नई दिल्ली: महिला आरक्षण संशोधन विधेयक और परिसीमन बिल पर संसद में जारी बहस के बीच सरकार ने देर रात एक अहम फैसला ले लिया। सरकार ने संसद और राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण वाले नारी शक्ति वंदन अधिनियम-2023 को लागू करने का नोटिफिकेशन जारी कर दिया। ऐसा क्यों किया गया, इसके पीछे कई तरह के तर्क सामने आ रहे है। इसमें एक एंगल रूल-66 का भी है। सरकार ने मौजूदा तीन विधेयक रूल-66 के तहत ही पेश किया है। आखिर पूरी कहानी क्या है, आइए इसे सिलसिलेवार तरीके से समझते हैं।
दरअसल, देर रात कानून मंत्रालय की ओर से नोटिफिकेशन जारी हुआ। इसमें कहा गया है कि सरकार 16 अप्रैल 2026 से 2023 वाले अधिनियम के प्रावधान लागू करती है। राष्ट्रपति की ओर से इस कानून को 2023 में ही मंजूरी मिल गई थी। अब इसमें संशोधन को लेकर संसद में चर्चा हो रही है। ऐसे में सरकार का फैसला अचरज वाला है कि जब संशोधन पर चर्चा हो रही है, तो 2023 वाले कानून को लागू करने का नोटिफिकेशन अचानक क्यों आया।
सरकार की ओर से इस पर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। हालांकि, विपक्ष ने इसे 2023 के कानून को बचाने का एक ‘प्रयास’ बताया है। विपक्ष के अनुसार यह उस परिस्थिति के लिए सरकार की तैयारी है अगर संशोधित 2026 विधेयक सदन से पारित नहीं हो पाता।
सरकार ने क्यों उठाया ये कदम, रूल-66 की कहानी क्या है?
समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार एक अधिकारी ने बताया कि 2023 में पास हुए कानून को लागू करने नोटिफिकेशन जरूर आया है लेकिन इसे लागू करने में अभी ‘तकनीकी खामियों’ हैं। हालांकि, अधिकारी ने इसके बारे में विस्तार से नहीं बताया। अधिकारी ने कहा कि अधिनियम लागू हो चुका है, लेकिन मौजूदा सदन में आरक्षण लागू नहीं किया जा सकता। अधिकारी ने कहा कि मौजूदा कानून के अनुसार अगली जनगणना के आधार पर परिसीमन प्रक्रिया पूरी करने के बाद महिलाओं के लिए आरक्षण लागू किया जा सकता है।
नारी शक्ति अधिनियम-2023 के मुताबिक ताजा चल रही जनगणना और फिर परिसीमन प्रक्रिया के बाद ही महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण मिल सकता है। सरकार ने आरक्षण को जल्द लागू करने के लिए इसमें संशोधन का रास्ता चुना और परिसीमन सहित तीन विधेयक एक साथ पेश किए गए। सरकार ने तीनों विधेयक रूल-66 के तहत पेश किया है। इसका मतलब ये है कि महिला आरक्षण, केंद्र शासित प्रदेश और परिसीमन से जुड़े तीनों बिल अलग-अलग नहीं, बल्कि एक दूसरे जुड़े हैं।
रूल-66 के तहत इसे पेश करने का सरकार का मकसद तीनों बिलों पर एक साथ चर्चा को आसान बनाना था। लेकिन ये दांव उल्टा पड़ता दिख रहा है। रूल- 66 खास तकनीकी प्रावधान है। जब इस तरह से विधेयक पेश किए जाते हैं तो तो इसका मतलब होता है कि एक विधेयक पूरी तरह से किसी दूसरे विधेयक पर निर्भर है। दूसरे शब्दों में कहें तो अगर एक बिल पास नहीं हुआ, तो दूसरे बिल का भी कोई वजूद नहीं रह जाएगा। यही सरकार के लिए खतरे की बात है। 2023 में बिल पास होने के बाद राष्ट्रपति ने मंजूरी दी थी, लेकिन सरकार ने उसे अभी तक अधिसूचित नहीं किया था। सरकार ने अब इसे नोटिफाई करके बचाने का प्रयास किया है। दरअसल, महिला आरक्षण पर पार्टियां साथ होने की बात करती हैं लेकिन पेंच परिसीमन के मसले पर फंसा हुआ है, जबकि संशोधन के लिए दो तिहाई बहुमत की जरूरत है।
विपक्ष ने सरकार के कदम पर क्या कहा?
कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा, ‘यह अजीब बात है कि सितंबर 2023 में राजपत्रित विधेयक को नियम 66 के निलंबन के बाद पुनः राजपत्रित किया गया है। नियम 66 कहता है कि यदि सदन में किसी अन्य विधेयक के पारित होने पर निर्भर विधेयक पारित नहीं हो पाता है, तो मूल विधेयक या मूल अधिनियम भी निष्प्रभावी हो जाता है। लोकसभा में कार्य संचालन और प्रक्रिया नियमों के नियम 66 के निलंबित करने के बाद इसे राजपत्र में फिर अधिसूचित करके, ऐसा लगता है कि 131वें संशोधन के पारित न होने की स्थिति में 106वें अधिनियम को बचाने का एक प्रयास किया जा रहा है।’
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विपक्षी नेताओं के अनुसार यह कदम संविधान संशोधन विधेयकों के लोक सभा से पारित न होने की संभावना को लेकर सरकार की आशंका के संकेत है। इन विधेयकों पर शुक्रवार को लोक सभा में शाम 4 बजे मतदान होना है। विधेयकों में संशोधन या उन्हें पारित करने संबंधी प्रस्तावों से संबंधित नियम 66 को गुरुवार को लोकसभा में तीनों विधेयकों पर एक साथ विचार करने की सुविधा के लिए लागू किया गया था।
दो तिहाई बहुमत है जरूरी
संविधान संशोधन विधेयकों को दोनों सदनों में विशेष बहुमत से पारित कराना होता है। इसका मतलब है उपस्थित और मतदान करने वाले का दो-तिहाई बहुमत होना चाहिए। यदि सभी सांसद उपस्थित हैं, तो सरकार के सामने पहली बाधा दो-तिहाई समर्थन प्राप्त करना होगा।
अभी लोकसभा में 540 सांसद हैं जबकि तीन सीटें रिक्त हैं। ऐसे में संविधान संशोधन के लिए बहुमत का आंकड़ा 360 है। एनडीए की अपनी संख्या 293 है, जो जरूरी आंकड़े से 67 कम है। कुछ सांसदों के अनुपस्थित रहने से आवश्यक संख्या कम हो सकती है। चूकी अंतर बहुत ज्यादा है तो अनुपस्थित रहने वालों की संख्या बहुत अधिक होनी चाहिए।
लोक सभा में गुरुवार को विधेयकों को पेश किए जाने के समय हुए मतदान से भी पता चला कि एनडीए के पास संविधान संशोधन विधेयकों को पारित करने के लिए पर्याप्त संख्या नहीं है। उपस्थित कुल 436 मतदाताओं में से 185 ने विरोध में और 251 ने समर्थन में वोट दिए थे।
जिन पार्टियों द्वारा विधेयकों का विरोध करने की संभावना है, उनमें कांग्रेस (98 सीटें), सपा (37), टीएमसी (28), डीएमके (22), शिवसेना-यूबीटी (9), एनसीपी-सपा (8), सीपीआईएम (4), आरजेडी (4), आईयूएमएल (3), आप (3), जेएमएम (3), वीसीके (2), सीपीआई (2), सीपीआई (एमएल) लिबरेशन (2), एनसी (2), केरल कांग्रेस (1), बीएपी (1), एएसपी कांशी राम (1), आरएलपी (1), आरएसपी (1), एआईएमआईएम (1), एमडीएमके (1) शामिल हैं। यही कुल संख्या 234 हो जाती है।

