बलदेव राज चोपड़ा, जिन्हें दुनिया बीआर चोपड़ा के नाम से जानती है, एक विजनरी फिल्मकार थे। उन्होंने न केवल मूक फिल्मों से रंगीन सिनेमा तक के बदलाव को देखा, बल्कि अपनी कहानियों से भारतीय समाज की सोच को भी बदला। उन्होंने सिर्फ फिल्में नहीं बनाई, बल्कि मनोरंजन को सामाजिक सरोकारों से जोड़कर उसे नई गरिमा प्रदान की।
बीआर चोपड़ा का जन्म (22 अप्रैल 1914 को अविभाजित पंजाब के लुधियाना) उस दौर में हुआ था जब भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था और सिनेमा अपनी शैशवावस्था में था। उनके पिता, विलायती राज चोपड़ा, लोक निर्माण विभाग (PWD) में एक सरकारी कर्मचारी थे। वे अपने सात भाई-बहनों में दूसरे नंबर पर थे। दिलचस्प बात यह है कि उनके सबसे छोटे भाई यश चोपड़ा उनसे पूरे 18 साल छोटे थे।
चोपड़ा साहब बचपन से ही पढ़ाई में बहुत मेधावी थे। उन्होंने लाहौर के प्रसिद्ध गवर्नमेंट कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य में एमए की डिग्री हासिल की थी। वह कभी फिल्मकार नहीं बनना चाहते थे। उनका सपना था एक आईसीएस अधिकारी (आज के समय का आईएएस) बनना। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। उन्होंने आईसीएस परीक्षा दी, लेकिन सफल नहीं हो पाए। जब प्रशासनिक सेवा में उनका चयन नहीं हुआ, तो उन्होंने लेखनी की तरफ रुख किया।
फिल्म पत्रकार के रूप में शुरू किया करियर
बीआर चोपड़ा ने 1944 में लाहौर से निकलने वाली पत्रिका ‘सिने हेराल्ड’ में एक फिल्म पत्रकार के रूप में अपना करियर शुरू किया। कुछ ही समय में उन्होंने उस पत्रिका का अधिग्रहण कर लिया और 1947 तक उसे चलाया। यही वह समय था जब फिल्मों के प्रति उनका लगाव बढ़ा और उन्होंने लुधियाना और लाहौर की गलियों से निकलकर मुंबई के बड़े पर्दे तक का सफर तय करने का सपना देखा।
विभाजन के बाद जब अखबारों पर पाबंदियां लगीं, तब उन्होंने अपने लिखने के शौक को नया आयाम देने की सोची। दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने कभी किसी निर्देशक को असिस्ट नहीं किया और न ही कोई औपचारिक प्रशिक्षण लिया। उन्होंने खाली समय में अपने दोस्तों के साथ हंसी-मजाक में ही फिल्मी सफर शुरू किया था।
चोपड़ा साबह ने 1951 में बतौर निर्देशक पहली फिल्म ‘अफसाना’ बनाई। फिल्म में अशोक कुमार, प्राण, और अभिनेत्री वीना लीड रोल में थे। यह फिल्म सुपरहिट रही और यहीं से एक महान निर्देशक का जन्म हुआ। हालांकि बतौर निर्माता वह इससे पहले करवट फिल्म बना चुके थे जो असफल साबित हुई थी।
सिनेमा को समाज का आईना बनाया!
बीआर चोपड़ा ने साल 1955 में अपने प्रोडक्शन हाउस ‘बीआर फिल्म्स’ की स्थापना की। इसके बाद उन्होंने समाज के बदलने का इंतजार करने के बजाय अपने सिनेमा के जरिए ही समाज को बदलने का बीड़ा उठाया। उन्होंने ‘साधना’ जैसी फिल्म के माध्यम से वेश्यावृत्ति जैसे संवेदनशील विषय पर चोट की, जिसे बनाने से उस दौर में इंडस्ट्री के लोगों ने उन्हें फ्लॉप होने के डर से मना किया था, लेकिन चोपड़ा साहब का मानना था कि यह परिस्थितियों से उपजी एक सामाजिक समस्या है जिसे केवल सम्मान देकर ही सुधारा जा सकता है।
इसी तरह उन्होंने ‘नया दौर’ में इंसान और मशीन के संघर्ष को दिखाया, जो आज के समय में भी उतनी ही प्रासंगिक है, जबकि ‘कानून’ जैसी फिल्म बनाकर उन्होंने उस दौर में बिना गानों के फिल्म बनाने का एक बहुत बड़ा और सफल साहस दिखाया था। इसके अलावा उन्होंने ‘गुमराह’ और ‘निकाह’ जैसी फिल्मों के जरिए विवाहेतर संबंधों और तलाक जैसे उन मुद्दों पर बेबाकी से चर्चा की, जिन पर समाज में अक्सर खुलकर बात नहीं की जाती थी।
बीआर चोपड़ा की फिल्मों की एक खास बात उनका संगीत चयन था। जहाँ उस दौर में लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी का दबदबा था, वहीं चोपड़ा साहब ने आशा भोसले और महेंद्र कपूर की जोड़ी को प्राथमिकता दी। उन्होंने महेंद्र कपूर के करियर को संवारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हालांकि, लता जी और रफी साहब से कम गाने क्यों गवाए, इसका खुलासा उन्होंने कभी नहीं किया।
‘महाभारत’ ने हर घर को बनाया ‘मंदिर’
बी.आर. चोपड़ा सिर्फ सिनेमा तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने टेलीविजन के क्षेत्र में भी नई ऊंचाइयां हासिल कीं। 80 के दशक के अंत में जब टीवी का दौर शुरू हुआ, तो चोपड़ा साहब ने ‘महाभारत’ का निर्माण कर इतिहास रच दिया। उन्होंने इस पौराणिक धारावाहिक के जरिए हर घर को एक मंदिर के रूप में बदल दिया।
यह वह दौर था जब किसी-किसी घरों में टेलीविजन हुआ करते था। महाभारत की ख्याति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि रविवार की सुबह इसके प्रसारण के वक्त सड़कें सूनी हो जाती थीं और पूरा गांव एक ही टीवी के सामने श्रद्धा के साथ इकट्ठा हो जाता था।
बताते चलें कि महाभारत की इस अपार सफलता से पहले उन्होंने साल 1987 में दूरदर्शन के लिए ‘चुन्नी’ जैसा मार्मिक सीरियल भी बनाया था, जिसने धर्म की दीवारों से परे दोस्ती, प्यार और जुदाई की कहानी से दर्शकों को भावुक कर दिया था। बीआर चोपड़ा ने मूक फिल्मों के दौर से लेकर रंगीन सिनेमा के शिखर तक का सफर तय किया और उनकी आखिरी फिल्म ‘भूतनाथ’ रही। सिनेमा में उनके इसी अतुलनीय योगदान के लिए साल 1998 में उन्हें भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान ‘दादा साहब फाल्के पुरस्कार’ से नवाजा गया।
5 नवंबर 2008 को बीआर चोपड़ा इस दुनिया से विदा हो गए। लेकिन उनकी फिल्में और टीवी शो आज भी लोगों के दिलों में जीवित हैं। वे एक ऐसे फिल्मकार थे जिन्होंने बोल्ड विषयों, मानवीय संवेदनाओं और धार्मिक महागाथाओं के बीच एक ऐसा संतुलन बनाया, जो आज के फिल्मकारों के लिए एक पाठशाला के समान है।

