Wednesday, April 29, 2026
Homeभारतमद्रास हाई कोर्ट ने हिंदू दंपति को नियुक्त किया मुस्लिम बच्ची का...

मद्रास हाई कोर्ट ने हिंदू दंपति को नियुक्त किया मुस्लिम बच्ची का कानूनी अभिभावक, धर्म से ऊपर कल्याण की कही बात

मद्रास हाई कोर्ट ने गार्जियन्स एंड वार्ड्स एक्ट, 1890 का हवाला देते हुए यह फैसला सुनाया। बच्ची की मां ने गोद लेने पर अपनी सहमति जताई।

चेन्नईः मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै पीठ ने एक अहम फैसले में एक नाबालिग मुस्लिम लड़की की संरक्षकता (गार्जियनशिप) हिंदू दंपति को सौंपी है। अदालत ने इस दौरान टिप्पणी की कि बच्चे का कल्याण धर्म संबंधी विचारों से महत्वपूर्ण है।

जस्टिस एन आनंद वेंकटेश और जस्टिस केके रामकृष्णन की पीठ ने कहा कि बच्चे का कल्याण धर्म से परे है। इसलिए पीठ ने एस बालाजी द्वारा दायर याचिका को स्वीकार कर लिया। इस याचिका में बालाजी ने अपनी पत्नी के साथ बच्चे की कानूनी संरक्षक की मांग की थी।

मद्रास हाई कोर्ट ने क्या कहा?

अदालत ने कहा कि ” अदालत द्वारा विचार किया जाने वाला प्राथमिक कारक बच्चे का कल्याण है। इसके अलावा अदालत को बच्चे की आयु, लिंग और धर्म तथा प्रस्तावित अभिभावक के चरित्र और क्षमता पर विश्वास करना चाहिए।”

गौरतलब है कि यह दंपति निसंतान है। बार एंड बेंच की खबर के मुताबिक, दंपति बीते एक दशक के नाबालिग लड़की की जैविक मां से परिचित हैं। लड़की की मां दिहाड़ी मजदूर है और अपने पति की मौत के बाद तीन बच्चों का पालन-पोषण करने में परेशानी का सामना कर रही है। उसने स्वेच्छा से तीसरे बच्चे को जन्म के बाद ही दंपति को सौंप दिया था।

इसके बाद दंपति संरक्षकता की औपचारिकताओं के लिए पारिवारिक अदालत गए। हालांकि, अदालत ने 29 सितंबर 2025 को यह याचिका खारिज कर दी थी। अदालत ने हालांकि कहा कि किसी गैर मुस्लिम को अभिभावक को नियुक्त करने में कोई कानूनी बाधा नहीं है। इसके बावजूद अदालत ने याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि बच्ची एक लड़की है और दंपति उसके लिए ‘अपरिचित’ हैं।

बच्ची की मां ने क्या कहा?

मद्रास हाई कोर्ट के समक्ष जैविक मां ने बच्चे को गोद लेने के लिए सहमति देने की बात दोहराई। उसने कहा कि वह बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने में असमर्थ थी, इसलिए बच्चे को दंपति को देने का फैसला किया। इसके बाद पीठ ने दोनों पक्षों से बात की और बच्ची के दंपति के साथ रिश्ते की बात कही।

हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि “बच्ची अपीलकर्ता को पिता और उसकी पत्नी को मां कहती है। बच्ची प्राकृतिक मां को ‘आंटी’ कहकर बुलाती है।” अदालत ने इस दौरान गार्जियन्स एंड वार्ड्स एक्ट, 1890 का हवाला दिया जो कि गोद लेने के लिए धार्मिक बाध्यता नहीं रखता है।

यह भी पढ़ें – सुप्रीम कोर्ट का हेट स्पीच पर नई गाइडलाइंस जारी करने से इनकार, क्या-क्या बातें कही?

अदालत ने कहा कि “नाबालिग बच्चे का अभिभावक बनने का दावा करने के इच्छुक कोई भी व्यक्ति आवेदन कर सकता है।”

पीठ ने आगे कहा कि “अदालत को नाबालिग बच्चों के प्रति पक्षों के लगाव और भावनाओं तथा नाबालिग बच्चे के कल्याण के बीच संतुलन बनाना होगा, जो सर्वोपरि महत्व का है। ” अतः अदालत ने अपील को स्वीकार करते हुए दंपति को बच्चे का कानूनी अभिभावक नियुक्त किया।

अमरेन्द्र यादव
अमरेन्द्र यादव
लखनऊ विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातक करने के बाद जामिया मिल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई। जागरण न्यू मीडिया में बतौर कंटेंट राइटर काम करने के बाद 'बोले भारत' में कॉपी राइटर के रूप में कार्यरत...सीखना निरंतर जारी है...
RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular