आज मुंबई (बॉम्बे) की गिनती दुनिया के सबसे बड़े फिल्म निर्माण केंद्रों में होती है। हर साल यहां हॉलीवुड से भी अधिक फिल्में बनती हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत में ‘चलचित्र’ यानी सिनेमा की शुरुआत कैसे हुई थी? आज से 130 साल पहले, जब लोगों ने पहली बार बड़े पर्दे पर चलती हुई ट्रेन देखी, तो वे इस कदर दहशत में आ गए कि थियेटर में चीख-पुकार मच गई थी। आइए जानते हैं भारत में सिनेमा की एंट्री कब और कैसे हुई?
यह कहानी शुरू होती है साल 1896 से। दिन था 7 जुलाई। इसी दिन बॉम्बे के ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ अखबार में एक अनोखा विज्ञापन छपा। इस विज्ञापन में शहरवासियों को मुंबई के आलीशान ‘वॉटसन होटल’ में “सदी की महानतम उपलब्धि और दुनिया के सबसे बड़े चमत्कार” को देखने के लिए आमंत्रित किया गया था।
फ्रांस के मशहूर आविष्कारक लुई और ऑगस्टे लुमियर (लुमिय ब्रदर्स) ने दिसंबर 1895 में पेरिस में दुनिया का पहला सफल फिल्म प्रदर्शन किया था। इसके ठीक 6 महीने बाद, वे अपनी फिल्मों को प्रदर्शित करने ऑस्ट्रेलिया जा रहे थे, लेकिन रास्ते में पड़ने वाले कॉस्मोपॉलिटन शहर बॉम्बे को देखकर उन्होंने यहाँ रुकने का फैसला किया।
वॉटसन होटल में शाम 6 से 10 बजे के बीच चार अलग-अलग शो रखे गए। हर शो का टिकट 1 रुपये था, जो उस जमाने के लिहाज से एक बहुत बड़ी रकम थी। इस शो में दर्शकों को आज की तरह नाच-गाना, डायलॉग या फास्ट एक्शन देखने को नहीं मिला, बल्कि 17-17 मीटर लंबी छह लघु फिल्में दिखाई गईं, जो सामान्य जीवन के दृश्यों पर आधारित थीं।
जब ‘ट्रेन’ देखकर भागने लगे दर्शक और महिलाएं हुईं बेहोश
उन छह लघु फिल्मों का प्रदर्शन हुआ-अराइवल ऑफ ए ट्रेन एट ला सियोटा, लीविंग द लुमियर फैक्ट्री, द स्प्रिंकलर स्प्रिंकल्ड, द सी बाथ, द डिमोलिशन ऑफ ए वॉल, बेबीज मील। सबसे भयानक और चर्चित फिल्म थी-‘अराइवल ऑफ ए ट्रेन’। इस फिल्म में कोई कहानी नहीं थी, बस एक ट्रेन प्लेटफॉर्म की तरफ आकर रुकती है।
एरिक बार्नो और एस. कृष्णा स्वामी की किताब ‘इंडियन फिल्म्स’ और इतिहासकार मिहिर बोस के दावों के अनुसार, जब यह सीन पहली बार बड़े पर्दे पर दिखाया गया, तो जादू सरीखे इस नजारे को देखकर दर्शक सन्न रह गए। ब्लैक एंड व्हाइट पर्दे पर तेजी से अपनी तरफ आती ट्रेन को देखकर लोगों को लगा कि वह स्क्रीन से निकलकर उन्हें कुचल देगी। दहशत के मारे कुछ लोग अपनी सीट छोड़कर दरवाजे की तरफ भागने लगे, कई महिलाएं डरकर बेहोश हो गईं और प्रशासन को उनकी देखभाल के लिए नर्सों तक को बुलाना पड़ा।
इसी तरह, एक अन्य फिल्म ‘डेमोलिशन’ (विध्वंस) में जब राजमिस्त्री को दीवार गिराते दिखाया गया, तो दर्शकों को वैसा ही रोमांच मिला जैसा आज के दौर में किसी भारी-भरकम बजट वाली एक्शन फिल्म को देखकर मिलता है।
सिनेमा का चार आने का चस्का!
वॉटसन होटल में मिली अपार कामयाबी के बाद लुमियर ब्रदर्स ने इसका नियमित प्रदर्शन मुंबई के ही ‘नॉवेल्टी थिएटर’ में शुरू कर दिया। वॉटसन में जहाँ टिकट 1 रुपये था, वहीं नॉवेल्टी थियेटर में आम जनता के लिए सबसे पीछे की सीट की कीमत सिर्फ चार आने रखी गई। सबसे आगे आर्केस्ट्रा के साथ बैठने वालों के लिए 2 रुपये का टिकट था।
चलती-फिरती तस्वीरों को देखने की उत्सुकता लोगों में इतनी बढ़ी कि फिल्मों की संख्या 6 से बढ़ाकर 24 कर दी गई। जो शो केवल 3 दिन चलना था, वह पूरे एक महीने (15 अगस्त 1896 तक) चलता रहा। पर्दा करने वाली महिलाओं और परिवारों के लिए अलग से ‘बॉक्स’ की व्यवस्था की गई थी। ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ ने तब लिखा था कि “लुमियर बंधुओं का यह आविष्कार आधुनिक युग का एक महान वैज्ञानिक आविष्कार है।”
दिलचस्प बात यह है कि जिस दिन (7 जुलाई 1896) यह शो बॉम्बे में शुरू हुआ, ठीक उसी दिन रूस के सेंट पीटर्सबर्ग में भी पहली बार सिनेमा दिखाया गया था। लगभग इसी दौरान चीन, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका में भी सिनेमा की एंट्री हुई। भारत उन शुरुआती देशों में शामिल था, जहां सिनेमा ने बहुत जल्दी दस्तक दे दी थी।
भारतीय सिनेमा का उदय
लुमियर ब्रदर्स तो 15 अगस्त को चले गए, लेकिन भारतीयों को इस चलती-फिरती तस्वीरों का चस्का लग चुका था। लुमियर ब्रदर्स की फिल्मों का सबसे गहरा असर मुंबई के फोटोग्राफर हरिश्चंद्र सखाराम भाटवडेकर, जिन्हें सावे दादा के नाम से जाना जाता है, पर पड़ा। फिल्मों का प्रदर्शन देखने के बाद उन्होंने इंग्लैंड से मोशन पिक्चर कैमरा मंगवाया, जो भारत में आने वाला अपनी तरह का पहला कैमरा था।
1899 में उन्होंने मुंबई के हैंगिंग गार्डन में दो पहलवानों के कुश्ती मुकाबले पर आधारित ‘द रेसलर्स’ बनाई। इसे भारत में शूट की गई पहली मोशन पिक्चर माना जाता है। इसके बाद उन्होंने समाचार घटनाओं और सार्वजनिक आयोजनों पर कई लघु फिल्में बनाईं। इसी कारण उन्हें भारत का पहला डॉक्यूमेंट्री फिल्मकार भी कहा जाता है।
1896 के बाद भारत में विदेशी फिल्मों का प्रदर्शन लगातार बढ़ता गया। 4 जनवरी, 1897 से मुंबई के ‘गेटी थियेटर’ में नियमित शो शुरू हो गए। जल्द ही इन फिल्मों में यूनान-तुर्की युद्ध, नेल्सन की मृत्यु और लंदन फायर ब्रिगेड जैसे ऐतिहासिक वृत्तचित्र (डॉक्यूमेंट्री) दिखाए जाने लगे।
1902 के आसपास कलकत्ता में जे एफ मदन और बंबई में अब्दुल अली यूसुफ अली ने तंबुओं में फिल्मों का प्रदर्शन शुरू किया। आगे चलकर दोनों ने फिल्म वितरण का ऐसा नेटवर्क तैयार किया, जो बर्मा (अब म्यांमार) और सीलोन (अब श्रीलंका) तक फैल गया। भारतीय दर्शकों के बीच फिल्मों की लोकप्रियता तेजी से बढ़ने लगी।
दादासाहेब फाल्के ने रखा भारतीय सिनेमा का आधार
लुमियर ब्रदर्स के प्रदर्शन के लगभग 17 वर्ष बाद भारत ने अपनी पहली पूर्ण लंबाई की फीचर फिल्म देखी। 3 मई 1913 को दादासाहेब फाल्के की ‘राजा हरिश्चंद्र’ रिलीज हुई। इसे भारतीय सिनेमा की पहली फीचर फिल्म का दर्जा मिला। यह भी दिलचस्प है कि दादाा साहब फाल्के का सिनेमा की तरफ रुझान कैसे हुआ। दरअसल फाल्के 40 की उम्र पार कर रहे थे, उसी समय उनका फाइन प्रिंटिंग का धंधा अचानक ठप पड़ गया। आर्थिक परेशानियों से वे तनाव में आ गए। एक रोज अवसाद में ही 1910 में एक क्रिसमस शो देखने चले गए। फिल्म थी लाइफ ऑफ क्राइस्ट। यह अमेरिकी फिल्म थी। फाल्के के लिए फिल्म देखने का पहला अनुभव था।
वह इस चमत्कार से इतने अभिभूत हुए कि उसी दिन उन्होंने यह तय कर लिया कि ऐसी ही एक फिल्म रामायण और महाभारत की कथाओं पर बननी चाहिए। फिर क्या था, यहीं से फाल्के के भीतर एक फिल्मकार ने जन्म लिया। उन्होंने सिनेमा के सारे कौशल सीखे। पैसे जुटाए और 5 डॉलर में एक कैमरा खरीदा। इसी कैमरे से उन्होंने एक साल तक 20-20 घंटे काम करने के बाद ‘मटर के बीज का विकास’ नामक एक फिल्म (वृत्तचित्र) बना डाली। इसके बाद 1912 में वह इंग्लैंड गए और वहां से उन्होंने विलियम्सन कैमरा लेकर वापस लौटे। पत्नी के कुछ गहने गिरवी रखे, कुछ पूंजी जुटाई और बना दी पहली फिचर फिल्म राजा हरिश्चंद्र। यहीं से भारतीय सिनेमा का आगाज हुआ। 14 मार्च 1931 को ‘आलम आरा’ रिलीज हुई, जो भारत की पहली बोलती फिल्म थी। इस फिल्म ने मूक फिल्मों के दौर का अंत कर दिया और भारतीय सिनेमा एक नए युग में प्रवेश कर गया।
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