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पूजा-पद्धति को लेकर शिकायत करना पड़ा भारी, कोर्ट ने कहा- ‘हिंदू धर्म नाजुक नहीं’, स्वयंभू बाबा को जेल

जम्मू-कश्मीर की एक अदालत ने हाल ही में खुद को भगवान का दूत बताने वाले एक व्यक्ति को 49,000 रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया। उसने एक मंदिर में हिंदू रीति-रिवाजों का सही ढंग से पालन न होने का आरोप लगाते हुए एक बेबुनियाद आपराधिक शिकायत दर्ज कराई थी।

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Photo: IANS

श्रीनगर: जम्मू-कश्मीर की एक अदालत ने हाल ही में खुद को भगवान का दूत बताने वाले एक व्यक्ति को 49,000 रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया। उसने एक मंदिर में हिंदू रीति-रिवाजों का सही ढंग से पालन न होने का आरोप लगाते हुए एक बेबुनियाद आपराधिक शिकायत दर्ज कराई थी।

मुआवजे की रकम न देने और कोर्ट की अगली सुनवाई में शामिल न होने के फैसले की वजह से कोर्ट ने उस धर्मगुरु को 30 दिन के लिए जेल भेजने का आदेश दिया। 8 जून को डिस्ट्रिक्ट ज्यूडिशियल मोबाइल मजिस्ट्रेट ऋषभ कौशल ने आदेश दिया कि “इस कोर्ट के पास शिकायतकर्ता बाबा सीता राम दास को आज से 7 जुलाई, 2026 तक 30 दिन की साधारण कैद के लिए उधमपुर जिला जेल भेजने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचा है।”

राजस्थान के धर्मगुरु ने क्या शिकायत की थी?

जज ने साफ किया कि अगर वह (धर्मगुरु) पहले तय किया गया मुआवजा जमा करने के लिए मान जाते हैं तो उन्हें जेल की सजा से छूट मिल सकती है। राजस्थान के एक धर्मगुरु ने शिकायत दर्ज कराई थी कि मंदिर में कुछ मूर्तियों और शिवलिंगों की स्थापना हिंदू रीति-रिवाजों और परंपराओं के अनुसार नहीं की गई थी। उन्होंने कहा कि एक पेड़ के नीचे दो शिवलिंग नहीं लगाए जा सकते कुछ मूर्तियां सही ढंग से नहीं रखी गई थीं और मंदिर प्रबंधन ने धार्मिक अनुष्ठान और पूजा-पाठ सही तरीके से नहीं किए थे।

उन्होंने आगे दावा किया कि उन्हें पहले मंदिर में देखभाल करने वाले (केयरटेकर) के तौर पर रखा गया था लेकिन उन्हें तय की गई सैलरी नहीं दी गई। उनके मुताबिक, मेहनताना देने का वादा किए जाने के बावजूद उन्हें सिर्फ ₹1,700 दिए गए।

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कोर्ट को हालांकि शिकायत में कई कमियां मिलीं जैसे कि 2017 की कथित घटनाओं के लिए गैर-जरूरी धाराओं का इस्तेमाल किया गया था। कोर्ट ने कहा कि 2017 की घटनाओं को लेकर 2026 में दर्ज कराई गई शिकायत समय-सीमा (लिमिटेशन) के कारण मान्य नहीं थी।

J&K की अदालत ने क्या कहा?

अदालत ने यह भी कहा कि अगर उस धर्मगुरु के आरोपों को सच भी मान लिया जाए तो भी उनसे किसी अपराध का पता नहीं चलता। अदालत ने कहा ” धार्मिक रीति-रिवाजों, परंपराओं या मान्यताओं की किसी खास व्याख्या को लागू करने के लिए आपराधिक कानून का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता खासकर तब जब धार्मिक भावनाओं का अपमान करने या उन्हें ठेस पहुंचाने के पीछे कोई जानबूझकर किया गया काम या दुर्भावनापूर्ण इरादा न हो। “

अदालत ने यह निष्कर्ष निकाला कि शिकायतकर्ता आपराधिक न्याय प्रणाली के जरिए दूसरों पर अपनी निजी धार्मिक मान्यताएं थोपने की कोशिश कर रहा था।

सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा, “शिकायतकर्ता द्वारा सुझाई गई किसी विशेष पूजा पद्धति या अनुष्ठान का पालन न करना मात्र आपराधिक अपराध नहीं है।” अदालत ने आगे कहा कि कानून किसी व्यक्ति की धार्मिक प्रथाओं की निजी व्याख्या को दूसरों पर बाध्यकारी नहीं मानता केवल इसलिए कि वह व्यक्ति धार्मिक अधिकार या विशेषज्ञता का दावा करता है।

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इसके अतिरिक्त अदालत ने यह भी कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि बाबा ने वेतन न मिलने से संबंधित दीवानी विवाद को निपटाने के लिए दबाव बनाने की रणनीति के रूप में ही आपराधिक शिकायत दर्ज कराई है।

हिंदू धर्म कमजोर और नाजुक नहीं है

कोर्ट ने माना कि शिकायत झूठी, बेबुनियाद और परेशान करने वाली थी और इसे बिना किसी ठोस वजह के दर्ज कराया गया था। कोर्ट ने उस धर्मगुरु को आदेश दिया कि वह मंदिर समिति के उन सदस्यों को मुआवजा दे जिन्हें उसने ऐसी बेबुनियाद शिकायत करके परेशान किया था।

धर्मगुरु इस कार्रवाई को रोकने के लिए कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे पाया। उसने दावा किया कि वह एक धर्म-प्रचारक है जो सिर्फ हिंदू धर्म की रक्षा करने की कोशिश कर रहा था। कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया और कहा कि हिंदू धर्म न तो इतना कमजोर है और न ही इतना नाज़ुक कि उसकी रक्षा के लिए बेबुनियाद आपराधिक मुकदमों की जरूरत पड़े।

इसलिए उसे (धर्मगुरु) मंदिर समिति के उन 7 सदस्यों में से हर एक को 7,000 रुपये देने का आदेश दिया गया जिन्होंने शिकायत का विरोध किया था। इस तरह शिकायतकर्ता को कुल ₹49,000 का मुआवजा देना था।

बाद में वह मुआवजा देने में नाकाम रहे। वह 5 जून को होने वाली सुनवाई में भी शामिल नहीं हुए और अपने वकील के जरिए सुनवाई को टालने की गुहार लगाई। अदालत ने इस घटनाक्रम को गंभीरता से लिया और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 273 के तहत अदालत के आदेशानुसार मुआवजा न देने पर 30 दिन की जेल की सजा सुनाने का फैसला किया। गिरफ्तारी का वारंट भी जारी किया गया।

5 जून के आदेश में क्या कहा?

5 जून के आदेश में कहा गया कि “शिकायतकर्ता ने न केवल कई लोगों को अनावश्यक मुकदमेबाजी में उलझाया, बल्कि अदालत का कीमती समय और संसाधन भी बर्बाद किए, जिनका इस्तेमाल इस अदालत में फैसले के लिए लंबित वास्तविक विवादों के निपटारे में किया जा सकता था।”

इसके बाद पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया और 8 जून को अदालत में पेश किया। यहां आदेश दिया गया कि अगर वह मुआवजे की रकम देने से इनकार करता रहा तो उसे 30 दिनों के लिए जिला जेल भेज दिया जाएगा।

शिकायतकर्ता की ओर से वकील संजीत कुमार बवोरिया पेश हुए। जबकि मंदिर समिति के जिन सदस्यों ने मामले का विरोध किया उनकी ओर से वकील योग राज शर्मा पेश हुए।

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अमरेन्द्र यादव
लखनऊ विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातक करने के बाद जामिया मिल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई। जागरण न्यू मीडिया में बतौर कंटेंट राइटर काम करने के बाद 'बोले भारत' में कॉपी राइटर के रूप में कार्यरत...सीखना निरंतर जारी है...

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