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दिल्ली में धूल भरी आंधी-तूफान के बार-बार आने की वजह क्या है? अरावली पर्वतमाला से क्या है कनेक्शन?

दरअसल दिल्ली राजस्थान के थार रेगिस्तान की हवा की दिशा में स्थित है। ऐसे में भीषण गर्मी के दौरान रेगिस्तान की जमीन तपकर बारीक और ढीली रेत में बदल जाती है जिसे तेज पश्चिमी हवाएं उड़ाकर सैकड़ों किलोमीटर दूर उत्तरी मैदानी इलाकों तक ले जाती हैं।

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फोटोः समाचार एजेंसी आईएएनएस

नई दिल्ली: राजधानी दिल्ली में इस साल अप्रैल से लेकर अभी तक कई आंधियां आईं। बीती 23 जून को भी अचानक से आई आंधी में धूल की एक दीवार सी छा गई। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने कुछ घंटे पहले ही इसके बारे में चेतावनी दी थी।

दिल्ली के लिए ये आंधियां लगभग हर साल गर्मियों में एक नियमित प्रक्रिया बन गई हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि इसका कारण क्या है? दरअसल दिल्ली राजस्थान के थार रेगिस्तान की हवा की दिशा में स्थित है। ऐसे में भीषण गर्मी के दौरान रेगिस्तान की जमीन तपकर बारीक और ढीली रेत में बदल जाती है जिसे तेज पश्चिमी हवाएं उड़ाकर सैकड़ों किलोमीटर दूर उत्तरी मैदानी इलाकों तक ले जाती हैं।

अरावली पर्वतमाला प्राकृतिक रुकावट के तौर पर खड़ी रहती है

सदियों से अरावली पर्वतमाला एक प्राकृतिक रुकावट के तौर पर खड़ी रही है जो इन तेज हवाओं की गति को कम करती है और शहर तक पहुंचने से पहले ही ज्यादातर रेत को रोक लेती है। हालांकि अब दशकों से हो रहे खनन, पेड़ों की कटाई और बेरोकटोक निर्माण की वजह से इस प्राकृतिक सुरक्षा दीवार में दरार पड़ रही है। इससे धूल सीधे दिल्ली और आसपास के इलाकों में तेजी से पहुंच रही है।

अरावली रेंज दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत-शृंखलाओं में से एक है। यह पहाड़ियों की 650 किलोमीटर लंबी एक ऐसी शृंखला है जो दिल्ली से शुरू होकर हरियाणा और राजस्थान से होते हुए गुजरात तक फैली हुई है। यह दिल्ली के लिए एक प्राकृतिक दीवार की तरह काम करती रही है जो थार रेगिस्तान से आने वाली गर्म और रेत भरी हवाओं को रोकती रही है।

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बता दें कि मानसून से पहले का यह मौसम असामान्य रूप से सक्रिय रहा है। IMD ने अप्रैल से ही लगातार धूल भरी आंधी और तूफान की चेतावनी जारी की है। अप्रैल से जून महीने में अब तक दिल्ली-एनसीआर में कई बार आंधी-तूफान आया जिसके चलते हवा की गुणवत्ता खराब श्रेणी में चली गई।

दिल्ली-एनसीआर में धूल भरी आंधियों का कहर

3 अप्रैल को दिल्ली-एनसीआर रीजन में सुबह आई आंधी में धूल की एक घनी परत छा गई। धूल भरी आंधी के चलते विजिबिलिटी कम हो गई और हवा की गुणवत्ता खराब श्रेणी में चली गई। IMD ने 40 से 50 किमी/घंटा की तेज हवाओं का अनुमान लगाया था।

अप्रैल के आखिरी दिनों में भी तेज आंधियां आईं। 27 से 29 अप्रैल के बीच मौसम विभाग की चेतावनी के बीच कई बार आंधी तूफान दर्ज किया गया। इसके चलते एयरलाइंस भी प्रभावित हुई।

30 मई को राजस्थान के थार इलाके और दिल्ली-एनसीआर में भीषण तूफान आया। आईएमडी ने दिल्ली-एनसीआर के लिए ऑरेंज अलर्ट जारी किया जबकि राजस्थान के लिए रेड अलर्ट। इस दौरान मौसम विभाग ने 100 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से हवाएं चलीं।

जून के शुरुआती दिनों में रात में तेज हवाओं के साथ गरज और बारिश आई। इसे दिल्ली-एनसीआर में प्री-मानसून की तरह देखा गया।

23 जून को दोपहर ढाई बजे के करीब एक भयंकर तूफान आया। दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान में इसके लिए रेड अलर्ट जारी किया गया। इस दौरान बारिश से पहले 100 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से हवाएं आईं। इसके बाद बारिश से हल्की राहत मिली।

वैसे तो दिल्ली में हर साल प्री मानसून के समय आंधी-तूफान आते हैं लेकिन इनकी तीव्रता साल दर साल बढ़ती जा रही है।

तूफान कैसे बनते हैं?

धूल भरी आंधी असल में बहुत ज्यादा तूफानी हवा होती है। इसकी शुरुआत जमीन के तेजी से गर्म होने से होती है। जब उत्तर-पश्चिम भारत में जमीन का तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर चला जाता है तो उसके ठीक ऊपर की हवा गर्म और बेचैन हो जाती है। इससे ‘लैप्स रेट’ (ऊंचाई पर जाने पर हवा के ठंडे होने की दर) तेज हो जाती है।

जमीन की गर्मी और ऊपर मौजूद ठंडी हवा के बीच जितना ज्यादा फर्क होगा वातावरण उतना ही अस्थिर हो जाएगा। वैज्ञानिक इस जमा हुई ऊर्जा को ‘कन्वेक्टिव अवेलेबल पोटेंशियल एनर्जी’ या CAPE के तौर पर मापते हैं। यह असल में वह ईंधन है जिससे तूफान को ऊर्जा मिलती है।

हवाएं इतनी घातक कैसे होती हैं?

सिर्फ गर्मी काफी नहीं है। इसके लिए एक ट्रिगर या शुरुआती वजह की जरूरत होती है। आमतौर पर मौसम में होने वाला कोई बदलाव जैसे साइक्लोनिक सर्कुलेशन या वेस्टर्न डिस्टर्बेंस जो जमीन के पास की गर्म हवा को ऊपर की ओर धकेलता है।

एक बार जब बहुत ऊंचा ‘क्यूम्यलोनिम्बस’ (बारिश लाने वाला) बादल बन जाता है तो उससे बारिश होने लगती है। दिल्ली की गर्मियों की सूखी हवा में जमीन तक पहुंचने से पहले ही उस बारिश का ज्यादातर हिस्सा भाप बनकर उड़ जाता है।

वाष्पीकरण से आस-पास की हवा ठंडी और भारी हो जाती है और यह घनी हवा तेजी से नीचे की ओर (डाउनड्राफ़्ट के रूप में) गिरती है। जब यह जमीन से टकराती है तो हर तरफ फैल जाती है। इससे ऊपरी मिट्टी उड़कर धूल की दीवार की तरह पूरे शहर में फैल जाती है। 23 जून को दिल्ली-NCR के कुछ इलाकों में हवा की रफ्तार 50 से 60 किलोमीटर प्रति घंटा तक पहुंच गई थी।

जलवायु परिवर्तन है इसकी वजह?

धूल भरी आंधियां वैसे तो प्राकृतिक होती हैं लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि धरती के गर्म होने से इनकी तीव्रता बढ़ रही है। गर्मियों में ज्यादा गर्मी के कारण वातावरण में ज्यादा ऊर्जा जमा होती है, जिससे वही अस्थिरता पैदा होती है जो इन तूफानों को बढ़ावा देती है।

हालांकि इस बात पर कोई पुख्ता सहमति नहीं है कि ये तूफान अधिक बार आते हैं लेकिन इनके प्रकोप के पीछे की वजहें जैसे कि भीषण गर्मी और अस्थिर परिस्थितियां, स्पष्ट रूप से बढ़ती जा रही हैं।

इसके बाद धूल शहर के प्रदूषण में मिल जाती है जिससे वायु गुणवत्ता खतरनाक स्तर तक गिर जाती है।

निर्माण कार्य इसे कैसे और खराब बनाते हैं?

भले ही थार रेगिस्तान से धूल भरी आंधियां उठती हों लेकिन दिल्ली की हवा को गंदा करने के लिए और भी फैक्टर जिम्मेदार हैं। शहर में धूल फैलने के सबसे बड़े स्थानीय कारणों में से एक है निर्माण और तोड़-फोड़ का काम। दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (DPCC) जैसी एजेंसियां ​​इसे ‘पार्टिकुलेट मैटर’ (हवा में तैरने वाले बारीक ठोस कण जो फेफड़ों को नुकसान पहुंचाते हैं) के मुख्य स्रोतों में से एक मानती हैं।

खुदाई, तोड़-फोड़ और मिट्टी हटाने के कामों से बारीक धूल के गुबार उठते हैं। रेत और सीमेंट के खुले ढेर, बिना ढके मलबा ले जाने वाले ट्रक और कच्ची सड़कों पर चलने वाले वाहन मटीरियल को पीसकर बारीक धूल में बदल देते हैं जो आस-पास की सड़कों पर जमा हो जाती है।

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अमरेन्द्र यादव
लखनऊ विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातक करने के बाद जामिया मिल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई। जागरण न्यू मीडिया में बतौर कंटेंट राइटर काम करने के बाद 'बोले भारत' में कॉपी राइटर के रूप में कार्यरत...सीखना निरंतर जारी है...

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