Thursday, April 30, 2026
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दृश्यम: ‘द सौंग ऑफ स्कॉर्पियन’ का अंत:संगीत- रेत, प्रतिशोध और स्त्री की आवाज

रेगिस्तान सिर्फ़ रेत का विस्तार नहीं होता, वह स्मृतियों, पीड़ा और अनकहे प्रतिशोध का भी भूगोल होता है। ‘द सौंग ऑव स्कार्पियन’ ऐसी ही एक कहानी है, जहाँ लोककथा, संगीत और स्त्री-अनुभव एक-दूसरे में इस तरह घुलते हैं कि सच और मिथक के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है। इरफान खान की यह अंतिम फिल्म है और बीता दिन इरफान की छठी पुण्यतिथि थी, इस कारण भी इस लेख का भावनात्मक महत्व और गहरा हो जाता है। पर इस सबसे कहीं अधिक यह फिल्म इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यह स्त्री-अस्तित्व, देह और प्रतिरोध की उस जटिल कथा को सामने लाती है, जिसे समाज अक्सर सुनना नहीं चाहता।

रेगिस्तान में गूंजते गीत सिर्फ़ गीत नहीं होते,वे पुकार होते हैं, प्रतिरोध होते हैं, और कभी-कभी न्याय की अंतिम कोशिश भी। ‘द सौंग ऑफ स्कॉर्पियन’ फिल्य की नायिका नूरन का गीत भी ऐसा ही है, जो बिच्छू के ज़हर को उतार सकता है, पर इंसान के भीतर बसे ज़हर को नहीं।

 यह फिल्म रिलीज 2023 में हुई पर बन 2017 से रही थी। यह इरफ़ान ख़ान की अंतिम फिल्म है। फिल्म के निर्देशक अनूप सिंह हैं। मुख्य कलाकार इरफ़ान ख़ान, ईरानी अभिनेत्री गुल्शिफतेह फराहानी, वहीदा रहमान, शशांक अरोरा हैं। फिल्म की पृष्ठभूमि राजस्थान के थार मरुस्थल एरिया की है। कहानी राजस्थान की एक लोककथा और मिथक पर आधारित है। फिल्म में राजस्थानी भाषा का प्रयोग किया गया है। फिल्म राजस्थानी वेशभूषा और वातावरण और वहां के गांव को, वहां के कल्चर को दिखाने में सफल है। फिल्म की नायिका गुल्शिफतेह ईरानी कलाकार हैं, मगर फिल्म की आंचलिकता में बनावटी नहीं लगती हैं एकदम फिट हैं अपने किरदार में, किरदार की भाषा में। फिल्म की कहानी एक संगीत की कहानी है, प्रतिशोध की कहानी है। स्त्री के शोषण और दमन की कहानी है। पुरुषों के पाखंडी व्यवहार और सोच की कहानी है। एक स्त्री के दर्द और पीड़ा की कहानी है। फिल्म की कहानी पितृसत्तात्मक पुरुष प्रधान व्यवस्था की परतें खोलती है। इंसान के अंदर रहते हैं दो तीन तरह के इंसान जैसे जैसे फिल्म की कहानी आगे बढ़ती है पुरुष चरित्र की परतें खुलती हैं। 

स्त्री को कभी उसकी देह से अलग करके न कोई देखता है न सोचता है न कोई विश्लेषित करता है। स्त्री को और उसकी देह को हासिल करने के लिए पुरुषों ने कैसे कैसे दमन और शोषण किए हैं। इतिहास में  पढ़ कर देख कर रूह कांप जाती है। यह शोषण और दमनकारी व्यवस्था आज भी जूं की तूं बनी हुई है। फिल्म आम्रपाली ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित थी। फिल्म में नायक को जो स्त्री अच्छी लगती है उसके लिए वो ख़ून की नदियां बहा देता है। क़त्लो गारत प्रलय के बाद चहुं ओर लाशें बिछ गई हैं, चिता जल रही हैं। बच्चों और स्त्रियों का ख़ौफनाक रुदन ख़लां में गूंज रहा है। नायिका विचलित है लाशें देखकर ,वो गिल्ट में है कि मेरे ही लिए यह प्रलय आया है लाशों का अंबार लगा हुआ है। वो जीत के बाद नायक को कहकर बुद्ध की शरण में चली जाती है।

“मृत्यु, हत्या, लाशों का ढेर, चारों ओर जलती हुई चिंताएं, और रुदन एक स्त्री के लिए?”

इस ज़मीन पर सबसे पहली हत्या भी एक स्त्री के लिए की गई थी।

बाबा आदम के एक बेटे ने अपने ही भाई का क़त्ल कर दिया था। दोनों एक ही स्त्री से विवाह करना चाहते थे। जब अल्लाह ने बाबा आदम को बनाया तो उन्हें तमाम तरह की अशाइश दीं। वे जन्नत में आराम से रहते थे हज़ारों फरिश्ते उनकी खिदमत में पेश थे। फलों के बाग़ शर्बत की नदियां बहती थीं, फाख़रा लिबास बाबा आदम के पास थे। मगर वो उदास थे। जब अल्लाह ने पूछा।

“ए आदम क्या कमी रह गई तुम उदास क्यों हो?”

“अल्लाह मैं अपने दिल का हाल किस से कहूं, किस से बात करूं, यह नियामतें किस के साथ बांटूं?”

बाबा आदम ने अपने जैसे दूसरे इंसान की तलब की बात , दस्तरख़्वान साझा करने के लिए।

उन्होंने जीवनसाथी के साथ चीज़ों को साझा करने का इंतख़ाब किया, और उसके साथ संवाद को चुना। 

अल्लाह ने बाबा आदम को सुला दिया। और अम्मा हउआ को बनाकर उनकी बग़ल में बैठा दिया।

इस तरह सृष्टि की रचना मुकम्मल हुई जो स्त्री के बग़ैर अधूरी थी।

और स्त्री के साथ आधी नियामतें साझा करके और स्त्री के साथ संवाद करके ही लाइफ ख़ूबसूरत बनती है, दुनिया ख़ूबसूरत और मुकम्मल बनकर सामने आती है।

बाबा आदम अम्मा हउआ की औलादें स्त्री को बराबरी इज्ज़त मुहब्बत न्याय प्रिय और निष्पक्ष मानवीय व्यवहार देने में बुरी तरह से विफल हैं शुरू से ही। वे झगड़ पड़े एक स्त्री के लिए उसकी देह को हासिल करने के लिए और हत्या दमन शोषण की नींव रख डाली पृथ्वी पर। तब से स्त्री को हासिल करने के लिए दमन शोषण हत्या का सिलसिला जारी है। थमने का नाम नहीं ले रहा। एतिहासिक युद्धों के केन्द्र में अक्सर स्त्रीयां रही हैं। कोई भी कभी भी किसी भी स्त्री को हासिल करने के लिए युद्ध में झोंक दें लोगों को। कोई भी कभी भी स्त्री को जुए में लगा दे। कोई भी कबीले का सरदार अपनी कम उम्र बच्ची को दूसरे कबीले के सरदार को उपहार स्वरूप भेंट पर चढ़ा दे। पाकिस्तानी फिल्म ‘the daughter’ इसी पर आधारित है। कैसे कबीले के सरदार एक दूसरे के ख़ून के प्यासे हैं और दुश्मनी दूर करने का हल उनके पास यह है कि अपने अपने कबीले की कम उम्र की बेटियों को बूढ़े अधेड़ सरदार को निकाह कर भेंट चढ़ा देते हैं। फिल्म की नायिका भी इसी तरह एक बूढ़े सरदार की मिल्कियत में दे दी गई है। और उसके बूढ़े पति ने बेटी को भी दूसरे क़बीले के सरदार को अपनी बेटी भेंट कर दी है। नायिका जान की बाजी लगा कर अपनी बेटी को लेकर भाग जाती है। पूरी फिल्म में अपनी बेटी के अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष करती है और आख़िरकार अंत में लड़ते-लड़ते मर जाती है।

फिल्म the song of scorpions  भी स्त्री देह छल कपट से हासिल करने की कहानी है। स्त्री अस्मिता, स्त्री अस्तित्व के लिए प्रतिशोध लेने की कहानी है।

फिल्म की नायिका नूरन जो एक हुनर जानती है। बिच्छू का ज़हर अपने मार्मिक संगीत से काटती है। यह हुनर वो अपनी मां से सीखती है। उसका एक थैला है जिसमें वो ज़हर काटने के सामान रखती है, बिच्छू रखती है। जब कहीं किसी को बिच्छू काटता है तो घटनास्थल पर जाकर उपचार करती है। वो मार्मिक गीत गाती है दिन के उजाले में रात के अंधेरे में। उसको महताना मिलता है। इस काम के लिए उसकी आलोचना भी होती है। स्त्रियों का इधर उधर थैला उठाकर जाना अच्छा काम नहीं समझा जाता, ऐसी स्त्रियों को शरीफ का दर्जा नहीं मिलता। 

नूरन के मार्मिक गीत को फिल्म का नायक आदम सुनता है। आदम जो एक ऊंट के क्रय-विक्रय का व्यापारी है। वो नूरन को पसंद करता है। वो नूरन को आते-जाते टोकता है। शादी का प्रस्ताव देता है। लेकिन शराफत से नहीं जोर जबरदस्ती से। एक दिन वो नूरन को पकड़ कर शादी का प्रस्ताव देता है। वो कोई जवाब नहीं देती या मना करती है तो उसको दबोचता है, झंझोड़ता है। कुछ लोग देखकर उसकी पिटाई कर देते हैं। नूरन चली जाती है। आदम पिटाई खा कर अपनी बहन के घर चला जाता है। जब वो ठीक हो जाता है तो फिर से नूरन का पीछा करता है। आते-जाते छुपकर देखता है।

एक रात नूरन को एक बच्चा बुलाने आता है कि फलां जगह पर किसी को बिच्छू ने काट लिया है। नूरन रात को थैला लेकर जाती है। मगर वहां उसको झूठ बोल कर बुलाया गया है। वो अपने को बचाने की कोशिश करती है मगर बलात्कार होने से बचा नहीं पाती। अगली सुबह उसकी एक सहेली उसे ले जाती है, उसका हुलिया दुरुस्त करती है। चादर उढ़ा कर उसके घर ले जाती है। नूरन घर में अम्मी को ढूंढती है। उसकी अम्मी नहीं मिलती। यह रहस्य ही रह जाता है कि उसकी मां ने बदनामी के कारण गांव छोड़ दिया है या कहीं जा कर आत्महत्या कर ली है। 

नूरन पर दोहरी मार पड़ती है। वो अम्मी को खो चुकी है। उसे ढूंढती है। गांव के लोगों की आलोचना सहती है। कोई उसे गांव से चले जाने के लिए कहता है। कोई उसके प्रोफेशन को सभी घटनाओं का जिम्मेदार ठहराता है। नूरन अकेली पड़ गई है। ऐसे में फिल्म का नायक आदम उसे फिर से शादी का प्रस्ताव देता है। नूरन मजबूर हो चुकी है, स्थिति के सामने झुक जाती है। आदम उसे शादी करके घर ले जाता है। आदम की एक सात आठ साल की बेटी भी है। नूरन उसकी बेटी से मिलती है। आदम की बेटी सौतेली मां को देखकर स्तब्ध है और नूरन भी। वे एक-दूसरे को तकती रहती हैं। नूरन सामान्य नहीं है वो अपने ट्रॉमा से जूझ रही है। आदम खाना भिजवाता है बेटी के हाथ। नूरन सोती रहती है या गुमसुम उदास बैठी रहती है। कभी रेगिस्तान में जाकर बैठ जाती है। 

आदम नूरन को स्पेस देता है, उसको उसके दुःख से बाहर आने में मदद करता है। अच्छा व्यवहार करता है उसके साथ। वो नूरन को फिर से गीत गाने के लिए कहता है। नूरन ने गीत गाना छोड़ दिया है। वो आदम की बेटी के साथ धीरे-धीरे उसकी मासूमियत देखकर घुल मिल जाती है। खाना बनाने लगती है। वो आदम की बेटी को कहती है।

मन्ने चाहे जो समझ लें मां बहन सहेली। 

नूरन एक रोज़ आदम की बेटी को रोटी का निवाला खिलाने के लिए कहती है मुंह खोल। बच्ची मना कर देती है। नूरन उसको बार-बार फोर्स करती है मुंह खोलने के लिए। बच्ची विचलित हो जाती है परेशान हो जाती है।

नूरन उसको छोड़ देती है।

यह बहुत मार्मिक और मनोवैज्ञानिक दृश्य है।

नूरन को अपने साथ हुई जोर जबरदस्ती याद आ जाती है। वो अपनी ग़लती का अहसास करती है। महसूस करती है जबरदस्ती चाहे किसी भी प्रकार की हो, चाहे किसी भी तरह की भूख प्यास से जुड़ी हुई हो वो ग़लत है। जबरदस्ती कोई न मुंह खोलता है, न अपनी देह सौंपता है।

नूरन बच्ची को बहुत प्यार करती है मनाती है, जब वो देखती है कि बच्ची को गहरा दुःख पंहुचा है तो गीत गाने पर मजबूर हो जाती है। और बच्ची के लिए धीरे-धीरे गाती है।

गीत सुनकर बच्ची धीरे-धीरे सामान्य होती है।

आदम और नूरन भी धीरे-धीरे सामान्य होते हैं। नूरन एक रोज़ आदम से कहती है।

“मैं हर तरह से तेरी औरत बननी चाहूं पर मैं के करूं, अपना दुःख भूल न पाऊं !”

वो जब भी अपने दुःख को ग़ालिब होते हुए महसूस करती है, रेगिस्तान की रेत पर जाकर मार्मिक रुदन गीत शैली में करती है।

एक रोज़ आदम उस पुरुष के साथ शराब के ठेके पर जाता है, जिसने नूरन के साथ दुष्कर्म किया है। वहां पर देह व्यापार में लिप्त स्त्रियां भी हैं। वो दोनों अक्सर उस जगह जाते रहते हैं। उस रोज़ जब वापिस आते हैं तो दोनों में एक संवाद होता है। उस संवाद से एक रहस्य खुलता है आदम का।

नूरन को हासिल करने के लिए आदम ने ही उस दूसरे पुरुष को नूरन के साथ दुष्कर्म करने के लिए कहा होता है।

आदम सच सुन कर उस पुरुष को गाड़ी से धक्का मार कर रेत पर धकेल देता है। शराब के नशे में जब रेत पर वो जाकर गिरता है। आदम से तल्ख़ लहज़े में संवाद करता है तभी उसको बिच्छू काट लेता है। आदम से मदद मांगता है। आदम उसको छोड़ कर ग़ायब हो जाता है। बिच्छू के डंक ने घेर लिया है। घिसट घिसट कर वह आदमी नूरन की चौखट पर जाता है। मदद मांगने उपचार के लिए, वो नूरन से मुआफी मांगता है।

“नूरन आज सचमुच बिच्छू ने काट लियो !

मने बचा ले !

देख नूरन माहरी मर्ज़ी शामिल ना थीं थारे साथ में, पर मन्ने वोई कियो जो मन्ने आदम ने कयो !”

तेर साथ जो कुछ होयो वा मन्ने आदम के कन्ने से कियो !”

नूरन चाकू लाई होती है मारने के लिए।

मगर जैसे ही उसको आदम द्वारा किए गए धोखे छल कपट पाखंड का पता चलता है ! वो स्तब्ध रह जाती है, ज़मीन पर गिर जाती है।

“जा यहां से कहीं ओरे जा के मर !”

वो आदमी रेगिस्तान में जाकर मर जाता है।

नूरन उसका उपचार नहीं करती। उसका दुःख अब और भी दुगना हो जाता है जब आदम के बारे में पता चलता है। वो रेगिस्तान में जाकर रुदन करती है गाती है। वहीं वो आदमी मरा पड़ा है। रेत से उसको दबा देती है। वो अब प्रतिशोध से भर गई है। बदला लेना चाहती है।

वो भी अब आदम को सबक़ सिखाएगी, उसको उस दुःख का अहसास कराएगी जिससे वो गुज़र रही है।

कुछ रोज़ बाद आदम वापिस आता है।

वापस आकर देखता है नूरन बदल गई है, और अपने आप को उसने आदम के समक्ष प्रस्तुत कर दिया है। वो आदम को प्रेम पूर्वक स्पर्श करती है। दोनों अपनी गृहस्थी में आगे बढ़ते हैं। कुछ महीने बाद नूरन मां बनने वाली होती है। नूरन की राजस्थानी कल्चर में गोद भराई की रस्म अदायगी होती है। आदम कुछ रोज़ के लिए अपनी बेटी को अपने रिश्तेदार के यहां छोड़ने जाता है।

इधर नूरन अपने दुःख और प्रतिशोध से भरी हुई है। बदला लेने का टाइम आ गया है। आदम के लौटने से पहले वो ख़ूब रुदन करती है गीत गाती है। अपने उपचार के थैले से बिच्छू निकाल कर अपनी मुट्ठी में बंद करती है। हाथ को अपने पेट पर रखती है। बिच्छू नूरन को काट लेता है।

जब आदम लौटकर आता है नूरन उसको घर में नहीं मिलती है।

वो नूरन को तलाशता हुआ रेगिस्तान में जाता है जहां नूरन ज़िन्दगी मौत से संघर्ष कर रही है, और वहीं मार्मिक गीत गाती है। आदम नूरन की हालत देखकर स्तब्ध रह जाता है। वो नूरन से पूछता है। 

“नूरन क्या होयो !”

नूरन बताती है।

“जिसे तने इस्तेमाल कियो थो वो वहां रेत में दबा पड़ा है !”

आदम दूसरी ओर देखता है। वो समझ जाता है कि नूरन सच्चाई जान चुकी है। वो नूरन को समझाने की कन्विंस करने की कोशिश करता है।

वो कहता है।

“नूरन तू मेरी जान है 

मैं तन्ने बोत चाहूं!”

” तेरी खुशी 

तेरी जान 

तेरी लुगाई 

तेरा बच्चा 

मैं सब छीन लूंगी 

जैसे तन्ने मेरी खुशी मेरी अम्मा मुझसे छीन्नी !

अब तन्ने कुछ न मिले !”

वो आदम से दूर हट जाती है और अपना मार्मिक गीत धीरे-धीरे गाती है।

आदम भी वहीं निढाल पड़ा है, उसपर उड़ उड़ कर धूल जमा हो जाती है। जब होश आता है। वो घिसटता हुआ नूरन को पुकारता है।

नूरन नूरन …!

नूरन अपना प्रतिशोध लेकर दुनिया से विदा हो चुकी है।

ख़ामोश है उसके साथ उसका मार्मिक गीत। द सौंग  ऑव स्कॉर्पियन भी मर चुका है, ख़ामोश हो चुका है।

रेगिस्तान की गहरी ऊंची-नीची खाइयों की स्मृति में …

रेतीले मैदान की स्मृति में… 

ख़ला की स्मृति में… 

नूरन और उसके गीत की गूंज बाक़ी है !

अब नूरन की कहानी किसी एक स्त्री की कथा नहीं रह जाती, वह प्रतीक बन जाती है, उस व्यवस्था के विरुद्ध, जो स्त्री को पहले देह बनाती है और फिर उसी देह के आधार पर उसे दंडित भी करती है।

फिल्म का अंत हमें सुकून नहीं देता, बल्कि एक बेचैनी सौंपता है कि प्रतिशोध भी हमेशा मुक्ति नहीं होता। नूरन मरती है, पर उसके भीतर का संगीत, उसका आक्रोश और उसकी अस्मिता मरती नहीं।

रेगिस्तान की रेत सब कुछ ढँक लेती है- लाशें, रहस्य, अपराध, पर आवाज़ें नहीं ढँक पाती।

नूरन का गीत, उसकी पीड़ा और उसका प्रतिरोध उसी रेत में कहीं गूंजता रह जाता है ,एक ऐसे सवाल की तरह, जिसका जवाब अब भी बाकी है।

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मेहजबीं
मेहजबीं
पैदाइश- नई दिल्ली रिहाइश- नई दिल्ली शिक्षा- एम ए हिन्द दिल्ली विश्वविद्यालय पत्रकारिता- जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय बीएड चौधरी रणवीर सिंह यूनिवर्सिटी जिंद स्वतंत्र लेखन नज्म कविता संस्मरण फिल्म समीक्षा लेख
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