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फीफा वर्ल्ड कप से अब भी क्यों दूर भारत? 1950 में मौका मिला, फिर भी नहीं खेल पाए; समस्या कहां है?

फीफा वर्ल्ड कप के लिए भारत एक बार क्वालीफाई कर चुका है। 1950 में भारत को विश्व कप में जगह मिल गई थी। हालांकि, भारत ने वह विश्व कप नहीं खेला था।

नई दिल्ली: फीफा वर्ल्ड कप जब भी शुरू होता है, भारत में करोड़ों फुटबॉल प्रेमी ब्राजील, अर्जेंटीना, जर्मनी, फ्रांस, पुर्तगाल जैसी टीमों का समर्थन करते नजर आते हैं। विडंबना यह है कि दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश और फुटबॉल के सबसे बड़े दर्शक बाजारों में शामिल भारत आज तक फीफा विश्व कप के मुख्य दौर में एक भी मैच नहीं खेल पाया है।

क्रिकेट के बाद भारत में सबसे ज्यादा देखा जाने वाला खेल फुटबॉल है। पश्चिम बंगाल, गोवा, केरल, मणिपुर, मिजोरम और पूर्वोत्तर के कई राज्यों में तो फुटबॉल की दीवानगी तो दूसरे खेलों से कहीं ज्यादा है। इसके बावजूद भारतीय फुटबॉल विश्व मंच पर अपनी पहचान बनाने में संघर्ष कर रहा है। सवाल है कि आखिर समस्या कहां है? भारत की फुटबॉल टीम फीफा वर्ल्ड कप के लिए क्वालीफाई करने में क्यों चूक जाती है?

1950: जब भारत फीफा वर्ल्ड कप के लिए क्वालीफाई हुआ था

भारत एक बार फीफा विश्व कप के लिए क्वालीफाई कर चुका है। 1950 में ब्राजील में आयोजित विश्व कप के लिए एशियाई क्वालिफिकेशन के दौरान बर्मा (अब म्यांमार), इंडोनेशिया और फिलीपींस ने नाम वापस ले लिया था। इसके बाद भारत को विश्व कप में जगह मिल गई थी।

भारत को उस टूर्नामेंट में स्वीडन, इटली और पराग्वे के साथ ग्रुप में रखा गया था। लेकिन टूर्नामेंट शुरू होने से पहले ही भारतीय टीम ने अपना नाम वापस ले लिया। इसे लेकर यह कहानी खूब प्रचलित रही है कि फीफा ने खिलाड़ियों को नंगे पैर खेलने की अनुमति नहीं दी थी, इसलिए भारत ने हिस्सा नहीं लिया। हालांकि ये सच नहीं है।

असल कारण वित्तीय चुनौतियां, लंबी यात्रा, अपर्याप्त तैयारी और ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन (AIFF) का ओलंपिक को अधिक महत्व देना था। तब फीफा भी यात्रा खर्च में मदद को तैयार था। इसके बावजूद भारत ने हिस्सा नहीं लेने का फैसला किया। वह चौथा ही वर्ल्ड कप था और कई देश दूसरे विश्व युद्ध के असर से खुद को बाहर निकालने में लगे थे। ऐसे में फीफा के लिए भी तब टूर्नामेंट आयोजित कराना कठिन चुनौती थी।

कभी एशिया में बड़ी ताकत था भारत

1950 और 1960 का दशक भारतीय फुटबॉल का स्वर्णिम दौर माना जाता है। उस समय कोच सैयद अब्दुल रहीम के नेतृत्व में भारत ने एशियाई फुटबॉल में अपनी मजबूत पहचान बनाई। 1951 और 1962 एशियाई खेलों में भारत ने स्वर्ण पदक जीता। 1956 मेलबर्न ओलंपिक में भारतीय टीम सेमीफाइनल तक पहुंची और चौथे स्थान पर रही। यह उपलब्धि आज भी भारतीय फुटबॉल के इतिहास की सबसे बड़ी सफलताओं में गिनी जाती है। पी.के. बनर्जी, चुन्नी गोस्वामी और तुलसीदास बलराम जैसे खिलाड़ी उस दौर के सितारे थे। बाद में बाइचुंग भूटिया और फिर सुनील छेत्री जैसे खिलाड़ियों ने भारतीय फुटबॉल को नई पहचान दी।

आखिर भारत फिर पिछड़ क्यों गया?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस देश के पास विशाल आबादी और फुटबॉल के प्रति जुनून भी है, वह विश्व कप से इतना दूर क्यों है? इसके पीछे कई कारण हैं। दरअसल, भारत की फुटबॉल समस्या सिर्फ मैदान पर खराब प्रदर्शन की नहीं है, बल्कि यह प्रशासन, जमीनी ढांचे, प्रतिभाओं के विकास और क्लब-देश के टकराव का मिला-जुला परिणाम है।

सबसे पहले आंकड़ों पर नजर डालें। 1996 में जब फीफा ने पहली बार विश्व रैंकिंग जारी की थी, तब भारत 94वें स्थान पर था। 2026 में भारत की रैंकिंग 139 तक पहुंच चुकी है। वहीं जापान, दक्षिण कोरिया, ईरान और ऑस्ट्रेलिया जैसी एशियाई टीमें लगातार विश्व कप खेल रही हैं और फीफा रैंकिंग में शीर्ष 50 के भीतर रहती हैं। भारत न केवल विश्व कप से दूर है, बल्कि एशिया की दूसरी और तीसरी कतार की टीमों से भी पिछड़ गया है।

इसके पीछे सबसे बड़ी वजह जमीनी ढांचे की कमी मानी जा सकती है। यूरोप और दक्षिण अमेरिका के देशों में लाखों बच्चे संगठित युवा लीगों और अकादमियों से जुड़ते हैं। भारत में फुटबॉल लोकप्रिय जरूर है, लेकिन स्कूल और जिला स्तर पर नियमित प्रतियोगिताओं का मजबूत ढांचा अभी भी सीमित है। नतीजा यह है कि प्रतिभा की पहचान और उसका विकास व्यवस्थित तरीके से नहीं हो पाता।

इसके अलावा भारतीय फुटबॉल का संचालन करने वाली AIFF भी लंबे समय से आलोचनाओं के घेरे में रही है। 2022 में तो स्थिति इतनी गंभीर हो गई थी कि फीफा ने ‘थर्ड पार्टी इंटरफेरेंस’ (बाहरी हस्तक्षेप) का हवाला देते हुए इसे अस्थायी रूप से निलंबित कर दिया था। इसके कारण भारत से अंडर-17 महिला विश्व कप की मेजबानी छिनने का खतरा पैदा हो गया था। बाद में हस्तक्षेप के बाद यह प्रतिबंध हटाया गया।

इसके बाद भी प्रशासनिक अस्थिरता खत्म नहीं हुई। 2025 में फीफा और एएफसी ने AIFF को संविधान सुधारों को लेकर फिर चेतावनी दी थी कि समयसीमा पूरी नहीं होने पर भारत दोबारा निलंबन का सामना कर सकता है।

इसके अलावा भारतीय फुटबॉल में कई बार ‘क्लब बनाम देश’ का टकराव भी देखने को मिला है। हालिया उदाहरण 2026 का है, जब मोहन बागान ने यूनिटी कप से पहले भारतीय टीम के कैंप के लिए अपने सात खिलाड़ियों को निर्धारित फीफा विंडो से पहले रिलीज करने से इनकार कर दिया था। क्लब का तर्क था कि फीफा विंडो शुरू होने से पहले खिलाड़ियों को चोट लगने पर उन्हें कोई सुरक्षा या मुआवजा नहीं मिलता। ये आरोप सीधे-सीधे एआईएफएफ के लिए था।

इससे पहले भी एशियाई खेलों और अन्य टूर्नामेंटों के दौरान खिलाड़ियों की उपलब्धता को लेकर ऐसे विवाद सामने आ चुके हैं। भारतीय फुटबॉल का पेशेवर ढांचा भी कई बार अनिश्चितता का शिकार रहा है। 2025 में इंडियन सुपर लीग (ISL) का भविष्य ही अधर में लटक गया था, जब AIFF और उसके व्यावसायिक साझेदारों के बीच समझौते को लेकर विवाद पैदा हो गया।

कुल मिलाकर भारत में पी.के. बनर्जी, चुन्नी गोस्वामी, बाइचुंग भूटिया और सुनील छेत्री जैसे महान खिलाड़ी हुए हैं। समस्या प्रतिभा की कमी नहीं है। समस्या यह है कि भारत अभी तक ऐसी व्यवस्था नहीं बना पाया है जो हर साल हजारों प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को खोजकर उन्हें विश्वस्तरीय प्रशिक्षण दे सके। यही कारण है कि दुनिया के सबसे बड़े फुटबॉल दर्शक बाजारों में शामिल होने के बावजूद भारत अभी तक विश्व कप के मंच तक नहीं पहुंच पाया। भारतीय फुटबॉल का असली संकट मैदान पर नहीं, बल्कि उसके पीछे खड़ी व्यवस्था में दिखाई देता है।

वर्तमान स्थिति कैसी है…भारतीय फुटबॉल का भविष्य क्या है?

भारतीय फुटबॉल की मौजूदा स्थिति उत्साहजनक नहीं कही जा सकती। जून 2026 की फीफा रैंकिंग में भारत 139वें स्थान तक फिसल गया है। एशिया में जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया, ईरान और सऊदी अरब जैसी टीमें लगातार विश्व कप खेल रही हैं, जबकि भारत अभी भी एशियाई स्तर पर शीर्ष टीमों की श्रेणी में जगह बनाने के लिए संघर्ष कर रहा है।

वैसे, निराशा के बीच उम्मीद की वजहें भी हैं। इंडियन सुपर लीग (ISL) ने फुटबॉल को नया दर्शक वर्ग दिया। पूर्वोत्तर भारत, केरल, गोवा और पश्चिम बंगाल में प्रतिभाओं की नई पीढ़ी उभर रही है। युवा खिलाड़ियों के लिए अकादमियों और प्रशिक्षण सुविधाओं में भी कुछ सुधार हुए हैं।

विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि भारत अगले एक दशक तक जमीनी ढांचे, कोचिंग और युवाओं को खेल से जोड़ने पर लगातार निवेश करे तो विश्व कप क्वालीफिकेशन का सपना असंभव भी नहीं है।

भारतीय फुटबॉल की कहानी विरोधाभासों से भरी है। एक तरफ 1950 में विश्व कप खेलने का मौका गंवाने का अफसोस है, दूसरी तरफ पी.के. बनर्जी, बाइचुंग भूटिया और सुनील छेत्री जैसे सितारों की विरासत भी है। प्रयास गंभीर हुए तो संभव है कि आने वाले वर्षों में भारतीय तिरंगा भी फीफा विश्व कप के मैदान पर लहराता नजर आए। लेकिन ये सच भी स्वीकार करना होगा कि इंतजार अभी लंबा है।

यह भी पढ़ें- FIFA World Cup: बदला-बदला होगा इस बार फुटबॉल, दो हाफ नहीं…4 क्वार्टर! फाइनल में ‘सुपर बॉल’ का तड़का

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विनीत कुमार
पूर्व में IANS, आज तक, न्यूज नेशन और लोकमत मीडिया जैसी मीडिया संस्थानों लिए काम कर चुके हैं। सेंट जेवियर्स कॉलेज, रांची से मास कम्यूनिकेशन एंड वीडियो प्रोडक्शन की डिग्री। मीडिया प्रबंधन का डिप्लोमा कोर्स। जिंदगी का साथ निभाते चले जाने और हर फिक्र को धुएं में उड़ाने वाली फिलॉसफी में गहरा भरोसा...
विनीत कुमार
पूर्व में IANS, आज तक, न्यूज नेशन और लोकमत मीडिया जैसी मीडिया संस्थानों लिए काम कर चुके हैं। सेंट जेवियर्स कॉलेज, रांची से मास कम्यूनिकेशन एंड वीडियो प्रोडक्शन की डिग्री। मीडिया प्रबंधन का डिप्लोमा कोर्स। जिंदगी का साथ निभाते चले जाने और हर फिक्र को धुएं में उड़ाने वाली फिलॉसफी में गहरा भरोसा...
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