Monday, April 27, 2026
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स्मरणः रोशनी के उस पार— रघु राय की दृश्य-प्रार्थनाएँ

रघु राय इस नश्वर दुनिया में नहीं रहे पर वे अपनी तस्वीरों में जीवित हैं। उनकी तस्वीरें सिर्फ़ क्षणों को नहीं, मनुष्य होने के अर्थ को कैद करती हैं। वे सिर्फ़ देखने की वस्तु नहीं हैं, वे धीरे-धीरे भीतर उतरती हैं, जैसे कोई प्रार्थना; जो शब्दों से नहीं, अनुभव से बनती है। कुछ तस्वीरें समय के साथ फीकी पड़ जाती हैं, और कुछ हमारे भीतर एक स्थायी रोशनी की तरह जलती रहती हैं। राय की तस्वीरें इसी दूसरी तरीके की तस्वीरें हैं।
उनपर लिखा गया प्रभात सिंह का यह ‘स्मरण’ आत्मीय तरीके से उनके काम को समझने और उसे शब्द देने की एक ईमानदार कोशिश है। जब सब उनसे अपने सम्बंध की बात कर रहे तब प्रभात अपने हिस्से के रघु राय पर कुछ नहीं कहते, उन्हें बचाकर रखते हैं, शायद ‘भविष्य में कभी’ के लिए। यह ठहरकर देखना और लिखना प्रभात के लिखे की खासियत है, और इस लेख की भी…

जब दुनिया शोर से भर जाती है, तब कुछ तस्वीरें ख़ामोशी में बोलती हैं। रघु राय की तस्वीरें ऐसी ही ख़ामोश आवाज़ें हैं।उनके यहाँ दृश्य सिर्फ़ दृश्य नहीं रहता, वह आत्मा और संसार के बीच एक पुल बन जाता है।

रघु राय हमारे समय के आला दर्जे के उस्ताद फ़ोटोग्राफ़रों में से एक हैं, साथ ही गहरी बुद्धिमत्ता, आध्यात्मिकता और करुणा वाले कलाकार भी। उनका काम किसी ख़ास जगह या समय की सीमाओं से आज़ाद है। हालाँकि उनकी तस्वीरों में उनके अपने देश भारत का परिवेश ही है, पर उनका विषय दुनिया के पैमाने पर इंसानियत है। उनकी तस्वीरें आत्मा और अनुभव के बीच के रिश्ते पर केंद्रित होती हैं। जैसा कि बड़े अर्थपूर्ण तरीक़े से वह ख़ुद भी कहते हैं, ‘दुनिया से सारगर्भित संवाद के क्षण।’

(मरहूम माइकल ई. हॉफ़मैन, कार्यकारी निदेशक, अपर्चर फ़ाउंडेशन, न्यूयॉर्क, 2001)

आज जब रघु राय हमारे बीच नहीं हैं, हॉफ़मैन की कही इस बात पर फिर ग़ौर करने का मन करता है। रघु राय के काम के बारे में उनके नज़रिये या तारीफ़ के नाते नहीं, बल्कि ख़ुद रघु राय को उन्होंने जिस तरह उद्धृत किया, उसके मायने या उसकी अहमियत समझने के इरादे से।

 ऐसे समय में जब हमारी दुनिया तस्वीरों से पटी हुई है, ऐसी कितनी तस्वीरें हमारी स्मृति में बची होंगी, जो दुनिया से सारगर्भित संवाद करती हुई लगती हों, जो हमारी चेतना में पैवस्त होकर सचमुच कोई रुहानी रिश्ता क़ायम कर डालें, किसी उम्दा शेर की तरह जिनके मायने हम पर धीरे-धीरे खुलते जाएं और उन्हें बूझने की बेकली के बीच ‘वाह’ कहकर ख़ुद ही चौंक जाने के बजाय थोड़ी देर की ख़ामोशी हमें बेहतर मालूम होने लगे।

‘इवनिंग प्रेयर, जामा मस्जिद, दिल्ली’ (1985) याद कीजिए, क्षितिज पर सफ़ेद-सुरमई-धूसर बादलों के नीचे मद्धिम झिलमिलाती रौशनी के बीच दूर तक फैला पुरानी दिल्ली का भू-दृश्य, घर-मकान-मीनारें—पार्श्व में जामा मस्जिद और सामने की तरफ़ एक रिहाइश के एक रौशन कमरे में इबादत करती एक युवती के दुआ के लिए उठे हाथ। तस्वीर के बड़े हिस्से में फैले धुंधलके के बीच वह ज़रा-सी रौशनी, वह नूर, समूचे फ़्रेम को अनायास ही मुक़द्दस बना देता है।

रघु राय के कैमरे में 1985 की पुरानी दिल्ली

ठेले को धक्का लगाती औरत- विमेन कार्ट पुशर, दिल्ली (1979)- की धनुष-सी तनी काया, हाशिये से निकलकर उठते पाँव और उसके हाथ की मुद्रा देखकर किसी बहुमंज़िली इमारत की बराबरी करते बोझ और उसे धकेलने के लिए ज़रूरी ताक़त के साथ ही उसकी मेहनत की अहमियत का अंदाज़ भी होता है। फ़्रेम में स्त्री को जिस जगह रखा गया है, वह रघु राय के ‘दुनिया से सारगर्भित संवाद के क्षण’ की नज़ीर बन जाता है। श्रम की गरिमा को रेखांकित करती यह तस्वीर देखने वालों को अपने आसपास की दुनिया को देखने की नई निगाह, नया नज़रिया ज़रूर देती है।

दुनिया से इस क़िस्म का संवाद उनकी निगाह, उनके धैर्य और कैमरे के इस्तेमाल के उनके सलीक़े का गवाह बन जाता है। यह सिर्फ़ कलात्मक चमक नहीं पैदा करता, दृश्य को गहरे मानवीय बोध से भी भर देता है। बक़ौल रघु राय, यह ख़ुद को और दुनिया को समझने का ज़रिया है। जैसा कि हेनरी कार्तिए ब्रेसाँ ने एक बार कहा था कि जब आप व्यूफ़ाइंडर में देखने के लिए अपनी एक आँख बंद करते हैं, तो एक आँख दुनिया को देखती है और दूसरी आँख आपके भीतर झाँकती है! जैसे-जैसे आप ज़िंदगी के बारे में ‘क्लिक-दर-क्लिक’ सीखते हैं, आपकी चाहत यह होती है कि आप हर चीज़ को पूरी तरह से अपने अंदर समेट लें और उसे इस हद तक महसूस करें कि आपकी चेतना या आत्मा पर उसका कोई रंग न चढ़े। क्योंकि, इन क्षणों में आप जो कुछ भी होते हैं, वह सब आपके काम में झलकने लगता है। इस तरह आप एक साफ़ आईने की तरह दुनिया के सामने आते हैं।

ठेले को धक्का लगाती औरत- विमेन कार्ट पुशर, दिल्ली (1979)

1942 में झंग (अब पाकिस्तान में) में जन्मे रघु राय ने अपने कॅरिअर की शुरुआत सिविल इंजीनियर के तौर पर की, हालाँकि यह उनके मन का काम नहीं था। और फिर संयोग से एक ऐसा वाक़या पेश आया, जिसने उनकी ज़िंदगी की दिशा बदल ली। घूमने के इरादे से वह पंजाब गए हुए थे और अपने बड़े भाई एस. पॉल के फ़ोटोग्राफ़र दोस्त योग जॉय के साथ तफ़रीह के दौरान उन्होंने गधे के बच्चे की एक फ़ोटो खींची। पॉल साहब को वह फ़ोटो दिलचस्प लगी तो ‘बेबी डंकी’ शीर्षक के साथ उन्होंने लंदन के अख़बार ‘टाइम्स’ को भेज दी। तस्वीर छप गई। बक़ौल रघु राय, अख़बार ने तस्वीर के मुआवज़े के तौर पर इतनी रक़म भेजी थी कि उससे कई फ़िल्म रोल ख़रीदे जा सकते थे। बस, तस्वीर छपने और उसके मेहनताने ने उन्हें यह हौसला दिया कि वह फ़ोटोग्राफ़ी को अपना पेशा बना सकें। यह 1964 की बात थी।

1965 में ‘द स्टेट्समैन’ में उन्हें मुख्य फ़ोटोग्राफ़र के तौर पर नौकरी मिल गई। वहाँ क़रीब दस बरस काम करने के बाद फ़ोटो एडिटर के तौर पर वह ‘संडे’ में चले गए और बाद में ‘इंडिया टुडे’ में।  कार्तिए-ब्रेसाँ ने 1971 में उन्हें ‘मैग्नम’ के सदस्य के तौर पर नामित किया; जिससे वह ताउम्र वाबस्ता रहे। दीगर बात है कि ‘मैग्नम’ के सदस्य महत्वपूर्ण घटनाओं को दर्ज करने के लिए दुनिया भर में घूमते मगर अपने कैमरे के लिए रघु राय को अपना देश ही भाता था। उनके लिए भारत ही पूरी दुनिया थी- जिंदगी का-महासागर, जो दिन-रात उथल-पुथल से भरा रहता है। यह कभी भी एक जैसा नहीं रहता। एक ही जगह पर भी नहीं रहता। वह कहते कि हमारी सभ्यता के कई अनमोल ख़ज़ाने- मानवीय रिश्ते, मूल्य और रोज़मर्रा की ज़िंदगी के मेल-जोल- बड़े बदलावों से गुज़र रहे हैं। मैं फ़ोटोग्राफ़ी की अहमियत के बारे में इसी नज़रिये से सोचता हूँ- इंसान को इंसान के करीब लाना, उसे इंसानी सच्चाइयों से रूबरू कराना। यह टेलीविज़न स्क्रीन से एकदम अलग है, जहाँ तस्वीरें टिमटिमाते अनुभव की तरह आती हैं और ग़ायब हो जाती हैं; लेकिन फ़ोटोग्राफ़ एक ऐसे अनुभव के तौर पर हमेशा बने रहते हैं जो इतना ताक़तवर और इतना असरदार होता है कि वह मूर्त रूप ले लेता है।

वह कामयाबी की उस मंज़िल तक पहुँचे जहाँ उनके काम ने न सिर्फ़ भारतीय फ़ोटोग्राफ़ी को वैश्विक पटल पर मान दिलाया, बल्कि अपने देश में वह फ़ोटोजर्नलिज़्म का पर्याय बन गए। कैमरा लेकर अख़बार के दफ़्तर पहुँचने वाले हर शख़्स का सपना रघु राय जैसा बनना हुआ करता था। उनके काम की मक़बूलियत और शोहरत उस मुक़ाम तक पहुँच गई, जहाँ उनका नाम विशेषण या मुहावरे की तरह बरता जाना लगा। प्रसंगवश, अपनी आत्मकथा ‘अपनी धुन में’ में रस्किन बॉण्ड ने लिखा है, ‘राकेश का सबसे छोटा बेटा, गौतम अपने कैमरे के साथ मसरूफ़ है और ख़ुद को रघु राय या कार्तिए-ब्रेसाँ समझ रहा है।’

रघु राय मानते थे कि सदियों से भारत में इतना कुछ घुल-मिल गया है कि यह असल में सिर्फ़ एक देश या एक संस्कृति नहीं रह गया है। यह बेशुमार मज़हबों, मान्यताओं, तहज़ीबों और उनकी रवायतों के अलग-अलग बहावों से भरा हुआ है, जो देखने में शायद बेमेल लगें। लेकिन भारत अपनी सभ्यता की आंतरिक भावना को—अपने सारे विरोधाभासों के साथ—जीवंत रखता है। इसने कई सदियों से एक ही समय में, एक-दूसरे के साथ रहना सीख लिया है। और एक बढ़िया तस्वीर, हमारे समय के फ़ोटो-इतिहास के रूप में, इस बात की एक स्थायी गवाह होती है। एक बहुभाषी, बहुसांस्कृतिक और बहु-धार्मिक समाज होने के नाते, तस्वीरों को एक बहु-स्तरीय अनुभव के ज़रिये इन जटिलताओं को बयान करना चाहिए। उन्हीं के लफ़्ज़ों में, “फ़ोटोग्राफ़ी का मक़सद उस समय को कैद करना है जिसमें हम जी रहे हैं। इतिहास लिखा जाता है और फिर-फिर लिखा जाता है, लेकिन दृश्य इतिहास (विज़ुअल हिस्ट्री) को फिर से नहीं लिखा जा सकता।”

तभी तो छह दशक से ज़्यादा समय वह अपनी दुनिया और अपने समय के सजग साक्षी बने रहे, उनकी इस दुनिया में बहुत मामूली लोग शामिल थे और बहुत यशस्वी भी। उनकी लिखी हुई विज़ुअल हिस्ट्री से गुज़रते हुए हम बदलते मौसमों के रंग में ताजमहल से रूबरू होते हैं, तो चावड़ी बाज़ार में पिघले हुए डामर की सड़क से भी, इंदिरा गाँधी, सत्यजीत रे, बिस्मिल्लाह ख़ाँ के पोर्ट्रेट पाते हैं, तो अनाम और मामूली चेहरों की भीड़ भी, दिल्ली, बंबई और कलकत्ता के साथ ही बनारस भी, क़ुदरत और पेड़ भी, कुश्ती के अखाड़े में पहलवानों के साथ ही ब्याह में हल्दी लगाए बैठी दुल्हन की छवियाँ भी। उन्होंने सिंडी क्राफ़ोर्ड की कलकत्ता आमद का ब्यौरा या सद्गुरु की आध्यात्मिक आभा ही दर्ज नहीं की, मदर टेरेसा की करुणा और भोपाल गैस त्रासदी के भयावह और दारुण दस्तावेज़ भी बनाए। उनकी निगाह सब तरफ़ रहती। वह दिल्ली में नामचीन लोगों के जलसे में दिखाई देते तो कुम्भ के मेले की भीड़ में अकेले घूमते हुए भी। तस्वीरों के ज़रिये जिस जटिल, बहुरंगी और बहु-स्तरीय दुनिया को समझने-समझाने के वह हिमायती थे, उसे पूरी शिद्दत से जीते भी रहे।

उनकी तस्वीरों के बारे में कभी उनसे बात करने वाले जानते हैं कि क़ुदरत और उसकी मेहरबानी के वह इतने क़ायल थे कि सारा श्रेय उसी को देते। और यह कोई बहाना बनाने या बात टालने की मंशा से हरग़िज़ नहीं होता था। बात करते हुए उनकी आवाज़ में जो श्रद्धा भाव झलकता था, वही उनकी सच्चाई का गवाह होता था। बनारस के घाट पर पालथी मारकर बैठे एक शख़्स की तस्वीर का हवाला देकर बताते कि फ़्रेम कंपोज़ कर लेने के बाद देखा कि सामने मंथर गति से बहती गंगा के ऊपर ख़ाली आसमान था। शटर दबाने को हुए कि तभी जाने कहाँ से एक परिंदा उड़ता हुआ आ गया, और उसकी मौजूदगी से ख़ाली आसमान की एकरसता तो टूटी ही, तस्वीर और जीवंत हो उठी।

क़ुदरत पर ऐसी अगाध श्रद्धा और अपनी क़िस्म की आध्यात्मिक आभा वाले वह अकेले फ़ोटोग्राफ़र थे।

रघु राय की तस्वीरें हमें सिर्फ़ दुनिया दिखाती नहीं, वे हमें देखने की तमीज़ सिखाती हैं। वे याद दिलाती हैं कि हर चेहरा एक कथा है, हर क्षण एक इतिहास। और शायद यही वजह है कि उनके फ़्रेम समय से बाहर निकलकर हमारे भीतर बस जाते हैं—जैसे कोई अधूरी प्रार्थना, जो बार-बार लौटकर पूरी होने की माँग करती है।

प्रभात
प्रभात
प्रभात कैमरे के व्यूफ़ाइंडर को दुनिया को देखने-समझने की जादुई खिड़की मानते हैं और तस्वीरों को समाज का नायाब दस्तावेज़। आम लोगों की कहानियाँ सुनना और सुनाना उनका पसंदीदा शगल है और घुमक्कड़ी इसका बहाना। सिनेमा, संगीत और थिएटर में ख़ास दिलचस्पी, और लोक-संस्कृति के प्रति जिज्ञासा है, सो आर्ट, अदब और थिएटर में ज़िन्दगी का मकसद तलाशते घूमते हैं। अरसे तक 'अमर उजाला' के संपादक रहे। थारू जनजाति पर एक मोनोग्राफ़, और कुंभ के मेले पर एक किताब लिखी है, अख़बारनवीसी पर भी दो किताबें हैं। मार्क टुली के कहानी संग्रह और रस्किन बॉन्ड की आत्मकथा का हिंदी में अनुवाद किया है। इन दिनों 'जीरो माइल बरेली' नामक अपनी किताब को लेकर चर्चित।
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2 COMMENTS

  1. मैं उनसे रू-ब-रू बावस्ता तो नहीं हो सका लेकिन उनकी तस्वीरें हमेशा ख्यालों में बनी रहेंगी। उनकी कला, उनकी दृष्टि, विचार सब मिलकर उन्होंने जिस किरदार को जिया वो किरदार अमर हो गया।

    भावपूर्ण श्रद्धांजलि 🌹🙏

  2. आपने ने अपने अनुपम आलेख से सच्ची आदरांजलि दी है

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