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खबरों से आगे: राज्य नहीं, लेकिन उससे कम भी नहीं…लद्दाख के लिए केंद्र का नया मॉडल

गृह मंत्रालय के अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि इस समय लद्दाख को राज्य नहीं बनाया जा सकता क्योंकि वर्तमान में उसके पास कर्मचारियों के वेतन जैसे खर्च पूरे करने के लिए पर्याप्त राजस्व नहीं है। हालांकि, उन्होंने कहा कि जब भी लद्दाख राजस्व मानदंडों को पूरा करेगा, यह व्यवस्था उसे पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने की दिशा में ले जाएगी।

Leh File Photo- IANS
फाइल फोटो- IANS

पिछले कुछ वर्षों से केंद्र शासित प्रदेश (UT) लद्दाख में सुलग रहे असंतोष ने वहां चुनाव कराना असंभव बना दिया था। पिछले सप्ताह, लद्दाख नेतृत्व और गृह मंत्रालय के अधिकारियों के बीच चर्चा के बाद केंद्र शासित प्रदेश को सशक्त बनाने के स्वरूप पर एक व्यापक सहमति बनी। निकट भविष्य में एक निर्वाचित विधानमंडल और कुछ संवैधानिक सुरक्षा उपाय अधिकांश समस्याओं को खत्म कर सकते हैं।

लद्दाख के राजनीतिक सशक्तिकरण और सुरक्षा उपायों दोनों से जुड़े मुद्दों को देखते हुए केंद्र सरकार ने एक केंद्र शासित प्रदेश स्तरीय निकाय का प्रस्ताव रखा है, जिसमें विधायी, कार्यकारी और वित्तीय शक्तियां निर्वाचित प्रतिनिधियों के पास होंगी। प्रदेश के सभी नौकरशाह, जो सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) के प्रति जवाबदेह हैं, इस निर्वाचित निकाय के कार्यकारी प्रमुख के प्रति जवाबदेह होंगे। इसका अर्थ यह है कि लद्दाख का यह विधायी निकाय जम्मू-कश्मीर की निर्वाचित सरकार से भी अधिक शक्तियां रखेगा। उल्लेखनीय है कि जम्मू-कश्मीर में ऑल इंडिया सर्विसेस (AIS) उपराज्यपाल के अधिकार क्षेत्र में आती हैं।

ये निर्णय शुक्रवार (22 मई) को नई दिल्ली में आयोजित गृह मंत्रालय की उप-समिति की बैठक में लिए गए। इसमें गृह मंत्रालय के सीनियर अधिकारी, लद्दाख का यूटी का प्रशासन और लेह एपेक्स बॉडी (LAB) तथा कारगिल डेमोक्रेटिक एलायंस (KDA) के नेता शामिल हुए।

बैठक के बाद चेयरिंग दोरजे लाकरूक और असगर अली करबलई द्वारा जारी बयान में कहा गया कि विस्तृत और रचनात्मक विचार-विमर्श के बाद दोनों पक्ष कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर सिद्धांततः सहमत हुए हैं। बयान के अनुसार, ‘इस मॉडल में विधायी, कार्यकारी और वित्तीय शक्तियां यूटी-स्तरीय विधायी निकाय के माध्यम से निर्वाचित प्रतिनिधियों के पास होंगी। केंद्र शासित प्रदेश के सभी नौकरशाह, जिनमें मुख्य सचिव भी शामिल हैं, केंद्र शासित प्रदेश-स्तरीय निर्वाचित निकाय के कार्यकारी प्रमुख के अधीन होंगे।’

आने वाले दिनों में और साफ होगी तस्वीर

बैठक में भाजपा नेता और पूर्व अध्यक्ष-सह-मुख्य कार्यकारी पार्षद (CEC) लेह स्वायत्त पर्वतीय परिषद के ताशी ग्याल्सन भी थे। ताशी ने कहा कि केंद्र शासित प्रदेश-स्तरीय विधायी निकाय का सटीक स्वरूप, उसकी शक्तियां, नाम, चुनाव की पद्धति और अन्य मुद्दे आगे की बैठकों में तय किए जाएंगे।

लद्दाख के वरिष्ठ नेता थुपस्तान छेवांग, जो दो बार लेह से लोकसभा सांसद रह चुके हैं, उन्होंने कहा कि यूटी-स्तरीय नई संवैधानिक व्यवस्था का नाम उचित विचार-विमर्श के बाद तय किया जाएगा। छेवांग ने 2019 लोकसभा चुनाव से पहले कई मुद्दों पर पार्टी से मतभेद के कारण भाजपा छोड़ दी थी।

उन्होंने कहा कि सभी सात जिलों में जिला परिषदें होंगी और उन्हें अपने-अपने अधिकार क्षेत्रों में विशेष रूप से संस्कृति और भूमि से जुड़े मामलों में उचित स्वायत्तता दी जाएगी। विशाल क्षेत्रफल और बहुत कम आबादी के कारण स्थानीय लद्दाखी, बाहरी लोगों के अनियंत्रित प्रवेश के प्रति संवेदनशील हैं। इन्हीं मुद्दों को लेकर हुए आंदोलन ने एक समय बड़ी हिंसा को जन्म दिया था, जिसके कारण सोनम वांगचुक को पब्लिक सेफ्टी एक्ट (PSA) के तहत गिरफ्तार कर कई महीनों तक हिरासत में रखा गया था।

संयुक्त बयान के अनुसार, गृह मंत्रालय के अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि इस समय लद्दाख को राज्य नहीं बनाया जा सकता क्योंकि वर्तमान में उसके पास कर्मचारियों के वेतन जैसे खर्च पूरे करने के लिए पर्याप्त राजस्व नहीं है। हालांकि, उन्होंने कहा कि जब भी लद्दाख राजस्व मानदंडों को पूरा करेगा, यह व्यवस्था उसे पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने की दिशा में ले जाएगी। इसका अर्थ है कि नवंबर 2019 में बने इस केंद्र शासित प्रदेश को निकट भविष्य में राज्य का दर्जा मिलने की संभावना बहुत कम है।

मिलेगी नागालैंड, सिक्किम, मिजोरम जैसी संवैधानिक सुरक्षा

संयुक्त बयान में कहा गया, ‘LAB और KDA ने आज भारत सरकार के साथ सिद्धांततः सहमति बनाई है कि लद्दाख में लोकतंत्र की बहाली की जाए और अनुच्छेद 371A, 371F और 371G (जैसा नागालैंड, सिक्किम और मिजोरम में लागू है) की तर्ज पर संवैधानिक सुरक्षा प्रदान की जाए।’ बयान में आगे कहा गया कि केडीए और एलएबी कानूनी और संवैधानिक विशेषज्ञों से परामर्श लेकर गृह मंत्रालय के साथ इस व्यवस्था को आगे बढ़ाने संबंधी विवरणों पर मिलकर काम करेंगे।

अनुच्छेद 371A के तहत नागालैंड राज्य के लिए विशेष प्रावधान हैं, जिनमें (i) नागाओं की धार्मिक या सामाजिक प्रथाएं, (ii) नागा प्रथागत कानून और प्रक्रिया, (iii) नागा परंपरागत कानून के अनुसार दीवानी और आपराधिक न्याय प्रशासन, (iv) भूमि और उसके संसाधनों का स्वामित्व और हस्तांतरण शामिल हैं। इसी तरह के सुरक्षा उपाय आने वाले दिनों में लद्दाख के लिए भी तैयार किए जाएंगे।

अनुच्छेद 371F, जो सिक्किम से संबंधित है, उसमें सिक्किम विधानसभा की शक्तियों को परिभाषित किया गया है। लद्दाख का प्रस्तावित निर्वाचित निकाय व्यापक रूप से इस पूर्वोत्तर राज्य के मॉडल पर आधारित होगा। इसका नाम, शक्तियां और कुछ अन्य पहलू आने वाले दिनों में होने वाली चर्चाओं में तय किए जाएंगे।

ऐसे ही अनुच्छेद 371G के तहत मिजोरम राज्य के लिए विशेष प्रावधान हैं, जिनमें (i) मिजो समुदाय की धार्मिक या सामाजिक प्रथाएं, (ii) मिजो प्रथागत कानून और प्रक्रिया, (iii) मिजो प्रथागत कानून के अनुसार दीवानी और आपराधिक न्याय प्रशासन, (iv) भूमि का स्वामित्व और हस्तांतरण शामिल हैं।

यह अनुच्छेद 371G संविधान (53वां संशोधन), 1986 के माध्यम से भारतीय संविधान में जोड़ा गया था। इसने मिजोरम में दशकों से चली आ रही अशांति को कम करने और वहां शांति स्थापित करने में मदद की थी।

उम्मीद की जा रही है कि केंद्र और लद्दाख नेतृत्व के बीच हुआ नया समझौता दोनों पक्षों के बीच तनाव कम करने का रास्ता खोलेगा। इससे कई विकास परियोजनाएं, जो रुकी हुई थीं, फिर से गति पकड़ सकती हैं और लागू हो सकती हैं।

लद्दाख: समयसीमा निर्धारित नहीं पर जल्द लागू होगा नया सिस्टम

सूत्रों ने बताया कि गृह मंत्रालय, एलएबी और केडीए के सुझावों के साथ केंद्र शासित प्रदेश-स्तरीय विधायी निकाय का मसौदा तैयार करेगा और उसके बाद उसे लागू करेगा। हालांकि मंत्रालय ने इन प्रस्तावों को लागू करने के लिए कोई समयसीमा नहीं दी, जबकि लद्दाखी नेताओं ने इसकी मांग की थी। लेकिन अधिकारियों ने आश्वासन दिया कि इसे जल्द से जल्द लागू किया जाएगा।

थुपस्तान छेवांग ने कहा, ‘अनुच्छेद 371 के तहत लद्दाख की स्थिति सुरक्षित करने का समझौता, जिसमें छठी अनुसूची के प्रावधानों के साथ स्थानीय संस्थानों को सार्थक वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार, तथा मुख्यमंत्री के समकक्ष दर्जा रखने वाले नेता के साथ एक निर्वाचित केंद्र शासित-स्तरीय विधानमंडल शामिल होगा। यह इस क्षेत्र के लोगों के लिए ऐतिहासिक कदम है।’

छेवांग लद्दाख के सबसे प्रमुख राजनीतिक नेताओं में रहे हैं, जिन्होंने स्थानीय लोगों की आकांक्षाओं और मांगों को मुखर रूप से उठाया है। छेवांग ने कहा कि सहमति के विवरण गृह मंत्रालय द्वारा तैयार किए जाएंगे। सभी हितधारकों को समावेशी और सहभागी प्रक्रिया के लिए अपने सुझाव और सिफारिशें लिखित रूप में देने का अवसर मिलेगा।

बैठक में गृह मंत्रालय और यूटी प्रशासन लद्दाख के वरिष्ठ अधिकारियों के अलावा थुपस्तान छेवांग, हाजी हनीफा जान (सांसद), डॉ. मोहम्मद जाफर अखून (अध्यक्ष-सह-सीईसी, लद्दाख हिल काउंसिल), ताशी ग्याल्सन (भाजपा नेता और पूर्व सीईसी, लेह परिषद), चेयरिंग दोरजे लाकरूक, सोनम वांगचुक और दोरजे स्टांजिन (सभी एलएबी से); तथा असगर अली करबलई, सज्जाद कारगिली और गुलाम रसूल नगवी (केडीए से) उपस्थित थे।

एलएबी और केडीए पिछले पांच वर्षों से अधिक समय से लद्दाख के लिए राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची का दर्जा देने की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे थे।

गृह मंत्रालय द्वारा कई बैठकों का आयोजन किया गया। इनमें केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय की अध्यक्षता वाली उच्च स्तरीय समिति और उप-समिति की बैठकें शामिल थीं, जिनमें डोमिसाइल और आरक्षण जैसे मुद्दों पर भी चर्चा हुई।

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सन्त कुमार शर्मा

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