दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार और मध्य भारत के कई हिस्सों में इन दिनों तापमान 44 से 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच रहा है। लेकिन लोगों को गर्मी सिर्फ 44 डिग्री जैसी महसूस नहीं हो रही। कई शहरों में शरीर को यह तापमान 50 डिग्री या उससे भी ज्यादा जैसा लग रहा है। यही वह स्थिति है जिसे वैज्ञानिक भाषा में ‘हीट इंडेक्स’ कहा जाता है।
इसे ताजा आंकड़ों से समझें तो मंगलवार को यूपी के कई शहरों में तापमान के मुकाबले फील्स लाइक यानी हीट इंडेक्स ज्यादा रहा। वाराणसी में मंगलवार को तापमान 41 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, लेकिन लोगों को यह करीब 47 डिग्री जैसा महसूस हुआ। वहीं प्रयागराज में 47 डिग्री तापमान के बीच ‘फील्स लाइक’ तापमान 49 डिग्री तक पहुंच गया।
गाजीपुर में 44 डिग्री तापमान के बावजूद गर्मी 47.1 डिग्री जैसी महसूस हुई। दूसरी ओर, मुंबई में वास्तविक तापमान केवल 33.4 डिग्री था, लेकिन अधिक नमी के कारण लोगों को यह 41.8 डिग्री जैसा महसूस हुआ। यह दिखाता है कि केवल तापमान ही नहीं, बल्कि हवा में मौजूद नमी भी शरीर पर गर्मी का असर कई गुना बढ़ा देती है।
लेकिन सवाल यह है कि थर्मामीटर पर दिखने वाला तापमान और शरीर को महसूस होने वाली गर्मी में इतना अंतर क्यों होता है? इसका जवाब हवा में मौजूद नमी यानी ह्यूमिडिटी में छिपा है।

क्या होता है हीट इंडेक्स?
हीट इंडेक्स को ‘फील्स लाइक टेम्परेचर’ यानी शरीर को महसूस होने वाला तापमान भी कहा जाता है। यह केवल हवा के तापमान से तय नहीं होता, बल्कि तापमान और हवा में मौजूद नमी, दोनों मिलकर तय करते हैं कि इंसान को गर्मी कितनी ज्यादा महसूस होगी।
मानव शरीर खुद को ठंडा रखने के लिए पसीना निकालता है। जब पसीना त्वचा से वाष्प बनकर उड़ता है, तब शरीर का तापमान कम होता है। लेकिन अगर हवा में नमी ज्यादा हो, तो पसीना आसानी से नहीं सूखता। इससे शरीर की प्राकृतिक कूलिंग प्रक्रिया धीमी पड़ जाती है और व्यक्ति को ज्यादा गर्मी महसूस होने लगती है।
हीट इंडेक्स का संबंध इसी वैज्ञानिक प्रक्रिया से है- Heat Index=f(T,RH)। यहां T तापमान (Temperature) और RH सापेक्ष आर्द्रता (Relative Humidity) को दर्शाता है। यानी तापमान और नमी दोनों जितने अधिक होंगे, शरीर पर गर्मी का असर उतना ज्यादा पड़ेगा।
आप इसे आसानी से इस तरह से समझ सकते हैं कि अगर तापमान 35 डिग्री है और आर्द्रता यानी ह्यूमिडिटी 85 प्रतिशत हो तो ऐसी स्थिति में हीट इंडेक्स 60 डिग्री तक पहुंच सकता है। चेन्नई जैसे तटीय शहरों में यह स्थिति आम मानी जाती है।
हर व्यक्ति को एक जैसी गर्मी क्यों नहीं लगती?
चेन्नई स्थित श्री रामचंद्र इंस्टीट्यूट ऑफ हायर एजुकेशन एंड रिसर्च की प्रोफेसर विद्या वेणुगोपाल के मुताबिक, हर व्यक्ति गर्मी को अलग तरह से महसूस करता है।
वह उदाहरण देती हैं कि अगर किसी कमरे का एसी 19 डिग्री पर चल रहा हो, तो कुर्सी पर बैठा व्यक्ति ठंड महसूस करेगा, जबकि उसी कमरे में ट्रेडमिल पर दौड़ रहा व्यक्ति गर्मी महसूस कर सकता है। यानी शरीर की गतिविधि, वातावरण और नमी, सभी मिलकर गर्मी के असर को बदल देते हैं।
पिछले साल 2025 में ‘द हिंदू’ की डेटा टीम ने चेन्नई के अलग-अलग इलाकों में रहने वाले चार लोगों को तापमान और नमी मापने वाले उपकरण दिए थे। इन उपकरणों ने पूरे दिन का डेटा रिकॉर्ड किया। इस अध्ययन में सामने आया कि अलग-अलग सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों में रहने वाले लोग गर्मी को बिल्कुल अलग तरीके से झेलते हैं।
कोरुक्कुपेट इलाके में स्टील के बर्तन पॉलिश करने वाले प्रकाश नाम के मजदूर का उदाहरण सबसे चौंकाने वाला था। वह एक छोटे, कम रोशनी वाले कमरे में काम करता था, जहां केवल दो एग्जॉस्ट फैन लगे थे। दोपहर करीब 3 बजे कमरे का वास्तविक तापमान 40 डिग्री से कम था, लेकिन तापमान और नमी को मिलाकर निकाला गया हीट इंडेक्स 66 डिग्री तक पहुंच गया। यानी शरीर पर पड़ने वाला असर वास्तविक तापमान से कहीं ज्यादा खतरनाक था।
हीट इंडेक्स क्यों है खतरनाक?
विशेषज्ञों के अनुसार, हीट इंडेक्स केवल गर्मी का एहसास नहीं है, बल्कि यह बताता है कि शरीर पर गर्मी का तनाव कितना बढ़ चुका है।
जब हीट इंडेक्स 40 डिग्री से ऊपर पहुंचता है, तो डिहाइड्रेशन, हीट एक्सॉशन और मांसपेशियों में ऐंठन का खतरा बढ़ जाता है। वहीं 50 डिग्री या उससे अधिक हीट इंडेक्स हीट स्ट्रोक जैसी जानलेवा स्थिति पैदा कर सकता है। सबसे ज्यादा खतरा बच्चों, बुजुर्गों, बाहर काम करने वाले मजदूरों और पहले से बीमार लोगों को होता है।
गौरतलब है कि दिल्ली, यूपी समेत उत्तर भारत के कई हिस्सों में इस समय हीटवेव की चेतावनी जारी है। मौसम विभाग ने उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना के लिए भी अलर्ट जारी किया है। कई इलाकों में ‘वॉर्म नाइट’ की स्थिति भी बन रही है, जहां रात में भी तापमान सामान्य से काफी ऊपर बना रहता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक, हीटवेव के दौरान लोगों को चक्कर आना, उल्टी जैसा महसूस होना, शरीर में ऐंठन, बेहोशी, दिल की धड़कन तेज होना और त्वचा में जलन जैसी समस्याएं हो सकती हैं। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) हीटवेव को “सामान्य तापमान से काफी अधिक तापमान वाले लंबे दौर” के रूप में परिभाषित करता है।
2026 की गर्मी इतनी खतरनाक क्यों मानी जा रही?
वैज्ञानिकों के मुताबिक, इस साल असामान्य गर्मी के पीछे कई कारण एक साथ काम कर रहे हैं। सबसे बड़ा कारण जलवायु परिवर्तन यानी क्लाइमेट चेंज है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण दुनिया का औसत तापमान लगातार बढ़ रहा है, जिससे हीटवेव ज्यादा लंबी, ज्यादा तीव्र और ज्यादा बार आने लगी हैं।
इसके अलावा, मौसम वैज्ञानिक 2026 में संभावित अल नीनो की स्थिति पर भी नजर रखे हुए हैं। प्रशांत महासागर के गर्म होने से जुड़ी यह जलवायु घटना भारत में अधिक गर्मी, कम बारिश और कमजोर मानसून से जुड़ी मानी जाती है।
उत्तर और मध्य भारत के कई हिस्सों में प्री-मानसून बारिश कम हुई है, जिससे जमीन तेजी से गर्म हो रही है। वहीं शहरों में कंक्रीट, वाहन प्रदूषण और हरियाली की कमी के कारण ‘अर्बन हीट आइलैंड’ प्रभाव बढ़ रहा है। इससे रात में भी गर्मी कम नहीं हो रही।
ऐसे में विशेषज्ञ और मौसम विभाग यही सलाह देते हैं कि दोपहर 12 बजे से 4 बजे के बीच धूप में निकलने से बचना चाहिए। पर्याप्त पानी पीना, हल्के और ढीले कपड़े पहनना, लगातार छांव में आराम करना और शरीर को हाइड्रेट रखना बेहद जरूरी है। क्योंकि कई बार खतरा सिर्फ तापमान में नहीं, बल्कि उस गर्मी में छिपा होता है जिसे शरीर महसूस कर रहा होता है।
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