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मानसून के बाद भी भारत के शहरों में क्यों महसूस हो रही गर्मी? उमस भरे गर्मी के दिनों की संख्या में बढ़ोतरी; स्टडी में क्या पता चला?

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फोटोः ग्रोक

नई दिल्ली: मानसून हालांकि उत्तर भारत में पहुंच चुका है और विभिन्न राज्यों में बारिश हो रही है लेकिन सिर्फ बारिश से ही गर्मी से राहत की गारंटी नहीं मिलती। 2021 से 2025 के हीट इंडेक्स के आंकड़ों से पता चलता है कि ज्यादा नमी की वजह से दिल्ली में अक्सर हवा के तापमान के मुकाबले ज्यादा गर्मी महसूस हुई।

जुलाई-अगस्त में हीट इंडेक्स अक्सर 46-50°C से ऊपर चला जाता था जिससे बहुत ज्यादा बेचैनी और परेशानी होती थी। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) की पिछले सितंबर की एक पॉलिसी ब्रीफ के मुताबिक, इस बेचैनी की वजह से ज्यादा बिजली की खपत का समय और तीव्रता बढ़ गई क्योंकि अक्सर ऐसे मौसम में राहत के लिए कूलिंग सिस्टम का ज्यादा इस्तेमाल होता है। गर्मी से राहत के लिए एयर कंडीशनर का इस्तेमाल देर तक हुआ।

अपने हीट एक्शन प्लान (HAP) के तहत दिल्ली प्रशासन ने अस्थायी कूलिंग जोन, मोबाइल वैन और अस्पतालों में कूल वार्ड शुरू किए हैं। आपातकालीन उपाय तो मौसम के हिसाब से होते ही हैं लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि बदलते तापमान के पैटर्न से निपटने के लिए भारतीय शहरों को जानकारी पर आधारित, खास मकसद वाले और साल भर चलने वाले प्रोग्राम तेजी से अपनाने चाहिए।

गर्मी का बदलता पैटर्न क्यों है चिंता का विषय?

गर्म रातों की संख्या में चिंताजनक बढ़ोतरी हो रही है। इंडो-गैंगेटिक प्लेन (गंगा-सिंधु के मैदानी इलाकों) में रिलेटिव ह्यूमिडिटी (सापेक्ष आर्द्रता) बढ़ रही है। इसके चलते दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद, हैदराबाद, भोपाल और भुवनेश्वर जैसे घनी आबादी वाले शहरी और आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण जिलों में गर्मी का असर ज्यादा महसूस किया जा रहा है।

काउंसिल ऑन एनर्जी एनवायरनमेंट एंड वॉटर (CEEW) ने पिछले साल इन अहम ट्रेंड्स को उजागर करने के लिए 734 जिलों में गर्मी से जुड़े जोखिम का विश्लेषण किया था।

हाल ही में 24 जून को अमेरिका की नॉन-प्रॉफिट संस्था ‘क्लाइमेट सेंट्रल’ की एक स्टडी से पता चला है कि 1970 के दशक के बाद से भारत में खतरनाक रूप से उमस भरी गर्मी वाले दिनों की संख्या सालाना 101 से बढ़कर 141 हो गई है। दुनिया भर में यह संख्या 10 से बढ़कर 23 हो गई है। ऐसे दिनों के लिए पैमाना ‘वेट-बल्ब टेम्परेचर’ है जो 25°C या उससे ज्यादा होता है। वेट बल्ब टेम्परेचर यह मापने का तरीका कि कोई चीज वाष्पीकरण से कितनी ठंडी हो सकती है।

उमस भरे दिनों की संख्या में बढ़ोतरी

पिछले पांच दशकों में दिल्ली में खतरनाक रूप से उमस भरे दिनों की संख्या 96 से बढ़कर 135 हो गई, गाजियाबाद में 99 से 137, नागपुर में 44 से 119, रायपुर में 82 से 150, अहमदाबाद में 137 से 162 और जयपुर में 55 से 101 हो गई।

वैज्ञानिक इन बदलावों को समुद्र के गर्म होने से जोड़कर देखते हैं। भारत में अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से नमी जमीन की ओर आती है। बहुत ज्यादा शहरीकरण जैसे कारणों से औसत तापमान ज्यादा रहता है इसलिए जब हवा में नमी होती है तो ‘अर्बन हीट आइलैंड (UHI)’ का असर नमी को सुखाने वाले असर (जिसे ‘अर्बन ड्राई आइलैंड’ असर भी कहते हैं) पर हावी हो जाता है। इस उमस की वजह से रात में होने वाली सामान्य ठंडक भी नहीं मिल पाती। अगर लंबे समय तक बिना बारिश के बहुत ज्यादा उमस बनी रहे और रात का तापमान भी ज्यादा रहे तो अगले दिन का अधिकतम तापमान भी ज्यादा बना रहता है।

इसी साल मार्च में ‘फिजिक्स एंड केमिस्ट्री ऑफ द अर्थ’ जर्नल में छपी एक स्टडी के मुताबिक दिल्ली, आगरा, कानपुर, वाराणसी, झांसी, ग्वालियर और कोच्चि समेत 15 स्मार्ट शहरों में रात के समय भी लगातार हीटवेव (लू) की स्थिति बनी रही। भारत के सभी 100 स्मार्ट शहरों के लिए 2001 से 2024 के बीच मार्च-जून के डेटा का विश्लेषण करने पर स्टडी में पाया गया कि इनमें से 16 और शहरों जिनमें औरंगाबाद, भोपाल, इंदौर, नागपुर, रायपुर, वारंगल और पुडुचेरी शामिल हैं में दिन और रात दोनों समय लगातार ‘कंपाउंड हीट’ (दिन और रात दोनों समय की गर्मी) का अनुभव किया गया।

बचाव के लिए क्या उपाय किए अपनाए जा सकते हैं?

ऐसी गर्मी से राहत के लिए सिर्फ थ्योरी पर आधारित समाधानों के बजाय हालात के हिसाब से सही समाधानों को प्राथमिकता देना जरूरी है। जलवायु विशेषज्ञ इसके लिए ‘कूल रूफ’ का सुझाव देते हैं। कूल रूफ ऐसी छतें होती हैं जो सूरज की रोशनी को रिफ्लेक्ट करके गर्मी कम करती हैं।

चूंकि शहरों में गर्मी सिर्फ दिन में धूप पड़ने की वजह से नहीं होती इसलिए सूरज की रोशनी को रोकना या रिफ्लेक्ट करना घर के अंदर के आराम को बहुत ज्यादा नहीं बढ़ा सकता। यह शारीरिक आराम न सिर्फ छत की सतह के तापमान पर बल्कि हवा के तापमान और नमी पर भी निर्भर करता है।

सैटेलाइट डेटा से बने शहरों के हीट मैप में आमतौर पर दिन के समय जमीन की सतह के तापमान पर ध्यान दिया जाता है और रात के समय शहरी ‘हीट आइलैंड’ असर, हवा के तापमान और नमी को नजरअंदाज कर दिया जाता है। लेकिन हवा की गति और सूरज की रोशनी के साथ-साथ यही चीजें इमारतों में रहने वाले लोगों के आराम, सेहत और बिजली की मांग पर असर डालती हैं। ऐसे में भले ही ‘कूल रूफ’ छत के अंदरूनी हिस्से का तापमान कम करती हैं लेकिन दीवारों फर्श और खिड़कियों की गर्मी कम नहीं होती जो कि लोगों को ज्यादा प्रभावित करती है।

ऐसे में इससे निपटने के लिए नीतिगत स्तर पर भी बदलाव की जरूरत और नए उपाय अपनाने पर जोर देना चाहिए जिसमें विशेषज्ञों की राय शामिल हो।

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अमरेन्द्र यादव
लखनऊ विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातक करने के बाद जामिया मिल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई। जागरण न्यू मीडिया में बतौर कंटेंट राइटर काम करने के बाद 'बोले भारत' में कॉपी राइटर के रूप में कार्यरत...सीखना निरंतर जारी है...

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