Tuesday, April 21, 2026
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एक गीत: मौसम-मौसम- एक भूली हुई धुन का धीमा उजाला

कभी-कभी कुछ गीत अपने ही समय के शोर में इतने दब जाते हैं कि उनकी आहट भी स्मृति तक नहीं पहुँचती। वे हमारे भीतर कहीं रहते तो हैं, पर जैसे धुंध में लिपटे। न पूरी तरह खोए, न पूरी तरह मिले। ऐसा ही एक गीत है-‘मौसम मौसम लवली मौसम…’जो एक सुपरहिट फ़िल्म के चमकते गीतों के बीच कहीं किनारे पर छूट गया। इस गीत को गीत सुनने पर लगता है जैसे कोई पुरानी खिड़की अचानक खुल जाए और भीतर से मुलायम, अधखिली धूप बाहर झरने लगे। धीमी, सधी हुई, पर थोड़ी-सी उदास।

हिंदी सिनेमा का इतिहास केवल उन गीतों का इतिहास नहीं है जो बहुत सुने गए, बल्कि उन गीतों का भी है जो कम सुने गए। और वे इसलिए कहीं ज़्यादा आत्मीय हो उठे। फ़िल्म थोड़ी सी बेवफाई का नाम लेते ही आमतौर पर एक भारी, भावुक धुन हमारे भीतर गूंजती है। हज़ार राहें मुड़ के देखीं…जिसने समय को अपने पक्ष में कर लिया। इसका दूसरा प्रेमगीत- आंखों में हमने आपके सपने सजाये हैं… भी रोमैंटिसिज्म और प्रेम का एक नया प्रतिमान बनता है। लेकिन इसी फ़िल्म के भीतर एक और गीत है, जो जैसे उस समय से थोड़ा बाहर खड़ा है। थोड़ा आगे। न उतना चर्चित, न उतना उद्धत, न उतना उद्द्धृत, पर अपनी सादगी में कहीं अधिक निजी और मासूम –

‘मौसम मौसम लवली मौसम
‘कसक अनजानी है मद्धम मद्धम
चलो घुल जाएँ, मौसम में हम’

इस गीत की पहली विशेषता यही है कि यह एक ‘छूट गया’ गीत है। और छूट जाना कभी-कभी नियति होता है। क्योंकि तब आप कभी लोकप्रियता की चकाचौंध से मुक्त होकर किसी अंजानी कौंध की तरह सीधे संवेदना के स्तर पर उतरते हैं। उस ठौर ठहरकर सुने और गुने जाते हैं। इस गीत का मुकद्दस मुकद्दर भी शायद यही है।

यह गीत उस दौर का है जब शब्दों और धुनों के बीच एक सधी हुई दूरी हुआ करती थी। दोनों एक-दूसरे में घुलते तो थे, पर एक-दूसरे को निगलते नहीं थे। गुलज़ार की लेखनी में हमेशा से एक सहजता रही है। वे भारी भरकम शब्दों के बजाय हल्की-सी फुसफुसाती सी कोई बात कहते हैं। जैसे ऐसी कोई बात जो सिर्फ अपने प्रिय के कानों में कही जानेवाली हो।

इस गीत को सुनते हुए बार-बार यह महसूस होता है कि यह ‘मौसम’ दरअसल बाहरी नहीं, भीतरी है। ‘कसक अनजानी है मद्धम मद्धम…’-यह पंक्ति अपने आप में एक पूरा भावलोक रच देती है। यह कसक किस बात की है? प्रेम की? अधूरेपन की? या सिर्फ़ उस क्षण की, जो बीत रहा है? गुलज़ार के यहां ‘अनजानी’ शब्द बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह किसी स्पष्ट व्याख्या से बचाता है। यह कसक किसी एक कारण से नहीं, बल्कि कई अनकहे कारणों से बनी है। और शायद यही इस गीत की सबसे बड़ी ताकत है कि यह आपको कोई निश्चित अर्थ नहीं देता, बल्कि भाषा को समझने, उससे खेलने और अपने अर्थ खोजने की जगह देता है।

अगर हम उसी दौर के एक और मशहूर गीत – ‘गापुची गापुची गम गम ‘(फिल्म त्रिशूल) से इसकी तुलना करें तो अंतर साफ़ दिखाई देता है। वह बाहर की दुनिया का उत्सव है। रंग, ऊर्जा, नृत्य, और दृश्य का चमत्कार। जबकि ‘मौसम…’ भीतर की दुनिया का गीत है। जहाँ सब कुछ धीमा है, लगभग स्थिर।

शायद इसी वजह से ‘गापुची …’ ज़्यादा लोकप्रिय हुआ,क्योंकि वह दर्शकों को तुरंत आकर्षित करता है। जबकि ‘मौसम’ आपको थोड़ा समय देता है, और आज के समय में ‘समय देना’ सबसे कठिन काम है।

यह गीत एक तरह से ‘बीच का गीत’ है। न पूरी तरह दुख, न पूरी तरह खुशी। यह उन क्षणों का गीत है जब आप कुछ महसूस तो कर रहे होते हैं, पर उसे शब्द नहीं दे पाते। और यही उसकी खूबसूरती है। वह आपको आपके ही भीतर के एक कोने से मिलवाता है, जहाँ आप अक्सर नहीं जाते।

‘लवली मौसम’ जैसा यह बेमेल प्रयोग गुलजार के यहाँ कोई चौंकाने वाली बात नहीं, बल्कि एक स्वाभाविक विस्तार सा है, जहाँ भाषा अपनी सीमाओं को लांघकर एक नवीन लय गढ़ती है। नया संसार रचती है। और यह प्रयोग गुलजार में आज तक और अनवरत है। हाल के दिनों में तो और ज्यादा। बस इस एक प्रयोग भर से यह गीत जैसे समय की चौहद्दियों से बहुत कहीं आगे जा खड़ा होता है। बहुत आगे… जैसे किसी आज के गीत की शब्दावली या शब्द।

यहाँ अंग्रेज़ी भाषा का शब्द ‘लवली’ किसी बनावटी शब्द चयन या चमत्कार का हिस्सा नहीं रह जाता, बल्कि भावों का विस्तार है। जैसे नादान प्रेमी या अभी-अभी का हुआ दोस्त बिलकुल बोलचाल की तरह अचानक हिंदी के बीच अंग्रेज़ी का एक शब्द बोल दे, और वही सबसे सच्चा लगने लगे तावक्त। गुलज़ार के गीतों में यह कैज़ुअलपन दरअसल बहुत गहरे तक उनके शिल्प का हिस्सा है। एक तरह का अनगढ़पन, जो भीतर से बहुत तराशा हुआ होता है।क्योंकि इस गीत में जो चेहरे हैं, वे बहुत कमसिन चेहरे हैं। तुरत-तुरत ग्यारहवीं के हुये दो छात्र। बचपना ठीक से अभी गया नही और युवावस्था भी ठीक -ठीक आई नहीं। उनकी दृष्टि से सोचें तो यह शब्द बहुत सोच समझकर चुना हुआ लगता है।

और फिर इस गीत का संगीत…

खैय्याम का नाम आते ही जो धुनें याद आती हैं, वे अक्सर शास्त्रीयता की एक गहरी परंपरा से जुड़ी होती हैं। धीमी, गंभीर, और कहीं-कहीं लगभग आध्यात्मिक। लेकिन ‘मौसम मौसम…’में वे अपने ही बनाए साँचे से थोड़ा बाहर आते दिखाई देते हैं। यहां धुन में एक हल्की-सी चंचलता है, एक अलग सहजपन, जैसे कोई गंभीर व्यक्ति अचानक मुस्कुरा दे। लेकिन यह चंचलता भी बहुत संयमित है, कहीं भी उछाह में उछलती हुई नहीं। इस गीत को सुनते हुए लगता है जैसे हवा में सचमुच कोई हल्की-सी नमी है और ‘कली के होठों पर मुस्नकुराहट सी है।’ बारिश, न धूप। बस एक ऐसा मौसम, जो खुद को पूरी तरह व्यक्त नहीं करता। पर वह छुपा हुआ भी नहीं है…खैयाम साहब की यही खूबी थी। वे शोर में भी सन्नाटा रच सकते थे। और इस गीत में उन्होंने सन्नाटे के भीतर एक मीठी खनक पैदा की है।

गायकी की बात करें तो अनवर और सुलक्षणा पंडित, तब दो ऐसी आवाज़ें थीं, जो उस समय स्थापित नहीं थीं, लेकिन अपने भीतर बहुत ताजगी समेटे हुए थीं, जो इन ताजगी भरे चेहरों के बिलकुल अनुकूल थी।

अनवर की आवाज़ में एक अजीब-सी मुलामियत है। वह मुलामियत, जो अक्सर मोहम्मद रफ़ी की याद दिलाती है। यह समानता कभी उनके लिए वरदान रही, और कभी अभिशाप भी। लोग उन्हें सुनते थे, पर पहचान नहीं पाते थे। जैसे किसी विशाल वृक्ष की छाया में खड़ा कोई सुकुमार, सुंदर और नवल वृक्ष। लेकिन ‘मौसम मौसम…: में उनकी आवाज़ अपनी अलग पहचान बनाती दिखती है। धीमी, फिसलती हुई, जैसे हवा में कोई परछाईं।

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सुलक्षणा पंडित के पास अभिनय के संग-संग सुर और संगीत से जुड़े उनके परिवार की बदौलत सुरों का एक संस्कार भी रहा है; बतौर गायिका वे पनपी, नहीं पनपीं, क्यूं नहीं पनपीं, ये दीगर सवालात हैं। क्योंकि उनकी जिंदगी की कथा भी एक अलग सी व्यथा है। और अब तो वे इस नश्वर दुनिया का हिस्सा भी नहीं हैं। लेकिन इस गीत में उनकी आवाज़ एक कोमल प्रतिध्वनि की तरह जुड़ती है। न बहुत प्रमुख, न बहुत पीछे। बस उतनी ही, जितनी ज़रूरी है। जैसे उन्हें यह बखूबी पता हो, कहां खुद को कितना देना या सौंपना है। जितनी अनवर की आवाज़ सुशांत की आवाज़ लगती है, उससे कहीं बहुत ज्यादा सुलक्षणा की आवाज़, पद्मिनी की आवाज़। ये आवाज़ें मिलकर इस गीत को एक ‘संवाद’ बना देती हैं। जहाँ शब्दों से ज़्यादा ख़ामोशी बोल रही, कहे से ज्यादा अकहा कहा जा रहा। संवाद वाले गीतों की सफलता का एक अलग इतिहास रहा है, हमारी फिल्म इंडस्ट्री में- ‘कौन दिशा में.. हुस्न पहाड़ों का …चल चमेली…गापूजी-गापूजी … और इससे आगे पीछे भी न जाने कितने गीत गीतों का यह कारवां रहा है। यह गीत उस परंपरा में कुछ अद्भुत नहीं जोड़ती, तो उसे धूमिल भी नहीं करती।

अब बात उस दृश्य की, जहाँ यह गीत फ़िल्माया गया है। परदे पर सिद्धार्थ रे और पद्मिनी कोल्हापुरे हैं ( इस फिल्म में दोनों इसी नाम से इंट्रोड्यूस किये गये थे), तब की एक नई जोड़ी, जो उस समय अपनी पहचान बना ही रही थी। ये दोनों हीं बाल कलाकार के रूप में अपनी पारी पूरी कर चुके थे। बनिस्बत सुशांत पद्मिनी बतौर बाल कलाकार एक ज्यादा सफल पारी पूरी करके आई थीं।

सिद्धार्थ की कहानी अपने आप में एक अधूरी कविता की सी है। वी. शांताराम जैसे बड़े नाम की विरासत, बाल कलाकार के रूप में होम प्रोडक्शन की फिल्में, “जल बिन मछली नृत्य बिन बिजली” और “चानी” में अभिनय और फिर एक हीरो के रूप में असफलता। उनकी उपस्थिति में हमेशा एक ‘संभावना’ दिखाई देती है। पर वह संभावना कभी पूरी तरह आकार नहीं ले सकी। इस गीत में भी वे कहीं-न-कहीं उस संभावना के अधूरेपन के साथ मौजूद हैं।

(बाद में बाज़ीगर में उनका एक छोटा-सा लेकिन यादगार रूप दिखाई देता है-‘छुपाना भी नहीं आता’ के साथ। लेकिन जीवन ने उन्हें बहुत समय भी नहीं दिया। सिर्फ़ 40 साल की उम्र में उनका जाना जैसे एक अधूरी कहानी का अचानक हुआ अंत हो।)

फिर से गीत पर लौटते हुये कुछ अन्य पर जरूरी तथ्य। अब ठहरकर देखें तो यहाँ गीत और दृश्य के बीच कुछ अजीब-सा और असंतुलित दिखाई देता है। गीत जिस तरह के रोमांस की माँग कर रहा- एक परिपक्व, थोड़ा ठहरा हुआ प्रेम। वह इन दोनों के व्यक्तित्व में पूरी तरह नहीं उतर पाता। ये कुछ ज़्यादा ही युवा लगते हैं, जैसे गीत उनसे थोड़ा आगे निकल रहा हो, उम्रदराज हो। खासकर सुशांत के लिए। पद्मिनी की वयस्क अभिनयक्षमता, जिसके लिए वो बचपन से जानी जाती हैं, थोड़ा संभाल लेती हैं, उम्र का भार, बचपने को दो कदम पीछे रखती हैं। पर यह अंतराल भी है, जो इस गीत को स्मृतियों में सहेजे रखने का कारण बनती है।

यहाँ एक दिलचस्प बात यह है कि कभी-कभी गीत और दृश्य के बीच यह दूरी ही गीत को बचा लेती है। अगर यह गीत पूरी तरह ‘परफेक्ट’ तरीके से फ़िल्माया जाता, तो शायद वह भी तमाम परफेक्ट गीतों की उसी भीड़ में शामिल हो जाता। लेकिन यहाँ यह थोड़ी-सी असंगति ही उसे अलग पहचान देती है। और आज जब हम इस गीत को यूट्यूब या किसी और माध्यम पर सुनते हैं, तो वह केवल एक पुराना गीत नहीं रहता। वह एक स्मृति बन जाता है- उस समय की, जब गीतों में इतनी जल्दी नहीं होती थी।

‘मौसम मौसम लवली मौसम…’ सुनते हुए ऐसा लगता है जैसे कोई पुराना ख़त खुल गया हो। जिसकी स्याही थोड़ी फीकी पड़ चुकी है, पर शब्द अब भी साफ़ हैं।

यह गीत हमें यह भी याद दिलाता है कि लोकप्रियता ही किसी कला का अंतिम मापदंड नहीं होती। कई बार जो कम सुना गया, वही ज़्यादा गहरा होता है।

अंततः, यह गीत एक धीमी लौ की तरह है, जो तेज़ तो नहीं जलती, पर लंबे समय तक जलती रहती है।

यह आपको चकाचौंध नहीं देता, बल्कि एक शांत उजाला देता है,जो धीरे-धीरे आपके भीतर फैलता है। और शायद यही इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है कि यह आपको अपने ही भीतर के मौसम से मिलवाता है। क्योंकि हर इंसान के भीतर एक ‘लवली मौसम’ होता है या फिर उसकी स्मृतियां। लेकिन अक्सर भीड़ और समय के शोर में दब जाता है।

कविता
कविता
कविता जन्म: 15 अगस्त, मुज़फ्फरपुर (बिहार)। पिछले ढाई दशकों से कहानी की दुनिया में सतत सक्रिय कविता स्त्री जीवन के बारीक रेशों से बुनी स्वप्न और प्रतिरोध की सकारात्मक कहानियों के लिए जानी जाती हैं। नौ कहानी-संग्रह - 'मेरी नाप के कपड़े', 'उलटबांसी', 'नदी जो अब भी बहती है', 'आवाज़ों वाली गली', ‘क से कहानी घ से घर’, ‘उस गोलार्द्ध से’, 'गौरतलब कहानियाँ', 'मैं और मेरी कहानियाँ' तथा ‘माई री’ और दो उपन्यास 'मेरा पता कोई और है' तथा 'ये दिये रात की ज़रूरत थे' प्रकाशित। 'मैं हंस नहीं पढ़ता', 'वह सुबह कभी तो आयेगी' (लेख), 'जवाब दो विक्रमादित्य' (साक्षात्कार) तथा 'अब वे वहां नहीं रहते' (राजेन्द्र यादव का मोहन राकेश, कमलेश्वर और नामवर सिंह के साथ पत्र-व्यवहार) का संपादन। रचनात्मक लेखन के साथ स्त्री विषयक लेख, कथा-समीक्षा, रंग-समीक्षा आदि का निरंतर लेखन। बिहार सरकार द्वारा युवा लेखन पुरस्कार, अमृत लाल नागर कहानी पुरस्कार, स्पंदन कृति सम्मान और बिहार राजभाषा परिषद द्वारा विद्यापति सम्मान से सम्मानित। कुछ कहानियां अंग्रेज़ी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में अनूदित।
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