‘ट्रेजडी क्वीन’ के नाम से मशहूर मीना कुमारी को हिंदी सिनेमा की महानतम अभिनेत्रियों में गिना जाता है। उनकी अदाकारी, शायरी और निजी जिंदगी पर बहुत कुछ लिखा गया है, लेकिन उनकी दरियादिली और देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के प्रति सम्मान से जुड़ा एक किस्सा आज भी बहुत कम लोगों को पता है। आज, उनकी जयंती पर यह कहानी सिर्फ एक अभिनेत्री की नहीं, बल्कि एक ऐसी संवेदनशील इंसान की है, जिसने बिना किसी प्रचार की इच्छा के अपने पैसे से नेहरू की आदमकद प्रतिमा बनवाई और उसे जनता को समर्पित कर दिया।
यह कहानी शुरू होती है फिल्मी सितारों के मशहूर छायाकार राम औरंगाबादकर से, जो मीना कुमारी के बेहद करीबी थे। उन्होंने अपने संस्मरण में मीना का जिक्र करते हुए लिखा था, “उसके चेहरे पर ऐसी मासूमियत थी कि दिल करता था, उसे प्यार करो।” 27 मई 1964 को पंडित जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद राम औरंगाबादकर ने अपने शहर औरंगाबाद में उनकी प्रतिमा लगाना चाहते थे। लेकिन उनके पैसे इतने पैसे नहीं थे कि इसे वह पूरा कर सकें।
नेहरू की मूर्ति के लिए पूरी मुंबई घूमीं थीं मीना
एक दिन राम औरंगाबादकर ने मीना कुमारी से अपने दिल की बात कह डाली। मीना कुमारी ने बिना देर किए पूछा, “कितने पैसे लगेंगे?” उन्हें बताया गया कि नेहरू का केवल बस्ट (अर्धप्रतिमा) बनाने में 10 से 15 हजार रुपये का खर्च आएगा। लेकिन मीना कुमारी को यह बात रास नहीं आई। उनका मानना था कि इतने बड़े नेता की सिर्फ अर्धप्रतिमा नहीं, बल्कि पूरी आदमकद प्रतिमा स्थापित होनी चाहिए। इसके बाद वह पूरी जी-जान से इस काम में जुट गईं। एक दिन वह राम औरंगाबादकर के साथ मुंबई में कई जगह लगी प्रतिमाएं देखने निकलीं। आखिरकार चौपाटी पर स्थापित एक प्रतिमा उन्हें पसंद आई। उसके मूर्तिकार वाघ से संपर्क किया गया। वाघ ने शांति के प्रतीक कपोत (कबूतर) को उड़ाते हुए पंडित नेहरू की साढ़े नौ फुट ऊंची कांस्य प्रतिमा बनाने के लिए 75 हजार रुपये मांगे। अगले ही दिन मीना कुमारी ने पूरी राशि नकद अग्रिम के रूप में मूर्तिकार को दे दी।
प्रतिमा आधा बनकर तैयार ही हुई थी कि एक पेंच फंस गया। पता चला कि पंडित नेहरू की अंतिम इच्छा के अनुसार उनकी प्रतिमा लगाने की अनुमति नहीं दी जा रही है। मीना कुमारी और राम दोनों परेशान हुए। अनुमति के लिए दोनों तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी मिलने पहुंच गए। इंदिरा ने दोनों को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन से मिलने की सलाह दी। राष्ट्रपति भवन में हुई मुलाकात भी कम दिलचस्प नहीं थी।
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संस्मरण के अनुसार, औपचारिक बातचीत शुरू होने से पहले ही राष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन ने मुस्कुराते हुए मीना कुमारी से पहला सवाल किया, “तुम्हारा बॉयफ्रेंड धर्मेंद्र कैसा है?” राष्ट्रपति से ऐसे सवाल का सामना कर मीना कुमारी और राम औरंगाबादकर दोनों हैरान रह गए। उन्हें आश्चर्य हुआ कि फिल्मी दुनिया की चर्चाएं और अफवाहें राष्ट्रपति भवन तक भी पहुंच चुकी थीं। बाद में राष्ट्रपति ने मीना कुमारी की मां के जन्मदिन पर उनके घर जाकर उन्हें सम्मान भी दिया।
मीना कुमारी की एक झलक पाने को बेकाबू हो गई थी भीड़
आखिरकार सभी औपचारिकताएं पूरी हुईं और 25 मार्च 1966 को औरंगाबाद कैंटोनमेंट में पंडित जवाहरलाल नेहरू की प्रतिमा का भव्य अनावरण का कार्यक्रम तय हुआ। फिल्मफेयर (Filmfare) के 25 मार्च 1966 के ऐतिहासिक अंक के अनुसार, उस शुक्रवार की भोर में बंबई से 12 घंटे का लंबा और थका देने वाला सफर तय करके मीना कुमारी अपने परिजनों और लगभग 40 दोस्तों के काफिले के साथ औरंगाबाद पहुँचीं। उस दिन अपनी चहेती अदाकारा मीना कुमारी की एक झलक पाने के लिए औरंगाबाद में इस कदर जनसैलाब उमड़ा (करीब 75 हजार लोग इकट्ठा हुए थे) कि भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को हल्का बल प्रयोग तक करना पड़ा था।

यहां एक वाकया और हुआ। समारोह के प्रोटोकॉल के मुताबिक, महाराष्ट्र के तत्कालीन राज्यपाल डॉ. पीवी चेरियन को राष्ट्रपति का स्वागत करके मीना कुमारी का औपचारिक परिचय राष्ट्रपति से कराना था। लेकिन जैसे ही राष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन पहुँचे, उन्होंने सारे प्रोटोकॉल को दरकिनार करते हुए सीधे मीना कुमारी के पास जाकर एक पुराने दोस्त की तरह उनका गर्मजोशी से अभिवादन किया। जब मीना जी उन्हें माला पहनाने लगीं, तो राष्ट्रपति ने अपनी गिरती सेहत का हवाला देते हुए बड़े प्यार से कहा कि वे माला उनके गले में डालने के बजाय सीधे उनके हाथों में थमा दें। मीना कुमारी राष्ट्रपति के इस सरल स्वभाव से भावविभोर हो गईं।
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उसी दोपहर हजारों लोगों की मौजूदगी में शांति का संदेश देते हुए कबूतर उड़ाते पंडित जवाहरलाल नेहरू की साढ़े नौ फुट ऊंची कांस्य प्रतिमा का अनावरण किया गया। मीना कुमारी ने अपने संक्षिप्त संबोधन में राष्ट्रपति का आभार व्यक्त किया कि उन्होंने इस समारोह को अपनी गरिमामयी उपस्थिति से यादगार बना दिया। इस ऐतिहासिक समारोह में भारत के राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन, महाराष्ट्र के राज्यपाल डॉ. पी. वी. चेरियन और तत्कालीन रक्षा मंत्री वाई. बी. चव्हाण सहित कई प्रमुख हस्तियां मौजूद थीं।

राम औरंगाबादकर के संस्मरण के अनुसार, इस पूरी पहल में मीना कुमारी को करीब एक लाख रुपये खर्च करने पड़े, जो उस दौर में बहुत बड़ी रकम थी। उन्होंने कभी इसका प्रचार नहीं किया और न ही इसे अपनी छवि चमकाने का माध्यम बनाया।
औरंगाबाद कैंटोनमेंट में पुराने छावनी परिषद कार्यालय के पास स्थित यह ऐतिहासिक प्रतिमा भारत में पंडित नेहरू की अपनी तरह की सिर्फ दो ही आदमकद कांस्य मूर्तियों में से एक है (दूसरी सिकंदराबाद में है)। और ये दोनों ही दुर्लभ प्रतिमाएं मीना कुमारी द्वारा ‘सार्वजनिक कल्याण समिति, औरंगाबाद’ के माध्यम से भेंट की गई थीं। जब तक परिषद का कार्यालय यहाँ था, तब तक नेहरू की प्रतिमा और परिसर की नियमित सफाई व देखभाल होती थी। लेकिन लगभग 25 साल पहले जब छावनी परिषद का कार्यालय ‘होली क्रॉस स्कूल’ के सामने स्थानांतरित हुआ, तब से इस प्रतिमा का रख-रखाव पूरी तरह ठप पड़ गया। साल 2020 में लोकमत टाइम्स ने इस पर एक रिपोर्ट छापी थी जिसमें वर्षों से पॉलिश न होने के कारण इस ऐतिहासिक कांस्य प्रतिमा के काले पड़ जाने की बात कही गई थी।

