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अलीगंज अग्निकांड: किसी ने मंगेतर खोया, किसी ने बहन… दर्द की कई कहानियां

लखनऊ के अलीगंज इलाके में एक कमर्शियल बिल्डिंग में लगी भीषण आग में 15 लोगों की मौत हो गई। इस हादसे के चश्मदीदों, पीड़ितों ने अपनी आपबीती बताई है।

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Collage of a burning building with firefighters, a crowd of onlookers, and a foreground portrait of a young girl in green; conveys disaster relief context.
लखनऊ के अलीगंज में हुए हादसे ने पीछे कई सवाल और दर्द छोड़ गए हैं। फोटोः आईएएनएस (एआई की मदद के साथ)

लखनऊः अलीगंज की उस इमारत में सोमवार दोपहर सब कुछ सामान्य था। कोई अपने कंप्यूटर पर काम कर रहा था, कोई क्लास में बैठा था और कोई लंच के बाद वापस अपनी सीट पर लौट रहा था। लेकिन कुछ ही मिनटों में धुएं और आग ने पूरी बिल्डिंग को मौत के जाल में बदल दिया। कई लोग बाहर निकलने में कामयाब रहे, लेकिन 15 लोगों की जिंदगी वहीं थम गई। पीछे रह गए हैं टूटे हुए परिवार, अधूरे सपने और ऐसे सवाल जिनके जवाब अब जांच एजेंसियों को तलाशने हैं।

हादसे में जान गंवाने वालों में 29 वर्षीय नीलेश और उनकी मंगेतर भी शामिल थे। दोनों की मुलाकात चार साल पहले एक ही ऑफिस में काम करते हुए हुई थी। दोस्ती प्यार में बदली और परिवारों की सहमति से शादी की तैयारियां शुरू हो चुकी थीं। घरों में खुशियों की चर्चा थी, लेकिन आग ने दोनों की जिंदगी एक साथ छीन ली।

नीलेश के परिवार के लिए यह सदमा असहनीय है। मां की आंखों से आंसू नहीं थम रहे, पिता गहरे सदमे में हैं और बहन बार-बार भाई की यादों में टूट जाती है। परिजनों के अनुसार नीलेश एक 3डी डिजाइनर थे और गेमिंग इंडस्ट्री के लिए कैरेक्टर व प्रॉप्स तैयार करते थे। उनकी मंगेतर भी डिजाइनर थीं और दोनों एक ही कंपनी में कार्यरत थे।

नीलेश के बड़े भाई का आरोप है कि यदि समय पर राहत और बचाव कार्य शुरू होता तो कई लोगों की जान बच सकती थी। उनका कहना है कि जिस भवन में आग लगी, वहां पर्याप्त अग्निशमन व्यवस्था नहीं थी। उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि वर्षों से विवादों में रही इमारत के खिलाफ पहले प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं हुई।

हादसे में अपनी बहन को खोने वाले एक अन्य परिजन ने समाचार एजेंसी आईएएनएस को बताया कि पिता का दो वर्ष पहले निधन हो चुका था और बहन ही पूरे परिवार का आर्थिक सहारा थीं। अब परिवार के सामने भविष्य की बड़ी चिंता खड़ी हो गई है।

बायोमेट्रिक सिस्टम बंद हो गया, दरवाजा नहीं खुला

इस हादसे में बच निकलने वाले मोहम्मद आसिफ ने जो कहानी सुनाई, वह किसी भयावह फिल्मी दृश्य से कम नहीं है। आसिफ के मुताबिक, दोपहर में लंच के बाद कर्मचारी वापस काम शुरू करने वाले थे, तभी आग लगने की सूचना मिली। लोग बाहर निकलने लगे, लेकिन बिजली गुल होने के कारण बायोमेट्रिक एंट्री सिस्टम ने काम करना बंद कर दिया और मुख्य दरवाजा नहीं खुल पाया।

उन्होंने बताया कि जब तक लोग दूसरा रास्ता तलाशते, तब तक सीढ़ियां धुएं से भर चुकी थीं। सांस लेना मुश्किल हो गया था। ऐसे में कुछ लोग वापस कमरों में लौटे और बचने का कोई रास्ता खोजने लगे।

आसिफ ने बताया कि उन्हें एक छोटी खिड़की के पास बिजली का तार दिखाई दिया। उसी तार के सहारे वे और कुछ अन्य लोग नीचे उतरने में सफल रहे। उन्होंने कहा कि कई लोग दम घुटने से बचने के लिए वॉशरूम में छिप गए थे, लेकिन वे बाहर नहीं निकल सके।

उनके अनुसार फायर अलार्म भी काम नहीं कर रहा था और काफी देर तक कोई प्रभावी मदद नहीं पहुंची। उनके साथी जयंत गुप्ता ने कांच तोड़कर बाहर निकलने की कोशिश की, लेकिन नीचे लगी लोहे की रेलिंग पर गिरने से गंभीर रूप से घायल हो गए।

‘छत का रास्ता बंद था, बच्चे मदद के लिए फोन कर रहे थे’

घटना की प्रत्यक्षदर्शी माला निगम उस मंजर को याद कर सिहर उठती हैं। समाचार एजेंसी आईएएनएस से बात करते हुए कहती हैं, आग इतनी तेजी से फैली कि कुछ ही मिनटों में पूरी इमारत लपटों की चपेट में आ गई। नीचे मौजूद लोगों ने पेट शॉप में फंसे जानवरों को बचाने की कोशिश की, लेकिन ऊपर फंसे लोगों तक पहुंचना लगभग असंभव हो गया।

माला बताती हैं कि शुरुआती क्षणों में कुछ लोग ऊपर से कूदकर बाहर निकले और घायल हो गए। इसके बाद आग इतनी भयानक हो गई कि किसी के लिए भी अंदर जाना संभव नहीं था।

उनके मुताबिक, सबसे दर्दनाक दृश्य उन बच्चों और युवाओं का था जो अंदर फंसे हुए अपने माता-पिता को फोन कर रहे थे। कुछ ने खुद को बचाने की उम्मीद में वॉशरूम में बंद कर लिया था। छत तक पहुंचने का रास्ता भी बंद था, जिससे कई लोग बाहर निकलने का अंतिम मौका भी खो बैठे।

माला कहती हैं, “वह दृश्य ऐसा था जिसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है। लोग मदद के लिए पुकार रहे थे, लेकिन आग और धुएं ने सब कुछ अपने कब्जे में ले लिया था।”

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2016 में ध्वस्त करने का आदेश था

अलीगंज अग्निकांड ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि भीड़भाड़ वाले व्यावसायिक भवनों, कोचिंग संस्थानों और प्रशिक्षण केंद्रों में सुरक्षा मानकों का पालन कितना गंभीरता से किया जाता है। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार जिस तीन मंजिला इमारत में सोमवार को भीषण आग लगी, उसे वर्ष 2016 में अवैध निर्माण के कारण ध्वस्त करने का आदेश दिया गया था। हालांकि, हैरानी की बात यह है कि महज दो महीने के भीतर यह आदेश वापस ले लिया गया और इमारत जस की तस बनी रही।

राज्य सरकार की ओर से जारी जानकारी के मुताबिक, अलीगंज के सेक्टर-डी स्थित यह भवन 11 जुलाई 1980 को लॉटरी प्रणाली के तहत विजय कुमार को किराया-क्रय योजना के अंतर्गत आवंटित किया गया था। उसी वर्ष 4 नवंबर को भवन का कब्जा भी सौंप दिया गया था।

बाद में साल 2005 में यह संपत्ति विक्रय विलेख के माध्यम से विजय कुमार और उनकी पत्नी उषा के नाम दर्ज हुई। इसके बाद 19 जनवरी 2013 को दंपति ने भवन को वीरेन्द्र प्रताप शुक्ला और सुरेन्द्र प्रताप शुक्ला के नाम बेच दिया। अब जांच एजेंसियों की रिपोर्ट और प्रशासनिक कार्रवाई से यह तय होगा कि इस त्रासदी की जिम्मेदारी किस पर तय होती है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल, क्या इन 15 जिंदगियों को बचाया जा सकता था? इन सवालों के जवाब भले जांच में मिलें, लेकिन जिन परिवारों ने अपने अपनों को खो दिया, उनके लिए यह दर्द शायद कभी खत्म नहीं होगा।

समाचार एजेंसी आईएएनएस इनपुट के साथ

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अनिल शर्मा
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...

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