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मद्रास हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को लगाई फटकार, ईसाई बहुल गांव में हिंदू युवक को सार्वजनिक भूमि का उपयोग करने की नहीं दी थी अनुमति

मद्रास हाई कोर्ट ने ईसाई बहुल गांव में हिंदू व्यक्ति को सार्वजनिक भूमि के इस्तेमाल की अनुमति न देने को लेकर तहसलीदार के फैसले को पलट दिया।

चेन्नईः मद्रास हाई कोर्ट ने हाल ही में एक तहसीलदार द्वारा हिंदू निवासी को स्थानीय सार्वजनिक स्थल पर अन्नदान (भोजन वितरण) करने की अनुमति देने से इंकार करने की आलोचना की थी। अदालत ने आशंका व्यक्त की थी कि इस तरह के आयोजन से कानून और व्यवस्था की समस्या उत्पन्न हो सकती है क्योंकि ईसाई बहुल गांव में 100 वर्षों से अधिक समय से इस भूमि का इस्तेमाल ईसाई समुदाय द्वारा किया जा रहा है।

जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन ने इस बात पर प्रकाश डाला कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है। अदालत ने कहा कि सभी सार्वजनिक मैदान सभी समुदायों के इस्तेमाल के लिए होने चाहिए या फिर किसी के लिए भी नहीं।

मद्रास हाई कोर्ट ने क्या कहा?

31 अक्टूबर के फैसले में उन्होंने कहा कि जब विचाराधीन भूमि पट्टा नहीं है बल्कि सरकार की है तो यह धार्मिक या सांप्रदायिक पृष्ठभूमि से परे सभी वर्गों के लिए होनी चाहिए…मेरा मानना है कि यदि राज्य से संबंधित कोई सार्वजनिक भूमि आम जनता के उपयोग के लिए उपलब्ध है तो किसी विशेष वर्ग को इसके उपयोग से वंचित नहीं किया जा सकता।

उन्होंने आगे कहा कि यदि बहिष्कार का एकमात्र आधार धर्म है तो यह निश्चित रूप से भारत के संविधान के अनुच्छेद 15 का उल्लंघन होगा। जस्टिस स्वामीनाथन ने सुनवाई के दौरान एक ईसाई प्रतिवादी के इस तर्क को खारिज कर दिया कि यह समझौता 1912 से है कि केवल ईसाई समुदाय ही संबंधित सार्वजनिक भूमि का इस्तेमाल करेगा। ईसाई पक्ष की ओर से पेश हुए वकील की तरफ से यह भी तर्क दिया गया था कि 2017 में आयोजित एक शांति बैठक में इस समझौते को कथित तौर पर मजबूत किया गया था।

अदालत ने कहा “हम एक धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य हैं। हमारा संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ था। कोई भी पूर्व-संविधान व्यवस्था जो संवैधानिक प्रावधानों और लोकाचार के अनुरूप नहीं है, उसे जारी रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती। सार्वजनिक मैदान सभी समुदायों के उपयोग के लिए उपलब्ध होना चाहिए या किसी के लिए भी नहीं। मैं इस दलील को स्वीकार नहीं कर सकता कि ईसाई ईस्टर पर मैदान का उपयोग कर सकते हैं लेकिन हिंदू उसी स्थान पर अन्नदान नहीं कर सकते।”

जस्टिस स्वामीनाथन ने क्या कहा?

जस्टिस स्वामीनाथन ने आगे कहा कि ऐसा नहीं है कि ईस्टर के दौरान अन्नदानम आयोजित करने की मांग की जा रही थी जबकि ईसाई वास्तव में इस मैदान का उपयोग अपने उत्सवों के लिए करते हैं। उन्होंने सवाल किया कि अगर अन्नदानम 3 नवंबर को आयोजित किया गया जब मैदान दूसरों के उपयोग के लिए स्वतंत्र था तो ईसाइयों के अधिकार कैसे प्रभावित होंगे?

उन्होंने आगे कहा कि ऐसा नहीं है कि मैं ईस्टर के अवसर पर हिंदू उसी मैदान में अन्नदानम या कोई अन्य कार्यक्रम आयोजित करना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि मैं तो यहां तक कहूंगा कि जब ईस्टर समारोह की बात आती है तो केवल ईसाई समुदाय को ही मैदान का उपयोग करने की अनुमति दी जानी चाहिए।

अदालत ने अथुर तालुक के तहसीलदार द्वारा 24 अक्टूबर को मैदान में अन्नदानम आयोजित करने देने से इंकार करने के फैसले को खारिज कर दिया। गौरतलब है कि तहसीलदार ने इस मामले में पहले हिंदू निवासी के.राजमणि को भोजन वितरण करने की अनुमति दी थी लेकिन किसी अन्य स्थान पर।

इसके बाद राजमणि ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। यह विवादित स्थल कालियाम्मन मंदिर के आसपास की जगह है। राजमणि ने मंदिर के कुंभाभिसेकम के अवसर पर भोजन वितरण करने की मांग की थी।

31 अक्टूबर को अदालत ने इसके लिए अनुमति दी थी। अदालत ने इस मामले में टिप्पणी के दौरान एक अन्य मामले का भी जिक्र किया जिसमें अदालत ने बाइबिल अध्ययन केंद्र की स्थापना की भी अनुमति दी थी। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि केवल कानूनी-व्यवस्था की आशंकाएं संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत धार्मिक अधिकारों के आड़े नहीं आ सकतीं।

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अमरेन्द्र यादव
लखनऊ विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातक करने के बाद जामिया मिल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई। जागरण न्यू मीडिया में बतौर कंटेंट राइटर काम करने के बाद 'बोले भारत' में कॉपी राइटर के रूप में कार्यरत...सीखना निरंतर जारी है...
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अमरेन्द्र यादव
लखनऊ विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातक करने के बाद जामिया मिल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई। जागरण न्यू मीडिया में बतौर कंटेंट राइटर काम करने के बाद 'बोले भारत' में कॉपी राइटर के रूप में कार्यरत...सीखना निरंतर जारी है...
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