हिंदी सिनेमा के गीतों की दुनिया में आनंद बख्शी का नाम उन गीतकारों में शुमार है, जिन्होंने करीब चार दशक तक अपनी कलम से फिल्मों को यादगार बनाया। उनके गीतों में प्रेम, विरह, जिंदगी और रिश्तों के साथ-साथ आम आदमी की भाषा और बदलते समय की धड़कन भी सुनाई देती थी। उन्होंने एक ओर ‘कुछ तो लोग कहेंगे’, ‘सावन का महीना पवन करे शोर’ और ‘तुझे देखा तो ये जाना सनम’ जैसे सदाबहार गीत लिखे, तो ‘चोली के पीछे क्या हैं’ जैसे गीत भी रचे। उनके कुछ गीतों को आलोचकों ने ‘चालू’ कहकर खारिज करने की कोशिश भी की।
सेना से सिनेमा तक का सफर
आज आनंद बख्शी की जयंती है। 21 जुलाई 1930 को रावलपिंडी में जन्मे बख्शी ने जिंदगी में कई उतार-चढ़ाव देखे। जिस शख्स ने हिंदी सिनेमा को हजारों गीत दिए, उसे फिल्मी दुनिया में अपनी जगह बनाने के लिए लंबे समय तक संघर्ष करना पड़ा था। सेना की नौकरी से लेकर मुंबई की सड़कों और स्टेशन के वेटिंग रूम तक का सफर तय करने वाले आनंद बख्शी ने आखिरकार अपनी कलम के दम पर वह मुकाम हासिल किया, जहां पहुंचना हर गीतकार का सपना होता है।
बचपन से ही उनके मन में फिल्मों और संगीत की दुनिया में जाने की इच्छा थी। कहा जाता है कि राज कपूर और नरगिस की फिल्म ‘बरसात’ ने उनके भीतर सिनेमा के प्रति जुनून पैदा किया। वह इस फिल्म को कई बार देखने के बाद गीत लिखने लगे थे। हालांकि उन्होंने अपने इस सपने को लंबे समय तक लोगों से छिपाकर रखा। उन्हें डर था कि लोग उनका मजाक उड़ाएंगे।
विभाजन के बाद उनका परिवार भारत आ गया। आगे चलकर आनंद बख्शी भारतीय सेना में शामिल हुए और जबलपुर के सिग्नल कोर में भी तैनात रहे। सेना में नौकरी के दौरान भी उनके भीतर का कवि जिंदा रहा। वह अपने फौजी साथियों को कविताएं सुनाते और नाटकों में हिस्सा लेते थे। धीरे-धीरे उन्हें लगने लगा कि उनका असली रास्ता फिल्मी दुनिया है।
मुंबई ने दी ठोकरें, लेकिन हौसला नहीं टूटा
अपने इसी सपने को पूरा करने के लिए वह पहली बार मुंबई पहुंचे, लेकिन सफलता ने उनका साथ नहीं दिया। उन्होंने कई प्रोडक्शन हाउस के चक्कर लगाए। काम की तलाश में भटकते रहे। पैसे खत्म हुए तो मुश्किलें और बढ़ गईं। यहां तक कि उन्हें मुंबई से वापस लौटकर सेना की नौकरी फिर से करनी पड़ी। लेकिन इस असफलता ने उनके भीतर के गीतकार को खत्म नहीं किया।
1956 में उन्होंने एक बार फिर मुंबई का रुख किया। इस बार वह ठान चुके थे कि कुछ भी हो, फिल्मी दुनिया में अपनी जगह बनाकर ही लौटेंगे। संघर्ष के दिनों में उन्होंने स्टेशन के वेटिंग रूम में रातें बिताईं और जरूरत पड़ने पर मैकेनिक का काम भी किया। इसी दौरान उनकी मुलाकात अभिनेता भगवान दादा से हुई। उन्होंने आनंद बख्शी को अपनी फिल्म ‘भला आदमी’ में गीत लिखने का मौका दिया। बख्शी ने फिल्म के लिए चार गीत लिखे और उन्हें कुल 150 रुपये मेहनताना मिला। यही छोटा सा अवसर उनके फिल्मी सफर की शुरुआत बना।
हालांकि इसके बाद भी सफलता तुरंत नहीं मिली। उन्हें कई साल तक इंतजार करना पड़ा। आखिरकार 1965 में आई फिल्म ‘जब जब फूल खिले’ ने उनकी किस्मत बदल दी। ‘परदेसियों से ना अखियां मिलाना’, ‘ये समां समां है ये प्यार का’ जैसे गीत घर-घर में गूंजने लगे। इसी दौर में ‘हिमालय की गोद में’ के ‘चांद सी महबूबा हो मेरी’ जैसे गीत ने भी उनकी पहचान मजबूत कर दी।
फिर आया ‘मिलन’ का दौर, जिसने आनंद बख्शी को बुलंदियों तक पहुंचा दिया। ‘सावन का महीना पवन करे शोर’, ‘राम करे ऐसा हो जाए’ और ‘युग युग तक हम गीत मिलन के गाते रहेंगे’ जैसे गीतों ने उन्हें लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचा दिया।
बाद के दौर में आनंद बख्शी और संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की जोड़ी ने हिंदी सिनेमा को एक से बढ़कर एक गीत दिए। ‘फर्ज’, ‘दो रास्ते’, ‘बॉबी’, ‘अमर अकबर एंथनी’, ‘इक दूजे के लिए’ जैसी फिल्मों के गीत आज भी याद किए जाते हैं। वहीं आर.डी. बर्मन के साथ उनकी जोड़ी ने ‘कटी पतंग’, ‘अमर प्रेम’, ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ और ‘लव स्टोरी’ जैसी फिल्मों के जरिए संगीत प्रेमियों के दिलों पर राज किया।
‘अमर प्रेम’ के ‘कुछ तो लोग कहेंगे’, ‘ये क्या हुआ’, ‘रैना बीती जाए’ और ‘बड़ा नटखट है किशन कन्हैया’ जैसे गीतों में उन्होंने जिंदगी और रिश्तों की गहरी समझ को बेहद सरल शब्दों में पिरोया। यही उनकी सबसे बड़ी खूबी थी। वह कठिन शब्दों के बजाय आम बोलचाल की भाषा में ऐसी बात कह देते थे, जो सीधे दिल में उतर जाती थी।
जब उनके गीतों पर लगा ‘चालू’ का लेबल
आनंद बख्शी की खासियत यह भी थी कि वह समय के साथ खुद को बदलते रहे, लेकिन अपने गीतों को लेकर उनकी दृष्टि हमेशा स्पष्ट रही। अपने गीतों की आलोचना को लेकर वह बेहद सहज थे। जब उनके गीतों की शब्दावली को ‘चालू’ कहा गया तो उन्होंने इसे लेकर सफाई देने के बजाय इसके पीछे की वजह समझाई। उनका कहना था कि जिन चरित्रों पर ये गीत फिल्माए जाते हैं, वे समाज के आम और साधारण तबके से आते हैं। ऐसे चरित्रों के लिए इस्तेमाल होने वाली भाषा भी आम बोलचाल की ही होगी। इसलिए फिल्मी गीतकार को परिस्थिति यानी ‘सिचुएशन’ के मुताबिक लिखना पड़ता है।
आनंद बख्शी अपने गीतों को लेकर बहुत बड़े दावे भी नहीं करते थे। वह खुद को कवि कहने से भी बचते थे। उनका मानना था कि कविता भावनाओं से उपजती है, जबकि फिल्मी गीतकार को तय परिस्थिति और कहानी के हिसाब से गीत लिखना होता है। अगर वह कविता की तरह भाव आने का इंतजार करता रहे तो शायद एक भी फिल्मी गीत पूरा न कर पाए।
अपने ही गीतों का मूल्यांकन करते हुए आनंद बख्शी ने एक बार कहा था, “यह सब बरसाती मकान हैं, बरसात के आते ही ढह जाएंगे। इनमें पक्के मकान बहुत कम हैं।” उनके मुताबिक, जो गीत शास्त्रीय संगीत या लोकधुनों पर आधारित हैं, उनके लंबे समय तक टिके रहने की संभावना अधिक है। वह ‘अमर प्रेम’ के ‘चिंगारी कोई भड़के’ और ‘मिलन’ के ‘सावन का महीना पवन करे शोर’ जैसे गीतों को अपने उन ‘पक्के मकानों’ में गिनते थे, जिन्हें वह समय की कसौटी पर टिकने वाला मानते थे।
उन्हें संगीत की नई पीढ़ी से एक शिकायत भी थी। उनका मानना था कि एसडी बर्मन, मदन मोहन और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जैसे संगीतकारों के बाद भारतीय और लोक संगीत की जड़ों से जुड़ाव कम हुआ और पश्चिमी संगीत का प्रभाव बढ़ता गया। उनके मुताबिक पश्चिमी संगीत में लोकप्रियता हासिल करने की क्षमता भले अधिक हो, लेकिन उसमें स्थायित्व का अभाव हो सकता है।
इसके बावजूद आनंद बख्शी खुद समय के साथ बदलते रहे। 70 और 80 के दशक की रोमांटिक फिल्मों से लेकर 90 के दशक के बदलते युवा स्वाद तक, उन्होंने अपनी कलम को नए दौर के मुताबिक ढाला। ‘चोली के पीछे क्या है’ जैसे गीतों पर विवाद हुआ तो दूसरी ओर ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’, ‘दिल तो पागल है’, ‘ताल’ और ‘मोहब्बतें’ जैसी फिल्मों के गीतों ने नई पीढ़ी के बीच भी उनकी लोकप्रियता कायम रखी।
‘चोली के पीछे क्या है’ को लेकर हुए विवाद ने उन्हें काफी दुखी किया था। गीत को अश्लील बताए जाने पर उन्होंने इसके लोकगीत की शैली पर आधारित होने की बात कही थी और इसे गलत संदर्भ में देखे जाने पर आपत्ति जताई थी। हालांकि विवाद के बावजूद यह गीत आगे चलकर लोकप्रिय संस्कृति का हिस्सा बन गया।
आनंद बख्शी ने करीब 550 से अधिक फिल्मों के लिए गीत लिखे और उनके नाम हजारों गीतों से जुड़े हैं। उनके गीतों की संख्या को लेकर अलग-अलग आंकड़े मिलते हैं, लेकिन यह निर्विवाद है कि उन्होंने हिंदी फिल्म संगीत को सबसे समृद्ध गीतकार विरासतों में से एक दिया। उन्हें फिल्मफेयर पुरस्कारों के लिए करीब 40 बार नामांकन भी मिला।
आनंद बख्शी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वह मूल रूप से फिल्मी गीतकार ही बने रहे। उन्होंने खुद को किसी दूसरी साहित्यिक पहचान में ढालने की कोशिश नहीं की। वह फिल्म की कहानी, किरदार और परिस्थिति को समझकर उसी के अनुरूप गीत लिखते रहे। शायद यही वजह है कि उनके गीतों में आम आदमी को अपनी भाषा और अपनी जिंदगी की झलक मिलती है।
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