नई दिल्लीः भारत ने एक बार फिर साफ कर दिया है कि आतंकवाद और द्विपक्षीय संधियां एक साथ नहीं चल सकतीं। विदेश मंत्रालय (एमईए) ने शुक्रवार को दो टूक कहा कि पाकिस्तान के साथ की गई सिंधु जल संधि (1960) तब तक स्थगित रहेगी, जब तक इस्लामाबाद सीमा पार से होने वाली आतंकी गतिविधियों को स्थायी और विश्वसनीय रूप से बंद नहीं कर देता।
साप्ताहिक मीडिया ब्रीफिंग के दौरान विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रंधीर जायसवाल ने भारत के इस संप्रभु फैसले को स्पष्ट करते हुए कहा, हमने सिंधु जल संधि को स्थगित कर रखा है और यह तब तक स्थगित रहेगी जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को पूरी तरह समाप्त नहीं कर देता।
दरअसल, हाल ही में भारत ने जम्मू-कश्मीर में चिनाब-ब्यास लिंक टनल परियोजना और सलाल बांध जलाशय से गाद (सिल्ट) निकालने की योजना बनाई है। पाकिस्तान ने भारत के इन कदमों पर आधिकारिक आपत्ति जताई और आरोप लगाया कि भारत पानी को एक रणनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहा है। पाकिस्तान की इसी बयानबाजी पर भारत की यह प्रतिक्रिया आई है।
पहलगाम आतंकी हमले के बाद से स्थगित है जल संधि
गौरतलब है कि पिछले साल जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए एक बड़े आतंकी हमले के बाद भारत सरकार ने कड़ा रुख अपनाया था। भारत ने अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अपने संप्रभु अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए सिंधु जल संधि को स्थगित कर दिया था।
स्थगन की इस अवधि के दौरान भारत इस संधि के तहत किसी भी दायित्व या शर्त का पालन करने के लिए बाध्य नहीं है। जब तक पाकिस्तान अपनी जमीन से पनप रहे आतंकवाद पर स्थायी और जमीन पर दिखने वाली कार्रवाई नहीं करता, तब तक संधि की बहाली पर कोई विचार नहीं किया जाएगा।
भारत ने पिछले महीने (15 मई 2026) अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान की एक और चाल को नाकाम कर दिया था। सिंधु जल संधि के तहत कथित रूप से गठित तथाकथित मध्यस्थता न्यायालय ने जल भंडारण क्षमता और संधि की व्याख्या को लेकर एक फैसला जारी किया था, जिसे भारत ने सिरे से खारिज कर दिया।
विदेश मंत्रालय ने इस न्यायाधिकरण की वैधता पर सवाल उठाते हुए कहा कि भारत ने कभी भी इसके गठन को मान्यता नहीं दी है, इसलिए इसकी कोई भी कार्यवाही, आदेश या फैसला भारत की नजर में कानूनी रूप से शून्य और अवैध है।
भारत का आरोप है कि पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों का दुरुपयोग कर अपनी जवाबदेही से बचने की कोशिश करता रहा है। इससे पहले भी भारत ने किशनगंगा और रतले जलविद्युत परियोजनाओं को लेकर आए फैसलों को संधि का उल्लंघन बताते हुए खारिज कर दिया था।
ब्रीफिंग के दौरान जब प्रवक्ता रंधीर जायसवाल से जम्मू-कश्मीर में स्विट्जरलैंड के राजदूत की यात्रा पर पाकिस्तान द्वारा की गई टिप्पणी के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने दोटूक लहजे में कहा कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न और अटूट हिस्सा है। वहां स्विस राजदूत या दुनिया के किसी भी अन्य देश के राजनयिक को जाने और घूमने की पूरी स्वतंत्रता है, और इस पर किसी तीसरे देश को टिप्पणी करने का कोई अधिकार नहीं है।
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क्या है सिंधु जल संधि?
सिंधु जल संधि पर 19 सितंबर 1960 को तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान द्वारा हस्ताक्षर किए गए थे। इस संधि के तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह नदियों के जल को दोनों देशों के बीच विभाजित किया गया था, जिसमें तीन पूर्वी नदियों (रावी, ब्यास, सतलुज) पर भारत का और तीन पश्चिमी नदियों (सिंधु, झेलम, चिनाब) के पानी पर मुख्य रूप से पाकिस्तान का अधिकार तय हुआ था। हालांकि, भारत को पश्चिमी नदियों पर भी ‘रन-ऑफ-द-रिवर’ (बिना पानी रोके) बिजली परियोजनाएं बनाने का सीमित अधिकार मिला हुआ है।



