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दिल्ली हाई कोर्ट ने लाल किला विस्फोट मामले में याचिकाकर्ता को लगाई फटकार, सुनवाई के लिए 6 महीने सीमा तय करने की लगाई थी गुहार

दिल्ली हाई कोर्ट ने लाल किला विस्फोट मामले में याचिकाकर्ता द्वारा सुनवाई के लिए 6 महीने की समय सीमा मांगने वाली याचिका पर सुनवाई से इंकार कर दिया।

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दिल्ली हाई कोर्ट, फोटोः IANS

नई दिल्लीः दिल्ली उच्च न्यायालय ने बुधवार, 3 दिसंबर को लाल किला बम विस्फोट मामले की सुनवाई की निगरानी के लिए एक समिति की नियुक्ति और छह महीने में सुनवाई पूरी करने की मांग वाली जनहित याचिका (पीआईएल) पर विचार करने से इनकार कर दिया।

मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तुषार राव गेडेला की खंडपीठ ने कहा कि वह ऐसे मुकदमे की निगरानी नहीं कर सकती जो अभी शुरू भी नहीं हुआ है।

जस्टिस ने सुनवाई के दौरान क्या कहा?

जस्टिस गेडेला ने कहा “यह क्या है? यह तो अभी शुरू भी नहीं हुआ है और आप चाहते हैं कि हम निगरानी करें कि मुकदमा कैसे चलाया जाएगा? यह अभी शुरू भी नहीं हुआ है और आप चाहते हैं कि हम निगरानी करें? मैं समझ सकता हूं कि यह वर्षों से लंबित होता लेकिन यह तो अभी तक शुरू भी नहीं हुआ है।”

जस्टिस उपाध्याय ने कहा कि याचिकाकर्ता अपने मौलिक अधिकारों का कोई उल्लंघन दर्शाने में विफल रहे हैं। उन्होंने कहा “यह एक जनहित याचिका है जो आपके अनुभव पर आधारित है कि पिछली सुनवाई में वर्षों लग गए। और इसलिए हमें यह मान लेना चाहिए कि इस सुनवाई में भी समय लगेगा? आप जांच और आरोपपत्र दाखिल करने की निगरानी चाहते हैं। हमें निगरानी करनी चाहिए।”

इस पर याचिकाकर्ता की ओर से उपस्थित वकील ने तर्क दिया कि न्यायालय के निर्देश से विस्फोट पीड़ितों को आश्वासन मिलेगा।

उन्होंने कहा कि पिछले आतंकवादी मुकदमे 25 वर्षों से अधिक समय तक चले हैं और यहां तक ​​कि लाल किला आतंकवादी हमले का मामला भी सात वर्षों से अधिक समय तक चला था।

केंद्र सरकार की तरफ से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि जनहित याचिका गलत है और याचिकाकर्ता इस तथ्य का उल्लेख करने में विफल रहे हैं कि जांच अब दिल्ली पुलिस के पास नहीं है बल्कि राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को स्थानांतरित कर दी गई है। उन्होंने आगे कहा कि यह यूएपीए द्वारा शासित होगा।

याचिका पर निर्देश पारित नहीं कर रही है

अदालत ने सुनवाई के दौरान कहा कि वह जनहित याचिका पर कोई निर्देश पारित नहीं करने जा रहा है।

इसके बाद याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका वापस ले ली। इस मामले को लेकर याचिका पूर्व विधायक पंकज पुष्कर द्वारा दायर की गई थी। इस याचिका में मुकदमे के सभी चरणों की निगरानी के लिए अदालत की निगरानी में निरीक्षण तंत्र या समिति गठित करने के निर्देश देने की मांग की गई थी।

इसमें दैनिक आधार पर सुनवाई करने और इसे 6 महीने में पूरा करने का निर्देश देने की भी मांग की गई।

याचिका में कहा गया है कि याचिकाकर्ता एक 21 वर्षीय महिला की एकल अभिभावक है और वह “घरों में गूंजने वाले हर चिंताजनक सवाल से थरथराहट महसूस करती है: ‘ऐसा क्यों हुआ? कौन जिम्मेदार है? क्या हम सुरक्षित हैं?'”

इसमें यह भी कहा गया है कि यह विस्फोट भारत की संप्रभुता के सबसे पवित्र प्रतीक पर हमला है और इससे नागरिक भयभीत, शोकग्रस्त और स्पष्टता की तलाश में हैं।

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अमरेन्द्र यादव
लखनऊ विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातक करने के बाद जामिया मिल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई। जागरण न्यू मीडिया में बतौर कंटेंट राइटर काम करने के बाद 'बोले भारत' में कॉपी राइटर के रूप में कार्यरत...सीखना निरंतर जारी है...

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