Home विश्व बलूचिस्तान में क्यों है खून-खराबा? आजादी की मांग, प्राकृतिक संसाधान, गुमशुदगी और...

बलूचिस्तान में क्यों है खून-खराबा? आजादी की मांग, प्राकृतिक संसाधान, गुमशुदगी और पकिस्तानी सेना की कार्रवाई…समझिए पूरा विवाद

1947 में जब ब्रिटिश शासन भारत छोड़कर गया, तब रियासतों को भारत या पाकिस्तान में शामिल होने का विकल्प दिया गया था। मौजूदा बलूचिस्तान भी उस समय कई जनजातीय रियासतों का समूह था। विवाद की कहानी भी वहीं से शुरू होती है।

0
Balochistan
प्रतीकात्मक तस्वीर- AI

पिछले हफ्ते पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत के मस्तुंग जिले में पाकिस्तानी सेना के एक काफिले पर बड़ा हमला हुआ और 45 सैनिकों के मारे जाने का दावा बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) ने किया। इसके अलावा हाल ही में पाकिस्तान के बलूचिस्तान में मारे गए 27 पुलिसकर्मियों के परिजनों ने 10 दिनों तक विरोध प्रदर्शन किया और शवों का अंतिम संस्कार करने से इनकार कर दिया। पिछले सप्ताह उनका धरना तब समाप्त हुआ, जब अधिकारियों ने दो हालिया हमलों की जांच के लिए न्यायिक आयोग गठित करने पर सहमति जताई।

इनमें 6 जुलाई को जियारत में हुआ हमला और उससे एक दिन पहले हन्ना उराक में हुआ हमला शामिल है। इन सभी हमलों के लिए कथित तौर पर बलूच उग्रवादियों को जिम्मेदार ठहराया गया। पाकिस्तान ने ‘ऑपरेशन शाबान’ भी शुरू किया। पाकिस्तानी अधिकारियों का दावा है कि 5 जुलाई से अब तक इस अभियान में 129 ‘आतंकवादी’ मारे जा चुके हैं।

बलूचिस्तान में लंबे समय से जारी हिंसा, उग्रवाद और सरकारी दमन की कहानी कई बार चर्चा में आती रही है। पाकिस्तान लगातार भारत पर बलूचिस्तान में अशांति फैलाने का आरोप लगाता रहा है। ईरान और अफगानिस्तान की सीमा से लगे इस प्रांत का पाकिस्तान के लिए सामरिक महत्व तो है ही, यह प्राकृतिक संसाधनों के लिहाज से देश का सबसे समृद्ध प्रांत भी माना जाता है। ऐसे में सवाल है कि यहां आखिर संघर्ष क्यों चल रहा है? बलूचों को पाकिस्तान से क्या शिकायत और विवाद की जड़ें कितनी गहरी हैं?

भारत-पाकिस्तान बंटवारे के समय से विवाद

1947 में जब ब्रिटिश शासन भारत छोड़कर गया, तब रियासतों को भारत या पाकिस्तान में शामिल होने का विकल्प दिया गया था। मौजूदा बलूचिस्तान भी उस समय कई जनजातीय रियासतों का समूह था।

1947 में यहां सबसे प्रमुख रियासत कलात थी। इसके अलावा मकरान, लास बेला और खारन भी अहम रियासतें थी। कलात के खान मीर अहमद यार खानस्वतंत्र रहना चाहते थे। लेकिन समय के साथ उन पर पाकिस्तान में शामिल होने का दबाव बढ़ने लगा, क्योंकि आसपास की अन्य रियासतें पाकिस्तान में शामिल हो चुकी थीं।

अलग-थलग पड़ने और पाकिस्तानी सेना के दबाव के बीच उन्होंने आखिरकार 27 मार्च 1948 को पाकिस्तान में विलय स्वीकार कर लिया। कलात के इस विलय को लेकर मतभेद ही बलूच राष्ट्रवादियों की प्रमुख शिकायतों में शामिल है, जबकि पाकिस्तान इस विलय को पूरी तरह कानूनी और अंतिम मानता है।

पाकिस्तान के इतिहास में लगभग हर दशक में बलूचिस्तान में विद्रोह हुआ है। मौजूदा विद्रोह, जिसे पांचवां बड़ा विद्रोह माना जाता है, परवेज मुशर्रफ के शासनकाल में शुरू हुआ। इसके पीछे 2005 में एक बलूच महिला डॉक्टर के साथ सेना के एक अधिकारी द्वारा कथित दुष्कर्म और 2006 में स्थानीय नेता अकबर बुगटी की हत्या को अहम वजह माना जाता है।

जातीय पहचान का संघर्ष और प्राकृतिक संसाधन

बलूच एक अलग जातीय समुदाय हैं। पाकिस्तान के सिंध, बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा और पंजाब जैसे सभी प्रांतों की अपनी अलग पहचान है। इनमें से कई प्रांत समय-समय पर पंजाब के वर्चस्व की शिकायत करते रहे हैं।

बलूचिस्तान तांबा, सोना, प्राकृतिक गैस और अन्य खनिज संसाधनों से समृद्ध है। लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्हें अपने ही प्रदेश की प्राकृतिक संपदा का लाभ नहीं मिल पाया।

पाकिस्तान की कई प्रमुख विदेशी निवेश परियोजनाएं भी बलूचिस्तान में हुई हैं। चीन ने इन्हीं इलाकों में ग्वादर बंदरगाह और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) में भारी निवेश किया है। सैंडक तांबा और सोना खदान का संचालन भी चीन करता है। वहीं पिछले दिसंबर में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने भी रेको डिक तांबा और सोना परियोजना में 1.3 अरब डॉलर के निवेश की घोषणा की थी। सैंडक, रेको डिक बलूचिस्तान प्रांत के इलाके हैं।

बलूच समुदाय लंबे समय से इस बात का विरोध करता रहा है कि उनके क्षेत्र के संसाधनों का फायदा विदेशी कंपनियों को मिल रहा है। उनका यह भी कहना है कि इंजीनियर और प्रबंधक जैसी अच्छी नौकरियां अक्सर पंजाब और सिंध के लोगों को मिलती हैं। इसी वजह से चीन समर्थित परियोजनाएं और वहां काम करने वाले चीनी नागरिक भी बलूच उग्रवादियों के निशाने पर रहे हैं।

हालांकि पाकिस्तान सरकार इन दावों को खारिज करती है। उसका कहना है कि लाखों बलूच पाकिस्तान की राजनीति, अर्थव्यवस्था और सेना का हिस्सा हैं। उनके मुताबिक विद्रोह करने वाले केवल कुछ लोग हैं और ये एक छोटा उग्रवादी समूह है, पूरी बलूच आबादी की इच्छा नहीं। पाकिस्तान लगातार यह आरोप लगाता रहा है कि इन उग्रवादी संगठनों को भारत का समर्थन मिलता है, जबकि भारत इन आरोपों को खारिज करता है।

बलूच लोगों की क्या हैं मांगें?

बलूचों के विद्रोह किसी एक विचारधारा या मांग पर एकमत नहीं है। एक वर्ग पूरी तरह स्वतंत्र बलूचिस्तान चाहता है और अपने उद्देश्य के लिए हिंसा का सहारा लेता है। वहीं कई अन्य समूह पाकिस्तान के संवैधानिक ढांचे के भीतर रहकर अधिक स्वायत्तता और अपने क्षेत्र से जुड़े फैसलों में ज्यादा अधिकार की मांग करते हैं।

समय के साथ असंतोष का स्वरूप भी बदला है। जहां एक ओर मध्यम वर्ग के लोग आंदोलन, याचिकाओं और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के जरिए अपनी बात रखते हैं। वहीं बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) जैसे हिंसक संगठनों की ताकत बढ़ी है। ये संगठन मुख्य रूप से सरकारी संस्थानों और सेना से जुड़े ठिकानों को निशाना बनाते हैं।

इसके अलावा पाकिस्तान में सक्रिय उग्रवादी संगठनों के पास आधुनिक हथियार और प्रशिक्षित लड़ाके भी हैं। इसकी एक वजह अफगानिस्तान में नाटो का आतंकवाद विरोधी अभियान भी माना जाता है। 2021 में अमेरिका के अफगानिस्तान से हटने के बाद बड़ी मात्रा में आधुनिक हथियार और युद्ध का अनुभव रखने वाले लड़ाके क्षेत्र में रह गए।

पिछले कुछ वर्षों में, जब से अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता लौटी है, पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसियों ने दावा किया है कि बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) और तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के बीच सहयोग के संकेत मिले हैं।

बलूचिस्तान के ‘गायब’ लोगों का दर्द

बलूचिस्तान का सबसे संवेदनशील मुद्दा कथित तौर पर समय-समय पर अचानक हो रहे ‘लापता लोगों’ का है। स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि पिछले कुछ सालों में करीब 5,000 लोगों को पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसियां उठाकर ले गईं और उनमें से कई कभी वापस नहीं लौटे या महीनों और सालों बाद मृत पाए गए।

पिछले महीने इस मुद्दे पर काम करने वाली प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता महरंग बलोच को उम्रकैद की सजा सुनाई गई। दूसरी ओर पाकिस्तान सरकार का दावा है कि ये कथित लापता लोग या तो उग्रवादी संगठनों में शामिल हो गए हैं या फिर अपनी इच्छा से घर छोड़कर चले गए हैं।

पाकिस्तान की अपनी दलीलें जरूर हैं लेकिन इन कहानियों के बीच एक तय सच ये है कि बलूचिस्तान में पाकिस्तान सरकार की प्रतिक्रिया लंबे समय से सख्त सैन्य कार्रवाई पर आधारित रही है। ‘ऑपरेशन शाबान’ भी इसी सिलसिले की ताजा कड़ी माना जा रहा है। पाकिस्तान के भीतर भी कई लोगों का मानना है कि जिस विद्रोह को स्थानीय समर्थन हासिल हो, उसे केवल सैन्य बल के जरिए समाप्त नहीं किया जा सकता।

author avatar
विनीत कुमार
पूर्व में IANS, आज तक, न्यूज नेशन और लोकमत मीडिया जैसी मीडिया संस्थानों लिए काम कर चुके हैं। सेंट जेवियर्स कॉलेज, रांची से मास कम्यूनिकेशन एंड वीडियो प्रोडक्शन की डिग्री। मीडिया प्रबंधन का डिप्लोमा कोर्स। जिंदगी का साथ निभाते चले जाने और हर फिक्र को धुएं में उड़ाने वाली फिलॉसफी में गहरा भरोसा...

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Exit mobile version