भीषण गर्मी से राहत मिलने की उम्मीदों के बीच भारत के लिए एक बेहद चिंताजनक खबर है। देश में दस्तक देने के तुरंत बाद दक्षिण-पश्चिम मानसून अचानक आसमान और सैटेलाइट तस्वीरों से ‘गायब’ हो गया है। जून के शुरुआती दिनों में दक्षिणी और मध्य भारत के राज्यों में तेजी से कदम बढ़ाने के बाद मानसूनी बारिश पूरी तरह से ठप (कोलाप्स) हो गई है। मौसम विभाग के हालिया आंकड़े और तस्वीरें इशारा कर रही हैं कि देश इस समय एक बड़े मौसमी संकट से गुजर रहा है।
भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) के 4 जून से 15 जून 2026 के ‘रेनफॉल डिपार्चर मैप’ (वर्षा प्रस्थान मानचित्र) के अनुसार, इस अवधि में देश में केवल 19.2 मिमी वर्षा दर्ज की गई, जबकि सामान्य रूप से 53.7 मिमी बारिश होनी चाहिए थी। यानी देश में 12 दिनों के भीतर 64 प्रतिशत कम बारिश हुई। यानी मानसून की शुरुआत उम्मीद से काफी कमजोर रही है और इसने मौसम वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा दी है।

क्या कहता है IMD का डेटा, सैटेलाइट तस्वीरों में क्यों गायब दिख रहा है मानसून?
आईएमडी के ‘रेनफॉल डिपार्चर मैप’ में देश के मध्य, दक्षिणी और पूर्वी हिस्सों के विशाल क्षेत्र पीले और लाल रंगों में रंगे हुए हैं, जो मौसम विभाग की भाषा में ‘बेहद कम’ या ‘सूखे जैसी स्थिति’ का संकेत हैं।
महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा और मध्य भारत के कई जिलों में सामान्य से काफी कम बारिश दर्ज की गई है। कुछ क्षेत्रों में तो वर्षा घाटा 60 प्रतिशत से भी अधिक है।
दूसरी ओर उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में सामान्य से अधिक वर्षा भी दर्ज की गई है। इससे स्पष्ट है कि समस्या पूरे देश में समान नहीं है, बल्कि बारिश का वितरण अत्यंत असमान हो गया है।
15 जून को INSAT-3DS उपग्रह द्वारा ली गई थर्मल इन्फ्रारेड तस्वीरें स्थिति को और स्पष्ट करती हैं। आमतौर पर सक्रिय मानसून के दौरान केरल से लेकर मध्य भारत और फिर उत्तर भारत तक घने बादलों की एक व्यापक पट्टी दिखाई देती है। लेकिन 15 जून की तस्वीर में प्रायद्वीपीय भारत और मध्य भारत के बड़े हिस्से से बादल लगभग नदारद हैं। यानी आसमान बिल्कुल साफ दिखाई दे रहे हैं।
![mansoon 2026 - bolebharat Two-panel satellite weather map of South Asia (June 14–15, 2016) showing cloud cover and storm activity with green country borders outlined on each panel.”] ,](https://bolebharat.in/wp-content/uploads/2026/06/mansoon-2026-1-800x600.jpeg)
सबसे घने बादल हिमालयी क्षेत्रों, पूर्वोत्तर भारत और इंडो-गंगा के मैदानी इलाकों के उत्तर में केंद्रित दिखाई देते हैं। वहीं अरब सागर शाखा के ऊपर बादलों की सक्रियता कमजोर और बिखरी हुई नजर आती है। यही कारण है कि मानसून नक्शे पर आगे बढ़ता दिख रहा है, लेकिन जमीन पर व्यापक बारिश नहीं हो रही।
आखिर मानसून कमजोर क्यों पड़ गया?
मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार समस्या समुद्र में नमी की कमी नहीं है। अरब सागर और बंगाल की खाड़ी दोनों में पर्याप्त नमी मौजूद है। असल वजह धरती से कई किलोमीटर ऊपर वायुमंडल में चल रही हवाओं का असामान्य व्यवहार है।
वैज्ञानिकों के मुताबिक इस समय पश्चिमी जेट स्ट्रीम (Westerly Jet Stream) सामान्य स्थिति से काफी दक्षिण की ओर खिसक गई है। यह तेज गति वाली वायुधारा मानसून को ऊर्जा देने वाली पूर्वी जेट स्ट्रीम के काम में बाधा डाल रही है।
सामान्य परिस्थितियों में पूर्वी जेट स्ट्रीम ऊपर उठती हुई हवाओं और गरज-चमक वाले बादलों के विकास को बढ़ावा देती है। लेकिन इस समय पश्चिमी हवाएं अपेक्षाकृत अधिक मजबूत हैं, जिसके कारण बादल बनने और वर्षा होने की प्रक्रिया दब रही है। यही वजह है कि समुद्र में पर्याप्त नमी होने के बावजूद देश के बड़े हिस्से में बारिश नहीं हो पा रही।
मौसम विभाग के मानसून प्रगति मानचित्र के अनुसार 15 जून तक मानसून ने आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा, झारखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल के अतिरिक्त हिस्सों में आगे बढ़ना जारी रखा है।
मौसम विभाग का कहना है कि अगले चार से पांच दिनों में मानसून के महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, ओडिशा, झारखंड, बिहार और छत्तीसगढ़ के और हिस्सों में आगे बढ़ने के लिए परिस्थितियां अनुकूल बनी हुई हैं। यानी मानसून की भौगोलिक प्रगति जारी है, लेकिन उसकी वर्षा कराने की क्षमता फिलहाल कमजोर पड़ी हुई है।
क्या भारत सूखे की ओर बढ़ रहा है?
भारत में मानसून का मुख्य दौर जून के अंत से अगस्त तक माना जाता है। कई वर्षों में जून के शुरुआती हिस्से में बड़ा वर्षा घाटा दर्ज हुआ है, जिसकी भरपाई जुलाई में सक्रिय मानसून ने कर दी।
मौसम विशेषज्ञ वर्तमान स्थिति को “मानसून पॉज” यानी मानसून के अस्थायी ठहराव के रूप में देख रहे हैं। यह ठहराव समुद्री परिस्थितियों की वजह से नहीं, बल्कि ऊपरी वायुमंडलीय हवाओं के अस्थायी बदलाव के कारण पैदा हुआ है।
पूर्वानुमान मॉडल संकेत दे रहे हैं कि सप्ताह के उत्तरार्ध में जेट स्ट्रीम का प्रभाव कमजोर पड़ सकता है और मानसूनी परिसंचरण दोबारा संगठित हो सकता है। ऐसा होने पर बारिश की गतिविधियों में धीरे-धीरे सुधार देखने को मिल सकता है। हालांकि मौसम विभाग ने पहले यह भी बता चुका है कि इस बार मानसून 90% एलपीए रहने का अनुमान। जिसका सीधा और सरल मतलब है कि पूरे मानसून सीजन की बारिश सामान्य औसत से लगभग 10% कम रहने की संभावना है।
सबसे बड़ी चिंता खेतों में, खरीफ सीजन पर क्या पड़ेगा असर?
मानसून की धीमी चाल का सबसे पहला और सीधा असर देश की खरीफ खेती पर पड़ता है। भारत में कुल कृषि क्षेत्र का लगभग आधा हिस्सा अब भी वर्षा आधारित है। धान, सोयाबीन, कपास, मक्का, अरहर, उड़द और मूंग जैसी खरीफ फसलें जून और जुलाई की शुरुआती बारिश पर निर्भर करती हैं।
आमतौर पर मानसून के साथ ही किसान खेतों की जुताई, नर्सरी तैयार करने और बुआई का काम शुरू कर देते हैं। लेकिन इस वर्ष 4 जून से 15 जून के बीच देश में सामान्य से 64 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज होने से कई राज्यों में बुआई की रफ्तार प्रभावित होने की आशंका बढ़ गई है।
कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार खरीफ बुआई का सबसे महत्वपूर्ण दौर जून के दूसरे पखवाड़े और जुलाई के पहले दो सप्ताह में होता है। यदि इस दौरान पर्याप्त बारिश नहीं होती, तो धान, सोयाबीन और दालों की बुआई में देरी हो सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल घबराने की जरूरत नहीं है क्योंकि खरीफ सीजन अभी शुरुआती चरण में है। यदि जून के अंतिम सप्ताह और जुलाई के पहले पखवाड़े में मानसून सक्रिय हो जाता है तो बुआई का बड़ा हिस्सा सामान्य स्थिति में लौट सकता है। लेकिन यदि वर्षा घाटा लंबे समय तक बना रहता है, तो इसका असर फसल उत्पादन, ग्रामीण आय और खाद्य महंगाई तक पहुंच सकता है।
जलाशयों और पेयजल पर भी नजर
मानसून की शुरुआती कमजोरी का असर केवल खेती तक सीमित नहीं है। देश के अधिकांश बड़े जलाशय और बांध मानसूनी वर्षा से ही भरते हैं। जून और जुलाई की अच्छी बारिश ही आने वाले महीनों में सिंचाई, पेयजल और बिजली उत्पादन की नींव रखती है।
यदि मानसून अगले कुछ सप्ताह में रफ्तार नहीं पकड़ता, तो जलाशयों में पानी का स्तर सामान्य से नीचे रह सकता है। हालांकि जल संसाधन विशेषज्ञों का कहना है कि पूरे सीजन का आकलन करने के लिए अभी जुलाई की बारिश का इंतजार करना होगा।
यही वजह है कि मौसम वैज्ञानिक वर्तमान स्थिति को ‘सूखे की शुरुआत’ नहीं बल्कि ‘मानसून के अस्थायी विराम’ के रूप में देख रहे हैं। लेकिन खेतों में खड़े किसान और जल प्रबंधन एजेंसियां आने वाले 10 से 15 दिनों पर विशेष नजर बनाए हुए हैं, क्योंकि यही अवधि तय करेगी कि 2026 का खरीफ सीजन सामान्य रहेगा या चुनौतियों भरा।

