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ट्रंप के समर्थन वाला थाईलैंड और कंबोडिया के बीच हुआ सीजफायर केवल 6 हफ्ते में कैसे टूट गया?

थाईलैंड और कंबोडिया के नेताओं ने 26 अक्टूबर को डोनाल्ड ट्रंप की मौजूदगी में एक सीजफायर डील पर हस्ताक्षर किया था। इसके बाद कंबोडिया ने ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नॉमिनेट भी किया था।

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कुछ ही दिन पहले 26 अक्टूबर को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप उस समय बहुत खुश नजर आए थे, जब थाईलैंड और कंबोडिया के नेताओं ने युद्धविराम समझौते पर हस्ताक्षर किए। इससे पहले कुछ दिनों के संघर्ष में 48 लोगों की मौत हो चुकी थी और 3,00,000 लोगों को विस्थापित होना पड़ा था।

हालांकि, महज छह हफ्ते बाद दोनों एशियाई देशों के बीच एक बार फिर युद्ध जैसी स्थिति पैदा हो गई है। थाईलैंड ने कंबोडिया पर हवाई हमले किए। बैंकॉक की सैन्य कार्रवाई, कथित तौर पर नोम पेन्ह (कंबोडिया की राजधानी) द्वारा किए गए हमले के जवाब में थी, जिसमें एक थाई सैनिक मारा गया था।

कुल मिलाकर देखें तो दोनों ही पड़ोसियों ने एक-दूसरे पर युद्धविराम समझौते को तोड़ने का आरोप लगाया है। सवाल है कि आखिर हो क्या रहा है? थाईलैंड-कंबोडिया संघर्ष ट्रंप समर्थित युद्धविराम से हवाई हमलों तक फिर कैसे पहुँच गया? आईए समझने की कोशिश करते हैं।

थाईलैंड-कंबोडिया के बीच ताजा हिंसा

दरअसल, सोमवार तड़के थाईलैंड ने पड़ोसी देश कंबोडिया पर हवाई हमले शुरू कर दिए। थाई सेना के प्रवक्ता मेजर जनरल विन्थाई सुवारी ने कहा कि यह कार्रवाई कंबोडियाई सैन्य ढाँचे को निशाना बनाकर की गई और सोमवार को हुए एक हमले का बदला थी जिसमें एक थाई सैनिक मारा गया था।

थाईलैंड के सैन्य अधिकारियों ने पुष्टि की है कि उन्होंने प्राचीन मंदिर प्रशांत ता क्रबेई (थाई में क्वाई) तक जाने वाली एक केबल कार को नष्ट कर दिया है। सेना ने कहा कि स्थानीय समयानुसार सुबह लगभग 9:20 बजे हिल 350 और कंबोडियाई कंक्रीट की सीढ़ियों तक जाने वाली केबल कार को हवाई हमले में नष्ट कर दिया गया।

एक अलग बयान में रॉयल थाई एयर फोर्स (RTAF) ने कहा, ‘कंबोडिया ने भारी हथियार जुटाए हैं, लड़ाकू यूनिट को फिर से तैनात किया है और फायर सपोर्ट एलिमेंट तैयार की हैं, ये गतिविधियाँ सैन्य अभियानों को बढ़ा सकती हैं और थाई सीमा क्षेत्र के लिए खतरा पैदा कर सकती हैं।’

थाईलैंड के प्रधानमंत्री ने टेलीविजन पर दिए गए अपने बयान में कहा कि देश की रक्षा और जन सुरक्षा के लिए जरूरत पड़ने पर सैन्य अभियान चलाए जाएँगे। उन्होंने कहा, ‘थाईलैंड ने कभी हिंसा की इच्छा नहीं की। मैं दोहराना चाहूँगा कि थाईलैंड ने कभी कोई लड़ाई या हमला शुरू नहीं किया है, लेकिन अपनी संप्रभुता का उल्लंघन कभी बर्दाश्त नहीं करेगा।’

थाईलैंड के अनुसार, कंबोडिया ने सीमा पर झड़प करके स्थिति को और बिगाड़ दिया। इसके परिणामस्वरूप एक सैनिक मारा गया और आठ घायल हो गए।

हालाँकि, कंबोडिया ने कुछ और बताया है। कंबोडिया के राष्ट्रीय रक्षा मंत्रालय ने ताजा तनाव के लिए थाईलैंड को जिम्मेदार ठहराया और कहा है कि थाई सेना ने सोमवार सुबह कंबोडियाई सैनिकों पर हमले शुरू कर दिए। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि ‘कई दिनों तक उकसावे वाली कार्रवाई’ के बावजूद, कंबोडिया ने कोई जवाबी कार्रवाई नहीं की।

कंबोडिया के ओद्दार मींचे प्रांत में तीन कम्बोडियाई नागरिकों के गंभीर रूप से घायल होने की बात प्रांत के उप-गवर्नर मेट मीसफेकडे ने बताई।

कंबोडियाई रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता माली सोचेता ने बताया कि सोमवार सुबह 7 बजे से कुछ पहले थाईलैंड ने टैंकों, जहरीली गैस और तोपखाने का इस्तेमाल शुरू कर दिया और कंबोडियाई सेना और नागरिक ठिकानों पर हमला किया।

इसके अलावा, कंबोडिया के पूर्व प्रधानमंत्री हुन सेन ने अपने देश की सेनाओं से संयम बरतने का आग्रह करते हुए कहा कि थाईलैंड ‘हमें जवाबी कार्रवाई के लिए मजबूर करने’ की कोशिश कर रहा है। हुन सेन ने एक फेसबुक पोस्ट में कहा, ‘जवाबी कार्रवाई की समय सीमा पहले ही तय कर दी गई है। मैं सभी स्तरों के कमांडरों से आग्रह करता हूँ कि वे सभी अधिकारियों और सैनिकों को इसके अनुसार प्रशिक्षित करें।’

थाईलैंड और कंबोडिया के बीच ताजा संघर्ष कैसे शुरू हुआ?

11 नवंबर को कुछ ऐसा हुआ जिसने कुछ दिन पहले हुए सीजफायर के बावजूद तल्खियों में इजाफा करना शुरू कर दिया। थाईलैंड ने कहा कि लैंडमाइन ब्लास्ट में एक थाई सैनिक के घायल होने के बाद वह कंबोडिया के साथ सीजफायर समझौता तोड़ रहा है। वहीं, कंबोडिया के रक्षा मंत्रालय ने नई लैंडमाइन बिछाने के आरोप से इनकार किया।

कंबोडिया के एक व्यक्ति की 12 नवंबर को मौत हो गई। पड़ोसियों ने एक-दूसरे पर गोलीबारी का आरोप लगाया।

इसके करीब 26 दिन बाद यानी 7 दिसंबर को दोनों के बीच तनाव चरम पर दिखा। कंबोडिया के रक्षा मंत्रालय की प्रवक्ता लेफ्टिनेंट जनरल माली सोचेता ने थाई सेना पर प्रीह विहियर प्रांत के चोम क्रोसन जिले के फलान थॉम इलाके में दोपहर 2.15 बजे टकराव शुरू करने का आरोप लगाया।

तो वहीं, थाइलैंड के प्रमुख मीडिया आउटलेट द नेशन ने आर्मी प्रवक्ता के हवाले से बताया कि कंबोडियन सैनिकों ने सी सा केट प्रांत के कंथारालक जिले के फू फा लेक-फ्लान हिन पेट कोन इलाके में हमला किया, जिसके बाद 8 दिसंबर को एयर स्ट्राइक का फैसला लिया गया।

थाईलैंड ने हवाई हमले शुरू किए। उसने तर्क दिया कि उसके सैनिक कंबोडिया की ओर से हुई गोलीबारी की चपेट में आ गए। दोनों देशों ने एक-दूसरे पर युद्धविराम उल्लंघन का आरोप लगाया। इस बीच थाई अधिकारियों का कहना है कि लाखों नागरिकों को तनावग्रस्त इलाकों से निकाला जा रहा है।

ट्रंप के सामने हुआ था सीजफायर पर समझौता

इस साल 28 मई को कंबोडिया के रक्षा मंत्रालय ने बताया कि गोलीबारी की एक वारदात में उनके एक सैनिक की मौत हो गई। 2011 में हुए इसी तरह की घटना हुई थी। करीब 14 साल बाद इतिहास दोहराया गया।

फिर 23 जुलाई को थाइलैंड ने कंबोडिया से अपने उच्चायुक्त को वापस बुलाया और विवादित बॉर्डर पर हुए एक लैंडमाइन ब्लास्ट की घटना का जिक्र किया, जिसमें एक थाई सैनिक घायल हो गया था। उसने कहा कि वह कंबोडिया के एम्बेसडर को भी अपने देश से निकाल देगा।

24 जुलाई को बॉर्डर पर दोनों हथियारों के साथ आपस में भिड़े। दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर पहले फायरिंग करने का आरोप लगाया। थाईलैंड ने एफ-16 जेट तैनात किए, जिनमें से एक ने कंबोडियाई मिलिट्री टारगेट पर बमबारी की।

25 जुलाई वो तारीख थी जब फ्रंटलाइन पर तोपों से गोले दागे जाने लगे और रॉकेट बरसाए गए। इसके अगले दिन ही ट्रंप एक्शन में आए। उन्होंने दोनों देशों के नेताओं से फोन पर बात की और सीजफायर के लिए कहा। इसके बाद दोनों ही बातचीत पर सहमत हो गए। ट्रंप ने ये भी कहा कि सीजफायर हो जाने पर ट्रेड टैरिफ पर वाशिंगटन के साथ उनकी बातचीत फिर से शुरू हो सकती है।

28 जुलाई को मलेशिया, अमेरिका और चीन की मध्यस्थता के बाद दोनों देशों के नेता मलेशिया के पुत्रजया में आमने-सामने बैठे। दोनों ने दुश्मनी खत्म करने, सीधी बातचीत फिर से शुरू करने और युद्धविराम करने के लिए एक सिस्टम बनाने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए।

26 अक्टूबर को ट्रंप आसियान सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए मलेशिया में थे। यहीं पर थाईलैंड और कंबोडिया के नेताओं ने ट्रंप की मौजूदगी में एक सीजफायर डील किया। इसके बाद कंबोडिया ने ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नॉमिनेट भी किया।

पुराना है दोनों देशों के बीच का संघर्ष

दोनों दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के बीच झगड़ा पुराना है। दोनों के बीच सीमा तनाव की शुरुआत 1900 के दशक के शुरुआती वर्षों में हुई थी। यह वह दौर था जब कंबोडिया में फ्रांस का शासन था। थाईलैंड, जिसे उस समय सियाम के नाम से जाना जाता था, वो एक स्वतंत्र राष्ट्र था।

1907 में फ्रांसीसियों ने थाईलैंड और कंबोडिया के बीच सीमा निर्धारित की। यह सीमा दोनों देशों के बीच प्राकृतिक सीमा रेखा के अनुरूप होनी थी। हालाँकि, बाद में थाईलैंड ने इस पर विरोध जताया। जब द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ा, तो जापान ने इस क्षेत्र पर कब्जा कर लिया।

युद्ध के दौरान थाईलैंड ने उन क्षेत्रों पर फिर से नियंत्रण प्राप्त कर लिया। हालाँकि, जापान के अमेरिका के सामने आत्मसमर्पण करने के बाद इन क्षेत्रों का नियंत्रण कंबोडिया के पास वापस आ गया। यहीं से विवाद की शुरुआत होती है और दोनों देशों ने कई साल समय सीमा विवादों में उलझे रहने में बिताया है।

हालाँकि दोनों देशों ने इस मुद्दे को बार-बार सुलझाने की कोशिश की है। इसी कोशिश में 2000 में एक संयुक्त सीमा आयोग (Joint Boundary Commission) का गठन भी किया गया। लेकिन इससे कोई खास फायदा नहीं हुआ है।

इस विवादित क्षेत्र में खासकर मंदिरों का स्वामित्व एक पेचीदा विषय रहा है। 11वीं शताब्दी का एक हिंदू मंदिर जिसे थाईलैंड में प्रीह विहियर या खाओ फ्रा विहारन (Khao Phra Viharn) कहा जाता है, वो दोनों देशों के बीच बड़ी बहस का विषय रहा है।

अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय ने 1962 में इस मंदिर को कंबोडिया को सौंप दिया था, लेकिन थाईलैंड आसपास की जमीन पर अपना दावा करता रहा है। ता मोआन थॉम और ता मुएन थॉम जैसे कुछ अन्य मंदिर भी हैं जो इन विवादित क्षेत्रों में आते हैं।

साल 2008 में कंबोडिया द्वारा प्रीह विहियर मंदिर को यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में सूचीबद्ध करने के प्रयास के बाद तनाव बढ़ गया। इसका नतीजा ये हुआ कि कई सालों तक झड़पें हुईं और कम से कम एक दर्जन लोग मारे गए। इसमें 2011 में एक सप्ताह तक दोनों ओर से हुई गोलीबारी और तोपों का इस्तेमाल भी शामिल है। इन संघर्षों के बीच हजारों लोगों को विस्थापित होना पड़ा।

इस बीच 2013 में, कंबोडिया के आग्रह पर अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय ने एक बार फिर अपने पुराने फैसले की पुष्टि की। अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय ने कंबोडिया के पक्ष में फैसला सुनाया और कहा कि मंदिर के आसपास की जमीन भी कंबोडिया का हिस्सा है। थाई सैनिकों को वहाँ से हटने का आदेश दिया। जाहिर तौर पर यह फैसला यह थाईलैंड को रास नहीं आया।

थाईलैंड कहता रहा है कि वह अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के फैसले को स्वीकार नहीं करता और दोनों देशों के बीच किसी भी सीमा संबंधी विवाद का समाधान मौजूदा द्विपक्षीय व्यवस्था के तहत किया जाना चाहिए। वहीं, कंबोडिया का कहना है कि वह इस मामले को बंद मानता है और इस विषय पर थाईलैंड के साथ बातचीत करने से इनकार करता है।

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विनीत कुमार
पूर्व में IANS, आज तक, न्यूज नेशन और लोकमत मीडिया जैसी मीडिया संस्थानों लिए काम कर चुके हैं। सेंट जेवियर्स कॉलेज, रांची से मास कम्यूनिकेशन एंड वीडियो प्रोडक्शन की डिग्री। मीडिया प्रबंधन का डिप्लोमा कोर्स। जिंदगी का साथ निभाते चले जाने और हर फिक्र को धुएं में उड़ाने वाली फिलॉसफी में गहरा भरोसा...

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