा प्रभावित 14 जिलों में 46 हजार से ज्यादा किसानों को अवसाद और मानसिक टूटन के कारण काउंसलिंग देनी पड़ी, जबकि 11 हजार से ज्यादा किसानों को गंभीर मानसिक स्थिति में अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।
एक अन्य अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में पाया गया कि भारत में सूखे वाले वर्षों में किसान आत्महत्याओं के मामले बढ़ जाते हैं। शोधकर्ताओं ने कहा कि जलवायु परिवर्तन खेती को अधिक अस्थिर और जोखिम भरा बना रहा है, जिससे किसानों में निराशा और मानसिक तनाव बढ़ रहा है।
2025 में प्रकाशित एक रिपोर्ट में महाराष्ट्र की मीराबाई खिंडकर की कहानी सामने आई, जिनके पति ने लगातार सूखा, कर्ज और फसल खराब होने के दबाव में आत्महत्या कर ली। रिपोर्ट में बताया गया कि बढ़ती गर्मी, पानी की कमी और अनियमित बारिश किसानों के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाल रही है।

