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कलकत्ता हाई कोर्ट ने IAS-IPS अधिकारियों के तबादले को लेकर दायर याचिका की खारिज

कलकत्ता हाई कोर्ट ने विधानसभा चुनाव से पहले वरिष्ठ प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों के तबादले को लेकर दायर याचिका खारिज कर दी है।

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फोटोः आईएएनएस

कोलकाताः कलकत्ता हाई कोर्ट ने मंगलवार (31 मार्च) को चुनाव आयोग द्वारा अधिकारियों के तबादले को चुनौती देने वाली जनहित याचिका (PIL) खारिज कर दी। गौरतलब है कि राज्य में विधानसभा चुनावों के मद्देनजर वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों और अफसरशाहों का तबादला किया गया था।

जस्टिस सुजॉय पॉल और जस्टिस पार्थ सारथी सेन की पीठ ने इस मामले में सुनवाई के दौरान कहा कि चुनाव आयोग द्वारा तबादला किए गए अधिकारियों की जगह अन्य अधिकारी नियुक्त हो चुके हैं।

कलकत्ता हाई कोर्ट ने क्या कहा?

पीठ ने आदेश दिया कि ” इस प्रकार प्रणाली या प्रशासनिक क्षेत्र में कोई रिक्ति उत्पन्न नहीं हुई है। चुनाव आयोग के वरिष्ठ अधिवक्ता श्री नायडू का यह तर्क क मुख्य सचिव और गृह सचिव के स्थान पर उनसे क्रमशः 1 और 7 साल वरिष्ठ अधिकारियों की नियुक्ति की गई है, याचिकाकर्ता और राज्य द्वारा विवादित नहीं किया गया है। इसलिए, यह नहीं कहा जा सकता कि प्रशासनिक ‘सुस्ती’ हुई है और यदि स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव तक यह व्यवस्था की गई है तो सरकार पंगु हो जाएगी। “

पीठ ने सुनवाई के दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग कार्यवाही के पहलू पर भी विचार करने से इंकार कर दिया। अदालत ने कहा कि ” खासकर तब जब तबादलों और उक्त प्रस्ताव के बीच कोई सटीक संबंध स्थापित नहीं किया जा सका। “

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कलकत्ता हाई कोर्ट में यह याचिका अधिवक्ता अर्क कुमार नाग द्वारा दायर की गई थी। याचिका में उन्होंने चुनाव आयोग द्वारा बड़े-पैमाने पर लगभग सभी वरिष्ठ प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों के ट्रांसफर और हटाने को लेकर चिंता जाहिर की थी।

ज्ञात हो कि चुनाव आयोग ने हाल ही में मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक, गृह सचिव समेत कई जिला अधिकारियों, पुलिस अधीक्षकों और अन्य बड़े अधिकारियों का तबादला हुआ था। इनके अलावा अन्य आईएएस, आईपीएस अधिकारियों का भी तबादला हुआ था।

याचिकाकर्ता ने क्या आरोप लगाए?

नाग ने आरोप लगाया कि पश्चिम बंगाल कैडर के वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों के एक बड़े दल को चुनाव पर्यवेक्षक के कर्त्तव्यों के लिए तमिलनाडु, केरल और नागालैंड जैसे राज्यों में स्थानांतरित कर दिया गया था।

उन्होंने आगे तर्क दिया कि विधानसभा चुनावों से पहले “राज्य की प्रशासनिक मशीनरी का यह पूर्णतः विघटन” संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत शक्ति का वास्तविक प्रयोग नहीं था, बल्कि एक दिखावटी और दंडात्मक उपाय था।

पीआईएल में यह भी कहा गया कि इस तरह की कार्रवाई जनहित के लिए गंभीर रूप से हानिकारक है और संघवाद के सिद्धांतों का मौलिक रूप से उल्लंघन करती है।

अभ्यास करने वाला वकील नहीं दायर कर सकता ऐसी याचिका

अदालत ने हालांकि यह राय दी कि याचिकाकर्ता, एक अभ्यास करने वाले वकील के रूप में, अधिकारियों के तबादलों के खिलाफ शिकायत नहीं कर सकता जब तक कि ऐसे तबादलों से सार्वजनिक हित को नुकसान न पहुंचे।

अदालत ने आगे यह भी कहा कि केवल इस आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि चुनाव आयोग द्वारा बड़ी संख्या में अधिकारियों का तबादला करने से यह कार्रवाई मनमानी, सनकी या दुर्भावनापूर्ण है।

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इस मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बंदोपाध्याय के साथ राहुल कुमार सिंह, श्रोभना सेनगुप्ता और कौशिक बंदोपाध्याय ने याचिकाकर्ता की तरफ से पक्ष रखा। वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ता दामा शेषाद्रि और सौम्य मजूमदार के साथ अधिवक्ता अनामिका पांडे, अभिनव ठाकुर, सुर्जनील दास, कुमार उत्सव और घनश्याम पांडे ने चुनाव आयोग का पक्ष रखा।

एडवोकेट जनरल किशोर दत्ता के साथ अधिवक्ता स्वप्न बनर्जी, सुमिता शॉ, दिप्तेंदु नारायण बनर्जी और सौमेन चटर्जी पश्चिम बंगाल सरकार की तरफ से उपस्थित हुए।

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अमरेन्द्र यादव
लखनऊ विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातक करने के बाद जामिया मिल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई। जागरण न्यू मीडिया में बतौर कंटेंट राइटर काम करने के बाद 'बोले भारत' में कॉपी राइटर के रूप में कार्यरत...सीखना निरंतर जारी है...

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