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ब्रिटेन में 16 से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन, एलन मस्क क्यों भड़के? मेंटल हेल्थ पर असर को लेकर चिंतित देश

खरबपति एलन मस्क ने भी ब्रिटेन सरकार के इस फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। मस्क का कहना है कि इस पॉलिसी से सरकार की निगरानी बढ़ सकती है।

ब्रिटेन ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर प्रतिबंध का ऐलान किया है। इससे पहले ऑस्ट्रेलिया ने भी दिसंबर 2025 में ऐसी ही घोषणा की थी। ब्रिटेन के इस फैसले की हालांकि बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियों ने आलोचना की है। खरबपति एलन मस्क ने भी इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। मस्क का कहना है कि इस पॉलिसी से सरकार की निगरानी बढ़ सकती है।

दरअसल यह बहस तब शुरू हुई जब समाचार एजेंसी AFP ने खबर दी कि ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर बैन लगाने का ऐलान किया है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने सोशल मीडिया पर यह पोस्ट शेयर किया और एक बढ़ते हुए आंदोलन में शामिल होने के लिए ब्रिटेन का शुक्रिया अदा किया। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए मस्क ने लिखा कि यह कदम “सरकारी निगरानी वाले राज्य” का हिस्सा है और साथ में गुस्से वाला इमोजी भी लगाया।

कीर स्टार्मर ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान पेश किया प्रस्ताव

स्टार्मर ने सोमवार (15 जून) को लंदन में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान यह प्रस्ताव पेश किया। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया का बच्चों और किशोरों पर बुरा असर पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर बुलीइंग (धौंस जमाना) और दुर्व्यवहार आसान हो सकता है और इससे युवाओं की मानसिक सेहत पर भी असर पड़ सकता है।

कीर स्टार्मर की इस योजना के तहत 16 साल से कम उम्र के किशोरों को Instagram, Facebook, TikTok, Snapchat, YouTube और X जैसे बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इस्तेमाल करने से रोका जाएगा। इस प्रस्ताव में कुछ ऑनलाइन प्रोडक्ट्स पर अतिरिक्त पाबंदियां भी लगाई जाएंगी। जैसे गेमिंग ऐप्स के जरिए अजनबियों से बातचीत करने पर सीमाएं। 18 साल से कम उम्र के किशोरों को रोमांटिक AI चैटबॉट्स का इस्तेमाल करने से भी रोका जाएगा जिन्हें करीबी रिश्ते जैसा अनुभव देने के लिए बनाया गया है।

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स्टार्मर ने माना कि इस फैसले के कुछ नुकसान भी हो सकते हैं लेकिन उन्होंने कहा कि सरकार का मानना ​​है कि इसके फायदे नुकसान से कहीं ज्यादा हैं। उन्होंने कहा कि टेक्नोलॉजी इनोवेशन को बढ़ावा देना और बच्चों को ऑनलाइन सुरक्षित रखना दोनों एक-दूसरे के विरोधी लक्ष्य नहीं हैं।

Meta, Youtube, Snapchat ने जताया विरोध

कई बड़े प्लेटफॉर्म ने इस प्रस्ताव का विरोध किया है। उनका तर्क है कि पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने से मौजूदा समस्याओं के समाधान के बजाय नए जोखिम पैदा हो सकते हैं। फेसबुक और इंस्टाग्राम की मूल कंपनी मेटा ने कहा कि ऑस्ट्रेलिया में इसी तरह के उपायों से यह पता चला है कि प्रतिबंध युवाओं को ऑनलाइन समुदायों और जानकारी के भरोसेमंद स्रोतों से अलग-थलग कर सकते हैं और उन्हें कम नियंत्रित विकल्पों की ओर धकेल सकते हैं।

YouTube ने भी इस प्रस्ताव की आलोचना करते हुए कहा कि व्यापक पाबंदियों से बच्चे निगरानी और मॉडरेशन वाले ऑनलाइन अनुभवों से दूर होकर ऐसी गुमनाम सेवाओं की ओर जा सकते हैं, जहां सुरक्षा के उपाय कम हो सकते हैं।

Snapchat ने भी इन्हीं चिंताओं को दोहराया और तर्क दिया कि उसके प्लेटफॉर्म पर होने वाली ज्यादातर गतिविधियां दोस्तों और परिवार के सदस्यों के बीच बातचीत से जुड़ी होती हैं। कंपनी का कहना है कि किशोरों को इन रिश्तों से अलग करने से सुरक्षा बेहतर नहीं होगी बल्कि इससे कम सुरक्षित प्लेटफॉर्म के इस्तेमाल को बढ़ावा मिल सकता है।

UK सरकार ने कहा कि लोगों से मिली राय से पता चला है कि वे कड़े नियमों का समर्थन करते हैं। दस में से नौ माता-पिता सोशल मीडिया इस्तेमाल के लिए कम से कम 16 साल की उम्र की शर्त का समर्थन करते हैं। अधिकारियों ने यह भी कहा कि कई युवा कम से कम कुछ सोशल मीडिया सेवाओं पर पाबंदियों के पक्ष में हैं।

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एक बड़ी चुनौती इस पाबंदी को लागू करना होगी। ब्रिटेन पहले से ही अपने ‘ऑनलाइन सेफ्टी एक्ट’ के तहत उम्र की पुष्टि करने वाले सिस्टम का इस्तेमाल करता है। जिसमें चेहरे से उम्र का अंदाजा लगाना, बैंक की जानकारी की जांच, ईमेल से पुष्टि और डिजिटल पहचान के तरीके शामिल हैं। उम्मीद है कि रेगुलेटर इस बात की जांच करेंगे कि क्या कम उम्र के यूजर्स को नई पाबंदियों से बचने से रोकने के लिए और उपायों की जरूरत है। प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर के समर्थन वाले इस प्रस्ताव के मंजूर होने पर अगले साल लागू होने की उम्मीद है।

चीन समेत ये देश भी कड़े प्रतिबंध लगाने की कर रहे कोशिशें

ब्रिटेन ऐसा पहला देश नहीं है जिसने बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को लेकर कड़े प्रतिबंध लगाए हैं। ऑस्ट्रेलिया ऐसे प्रतिबंधों को लागू करने वाला पहला देश बना था। 10 दिसंबर 2025 से ऑस्ट्रेलिया में 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर पाबंदी है। इस कदम से नाबालिगों को टिकटॉक, अल्फाबेट के यूट्यूब और मेटा के इंस्टाग्राम और फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म्स से रोका जाएगा।

चीन के मुख्य इंटरनेट रेगुलेटर ने 22 सितंबर 2025 को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के खिलाफ दो महीने का अभियान चलाने की घोषणा की। उन्होंने कहा कि वे ऐसे कंटेंट के खिलाफ कार्रवाई करेंगे जिसमें “टकराव को जान-बूझकर भड़काने” वाली बातें हों और जो “जीवन के प्रति नकारात्मक नजरिया” या दुनिया से ऊबने जैसी भावनाएं दिखाते हों।

बताते चलें कि कनाडा ने हाल गी में एक ‘डिजिटल सेफ्टी बिल’ पेश किया है। यह बिल 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म तक पहुंच को सीमित करेगा; हालांकि अगर सोशल मीडिया कंपनियां युवा यूजर्स के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय दिखा सकती हैं तो उन्हें छूट पाने की अनुमति होगी।

अगर कनाडा का यह कानून पास हो जाता है तो वेबसाइट्स की यह जिम्मेदारी होगी कि वे बच्चों को नुकसानदेह कंटेंट से बचाएं। इसमें डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए होने वाली साइबर-बुलिंग या उत्पीड़न भी शामिल है। आधिकारिक बयान के मुताबिक इससे सोशल मीडिया और AI चैटबॉट सेवाओं के लिए सुरक्षा से जुड़े नए नियम लागू करके ऑनलाइन सेवाओं को ज्यादा जवाबदेह और पारदर्शी बनाया जाएगा।

डेनमार्क की सरकार ने भी 7 नवंबर 2025 को 15 साल से कम उम्र के लोगों के लिए सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए एक राजनीतिक समझौते की घोषणा की।

फ्रांस ने इसी साल जनवरी में एक कानून पास किया। यह कानून निचले सदन नेशनल असेंबली ने पास किया। इसके तहत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को 15 साल से कम उम्र के नए यूजर्स को एक्सेस देने से मना करना होगा और उस उम्र से कम उम्र के बच्चों के अकाउंट्स को सस्पेंड करना होगा।

इस उपाय को लेकर संसद के दोनों सदनों के नजरिए में अंतर दिखता है। ऐसे में इसे कानून का रूप देने से पहले शायद किसी समझौते की जरूरत पड़ सकती है।

बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को लेकर क्यों चिंतित हैं देश?

गौरतलब है कि सोशल मीडिया के ज्यादा इस्तेमाल को लेकर कई रिसर्च स्टडीज में बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य (CMH) को लेकर चिंता व्यक्त की गई है। Johns Hopkins Medicine पर छपे एक लेख में एक्सपर्ट्स ने सोशल मीडिया के संभावित खतरों को लेकर आगाह किया है।

इस लेख में एक्सपर्ट्स ने बताया कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल यदि 30 मिनट तक किया जाए तो इससे मानसिक स्वास्थ्य पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा। वहीं, अगर डेढ़-दो घंटे तक इसका रोजाना इस्तेमाल करने से मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ेगा। इससे बच्चों में एंग्जाइटी, डिप्रेशन, सोने की समस्याएं होने लगती हैं।

नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन में छपी एक रिपोर्ट में भी अलग-अलग आयु वर्ग के बच्चों पर सोशल मीडिया के अत्यधिक इस्तेमाल के चलते होने वाली दिक्कतों के बारे में बताया गया है।

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अमरेन्द्र यादव
लखनऊ विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातक करने के बाद जामिया मिल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई। जागरण न्यू मीडिया में बतौर कंटेंट राइटर काम करने के बाद 'बोले भारत' में कॉपी राइटर के रूप में कार्यरत...सीखना निरंतर जारी है...
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अमरेन्द्र यादव
लखनऊ विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातक करने के बाद जामिया मिल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई। जागरण न्यू मीडिया में बतौर कंटेंट राइटर काम करने के बाद 'बोले भारत' में कॉपी राइटर के रूप में कार्यरत...सीखना निरंतर जारी है...
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