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सिविल जज मुस्लिम विवाह नहीं कर सकते भंग, गुवाहाटी हाई कोर्ट का अहम फैसला

गुवाहाटी हाई कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि सिविल जज मुस्लिम विवाह को भंग नहीं कर सकता है।

guwahati high court ruled civil judge cannot dissolve muslim marriage, गुवाहाटी हाई कोर्ट
फोटोः आईएएनएस

गुवाहाटी हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि किसी घोषणात्मक राहत मुकदमे में कोई सिविल जज किसी मुस्लिम पति द्वारा अपनी पत्नी को दिए गए तलाक (तलाक की घोषणा) को वैध घोषित नहीं कर सकता है और इस तरह की राहत के लिए वैवाहिक मामलों पर अधिकार क्षेत्र रखने वाले उपयुक्त न्यायालय से संपर्क करना होगा।

जस्टिस मिताली ठाकुरिया एक ऐसे पति द्वारा दायर अपील पर सुनवाई कर रही थीं जिसने पहले अपनी पत्नी को तलाक देने के बाद अपने विवाह को भंग घोषित करने के लिए एक दीवानी अदालत में याचिका दायर की थी।

दीवानी न्यायाधीश ने सुनाया था फैसला

निचली दीवानी न्यायाधीश ने पत्नी को दिए गए तलाक की पुष्टि करते हुए विवाह भंग करने का फैसला सुनाया था। हालांकि वरिष्ठ दीवानी न्यायाधीश/अपीलीय अदालत ने इस फैसले को इस आधार पर रद्द कर दिया कि निचली दीवानी अदालत के पास तलाक देने का अधिकार क्षेत्र नहीं था।

इसके चलते पति ने उच्च न्यायालय में अपील दायर की। अपीलीय न्यायालय के फैसले को बरकरार रखते हुए उच्च न्यायालय ने पाया कि यह कोई साधारण मामला नहीं था जिसमें पति ने केवल विशिष्ट राहत अधिनियम की धारा 34 के तहत दीवानी न्यायालय से घोषणा की मांग की हो।

उच्च न्यायालय ने पाया कि पति तलाक की डिक्री की मांग कर रहा था जिसे देने का अधिकार दीवानी न्यायालय के पास नहीं था।

अदालत ने कहा “यह एक स्थापित कानून है कि पारिवारिक विवाद, विवाह विच्छेद, हिंदू विवाह अधिनियम या विशेष विवाह अधिनियम के तहत तलाक की डिग्री केवल पारिवारिक न्यायालय अधिनियम, 1984 की धारा 7 और 8 के तहत पारिवारिक न्यायालय द्वारा ही सुनी जा सकती है और पारिवारिक न्यायालय की अनुपस्थिति में जिला न्यायालय मामलों की जांच कर सकता है।”

अदालत ने स्पष्ट किया कि पारिवारिक क्षेत्राधिकार वाला “जिला न्यायालय” मूल क्षेत्राधिकार वाला प्रधान सिविल न्यायालय होगा।

साल 2024 में पति ने दायर की थी याचिका

इस मामले में 2024 में पति ने अपनी पत्नी को दिए गए तलाक के आधार पर विवाह विच्छेद की घोषणा और लिखित तलाक की पुष्टि के लिए सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के समक्ष याचिका दायर की। न्यायाधीश ने मई 2025 में उनकी याचिका स्वीकार कर ली।

हालांकि पत्नी की अपील पर वरिष्ठ सिविल न्यायाधीश ने बाद में इस फैसले को रद्द कर दिया। उन्होंने फैसला सुनाया कि निचली अदालत को इस तरह के मुकदमे पर सुनवाई करने का अधिकार नहीं है।

इसके बाद पति ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर की और तर्क दिया कि उसकी याचिका में तलाक की डिग्री नहीं, बल्कि केवल पत्नी को दिए गए तलाक को वैध घोषित करने की मांग की गई है।

अदालत ने इस तर्क से असहमत होते हुए उच्च न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि पति ने घोषणात्मक मुकदमे के नाम पर तलाक की डिग्री मांगी थी।

अदालत ने आगे कहा कि सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के पास तलाक की डिग्री पारित करने का कोई अधिकार या शक्ति नहीं थी।

हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया कि अपीलीय न्यायालय ने पति को तलाक के लिए सक्षम प्राधिकारी से संपर्क करने का सही निर्देश दिया था।

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अमरेन्द्र यादव
लखनऊ विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातक करने के बाद जामिया मिल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई। जागरण न्यू मीडिया में बतौर कंटेंट राइटर काम करने के बाद 'बोले भारत' में कॉपी राइटर के रूप में कार्यरत...सीखना निरंतर जारी है...

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