अगर आप सब्जी मंडी, किराने की दुकान, मिठाई की दुकान या किसी छोटे बाजार में चले जाएं, तो आज भी दुकानदार बिना झिझक प्लास्टिक की थैली में सामान देकर विदा कर देते हैं। कई जगह ग्राहक खुद भी कपड़े या जूट का थैला साथ नहीं लाते और प्लास्टिक की थैली मांग लेते हैं। जबकि देश में सिंगल-यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध लागू हुए तीन साल से ज्यादा समय हो चुका है।
पूरी दुनिया आज (3 जुलाई) अंतरराष्ट्रीय प्लास्टिक बैग मुक्त दिवस मना रही है। इसका उद्देश्य लोगों को सिंगल यूज प्लास्टिक, खासकर प्लास्टिक कैरी बैग के इस्तेमाल से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान के प्रति जागरूक करना है। भारत ने भी 1 जुलाई 2022 से सिंगल-यूज प्लास्टिक (एसयूपी) पर देशव्यापी प्रतिबंध लागू किया था। लेकिन सवाल यह है कि तीन साल बाद क्या भारत वास्तव में ‘प्लास्टिक-फ्री’ होने की दिशा में आगे बढ़ पाया है?
प्लास्टिक प्रबंधन को लेकर 1999 से शुरू हुई सरकारी पहल
भारत में प्लास्टिक कचरे के प्रबंधन को लेकर कानूनी ढांचे की बात करें तो इसकी शुरुआत 1999 में हुई। इसके तहत प्लास्टिक के निर्माण, बिक्री और उपयोग को विनियमित किया गया। 20 माइक्रोन से कम मोटाई वाले प्लास्टिक कैरी बैग और रीसाइकिल्ड प्लास्टिक में खाद्य सामग्री की बिक्री पर रोक लगाई गई। चार साल बाद यानी 2003 में नियमों में संशोधन किया गया। इस संशोधन के बाद प्लास्टिक कैरी बैग पर पहले से लागू कुछ प्रतिबंधों में ढील दी गई।
वहीं साल 2011 में सरकार ने प्लास्टिक वेस्ट (मैनेजमेंट एंड हैंडलिंग) नियम लागू किए, जिनके तहत गुटखा, तंबाकू और पान मसाला की प्लास्टिक पाउच पैकेजिंग पर प्रतिबंध लगाया गया और 40 माइक्रोन से कम मोटाई वाले प्लास्टिक कैरी बैग पर भी रोक लगा दी गई। इसके बाद 2016 में प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट यानी पीडब्ल्यूएम नियम लागू किए गए, जिन्हें भारत की प्लास्टिक नीति में एक बड़ा बदलाव माना जाता है। पहली बार प्लास्टिक उत्पाद बनाने वाली कंपनियों, आयातकों और ब्रांड मालिकों को उनके उत्पादों से पैदा होने वाले प्लास्टिक कचरे के प्रबंधन के लिए जिम्मेदार बनाया गया। साथ ही मल्टी-लेयर प्लास्टिक को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने का प्रस्ताव भी रखा गया, हालांकि उद्योग जगत के विरोध के कारण इसे तत्काल लागू नहीं किया जा सका।
2018 के बाद सरकार का फोकस सिंगल-यूज प्लास्टिक पर केंद्रित हो गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2022 तक सिंगल-यूज प्लास्टिक को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने का लक्ष्य घोषित किया। इसके बाद 2019 में सिंगल-यूज प्लास्टिक के लिए मानक दिशा-निर्देश जारी किए गए और आयातित प्लास्टिक कचरे के प्रवेश पर रोक लगाई गई। और 2021 में प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट नियमों में संशोधन कर सिंगल-यूज प्लास्टिक की स्पष्ट परिभाषा तय की गई, जिसके आधार पर 1 जुलाई 2022 से कम उपयोगिता और अधिक कचरा फैलाने वाली कई सिंगल-यूज प्लास्टिक वस्तुओं के निर्माण, बिक्री और उपयोग पर देशभर में प्रतिबंध लागू कर दिया गया।
हर साल 39 से 41 लाख टन प्लास्टिक कचरा!
सरकारी आंकड़े बताते हैं कि प्लास्टिक को लेकर कार्रवाइयां जरूर तेज हुई हैं, लेकिन प्लास्टिक प्रदूषण की चुनौती अभी भी बरकरार है। इसी साल लोकसभा में पर्यावरण मंत्रालय ने लिखित जवाब में जानकारी दी थी कि 1 जुलाई 2022 से सिंगल-यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध लागू होने के बाद अब तक देशभर में 8,61,740 निरीक्षण किए जा चुके हैं। इस दौरान 1,985 टन प्रतिबंधित सिंगल-यूज प्लास्टिक जब्त की गई है और 19.82 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया गया है।
पर्यावरण मंत्रालय की मानें तो देश में हर वर्ष करीब 39 से 41 लाख टन प्लास्टिक कचरा पैदा हो रहा है। वहीं, भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) की सर्कुलर इकोनॉमी पर आधारित रिपोर्ट का अनुमान इससे भी अधिक है। रिपोर्ट के अनुसार देश में हर साल 10 से 12 मिलियन टन (1 से 1.2 करोड़ टन) प्लास्टिक कचरा उत्पन्न होता है, जिसका बड़ा हिस्सा या तो एकत्र ही नहीं हो पाता या वैज्ञानिक तरीके से उसका प्रबंधन नहीं हो पाता।
गौरतलब है कि सरकार ने इस समस्या से निपटने के लिए एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी (ईपीआर) व्यवस्था लागू की है। आसान भाषा में समझें तो इसका मतलब है कि जो कंपनियां प्लास्टिक पैकेजिंग में सामान बेचती हैं, उन्हें उस प्लास्टिक को वापस इकट्ठा कर उसका दोबारा उपयोग या सुरक्षित निपटान सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी भी उठानी होगी।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, अब तक 60,128 उत्पादक, आयातक और ब्रांड मालिक ईपीआर पोर्टल पर पंजीकृत हो चुके हैं। 3,012 प्लास्टिक कचरा प्रोसेस करने वाली इकाइयां भी पंजीकृत हैं और इनके जरिए करीब 207 लाख टन प्लास्टिक पैकेजिंग कचरे का दोबारा उपयोग लायक बनाने (रीसाइक्लिंग) का काम दर्ज किया गया है।
सबसे बड़ी चुनौती पैकेजिंग
भारतीय उद्योग परिसंघ की रिपोर्ट कहती है कि आज सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ प्लास्टिक की थैली नहीं है। असली समस्या प्लास्टिक पैकेजिंग बन चुकी है। चिप्स, बिस्कुट, नमकीन, दूध, ऑनलाइन मंगाया गया सामान, दवाइयां और रोजमर्रा के कई उत्पाद प्लास्टिक पैकेट में ही बिकते हैं। इनमें से बड़ी मात्रा का सुरक्षित निपटान नहीं हो पाता।
रिपोर्ट के मुताबिक, केवल प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाने से समस्या खत्म नहीं होगी। जरूरत है कि प्लास्टिक का इस्तेमाल कम किया जाए, जहां संभव हो वहां उसका दोबारा उपयोग हो और इस्तेमाल के बाद उसे फिर से उपयोग लायक बनाया जाए।
भारत में प्लास्टिक कचरे का बड़ा हिस्सा कबाड़ी और कचरा बीनने वाले लोग इकट्ठा करते हैं। सीआईआई का कहना है कि अगर इन्हें बेहतर सुविधाएं, प्रशिक्षण और सरकारी व्यवस्था से जोड़ा जाए तो प्लास्टिक कचरे का काफी बड़ा हिस्सा दोबारा इस्तेमाल के लिए तैयार किया जा सकता है।
सिर्फ प्रतिबंध लगाने से निकलेगा समाधान?
सीआईआई की रिपोर्ट में विशेषज्ञों के हवाले से बताया गया है कि प्लास्टिक प्रदूषण की समस्या का समाधान केवल प्रतिबंध लगाने या जुर्माना वसूलने से नहीं होगा। इसके लिए लोगों के व्यवहार और पूरी व्यवस्था, दोनों में बदलाव जरूरी है। सबसे पहले कपड़े, जूट और कागज से बने थैलों को इतना सस्ता और आसानी से उपलब्ध कराना होगा कि लोग प्लास्टिक की थैली की जगह इन्हें अपनाएं।
घरों में सूखा और गीला कचरा अलग-अलग रखने की आदत को बढ़ावा देना होगा, ताकि प्लास्टिक को बाकी कचरे से अलग करके उसका दोबारा इस्तेमाल किया जा सके। शहरों में ऐसे केंद्रों की संख्या भी बढ़ानी होगी जहां प्लास्टिक कचरे की छंटाई और प्रसंस्करण हो सके। साथ ही कंपनियों को कम प्लास्टिक वाली पैकेजिंग अपनाने और उसके निपटान की जिम्मेदारी निभाने के लिए और अधिक जवाबदेह बनाना होगा। आम लोगों की भी इसमें बड़ी भूमिका है। बाजार जाते समय अपना कपड़े या जूट का थैला साथ ले जाने जैसी छोटी आदतें भी प्लास्टिक के इस्तेमाल को काफी हद तक कम कर सकती हैं।
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