भारतीय सिनेमा के सुनहरे दौर में कई अभिनेत्रियां आईं और गईं, लेकिन जो मुकाम, नजाकत और रुतबा सुरैया (Suraiya) ने हासिल किया, वह मिसाल है। सुरैया भारतीय नायिकाओं में पहली ‘ग्लैमर गर्ल’ के रूप में प्रतिष्ठित हुईं। उनके सजने-संवरने के अंदाज, चाल-ढाल की शोखी, रहन-सहन की नजाकत और बातचीत की नफासत के मामले में उनकी तुलना उस जमाने की विख्यात हॉलीवुड अभिनेत्रियों लाना टर्नर, एवा गार्डनर, लिज टेलर और रीटा हैवर्थ से की जाती थी।
दौर-ए-सिनेमा में वह सबसे ज्यादा फीस लेने वाली स्टार थीं। सौंदर्य और रूप के मामले में भले ही उनकी समकालीन नायिकाएं जैसे मधुबाला, निगार, मीना कुमारी या नलिनी जयवंत उनसे कहीं ज्यादा रुपवती थीं, और अभिनय प्रतिभा में भी नरगिस, मुनव्वर सुल्ताना या नूतन उनसे बेहतर थीं; मगर सुरैया के पास जो जादुई कंठ, अदाएं और शायराना अंदाज में बोलने का ढब था, वह पहली ही मुलाकात में किसी को भी दीवाना बना देने की ताकत रखता था।
जन्म, परिवार और माया नगरी मुंबई का सफर
सुरैया का जन्म 15 जून, 1929 को लाहौर में अजीज शेख के यहाँ हुआ था, जो पेशे से एक आर्किटेक्ट थे। सुरैया को रजत पट (सिनेमा) की दुनिया से परिचित कराने का श्रेय उनके मामा अता जहूर शेख को जाता है, जो स्वयं फिल्मों में खलनायक का रोल किया करते थे। उन्होंने ही किशोरी सुरैया में छिपे असाधारण गुणों को पहचाना और उनकी माँ मलिका बेगम तथा नानी सहित उन्हें माया नगरी मुंबई लेकर आ गए।
बचपन में बेबी सुरैया की पढ़ने-लिखने में रुचि नाम मात्र की ही थी; वह हर वक्त के.एल. सैगल, कानन देवी और खुर्शीद के गीत गुनगुनाती रहती थीं। आश्चर्य की बात यह है कि सुरैया ने संगीत का कोई विधिवत् प्रशिक्षण नहीं लिया था, बल्कि केवल ग्रामोफोन सुनकर ही उन्होंने गाना सीखा।
पार्श्वगायन के दौर में ‘सिंगिंग स्टार’ का जलवा
उस दौर में नलिनी जयवंत, जयश्री, नसीम बानो, नूतन और माला सिन्हा जैसी अभिनेत्रियों के पास सुरीला कंठ तो था, लेकिन वे गायिका-नायिका के रूप में प्रतिष्ठित नहीं हो पाईं, क्योंकि तब तक फिल्मों में ‘प्लेबैक सिंगिंग’ का चलन शुरू हो चुका था।
मगर सुरैया एक अपवाद थीं। वह जब नायिका के साथ-साथ गायिका के रूप में माइक पर आती थीं, तो उस जमाने की कोई भी बड़ी पार्श्व गायिका उनसे बेहतर प्रस्तुति का दावा नहीं कर सकती थी। सुरैया ने कभी धन के लिए नहीं गाया और न ही वह कभी किसी कमर्शियल कंसर्ट का हिस्सा बनीं। वह जब भी गाती थीं, अपने दिल की गहराइयों से गाती थीं। फिल्म ‘बड़ी बहन’ का “लिखने वाले ने…” और फिल्म ‘मिर्जा गालिब’ का “ये न थी हमारी किस्मत…” जैसे गीत आज भी उनकी आवाज की मिठास और विशिष्ट कंठ-कीर्ति के जीवंत प्रमाण हैं।
सुरैया ने अपने करियर की शुरुआत एक बाल कलाकार के रूप में फिल्म ‘ताजमहल’ से की थी, जिसके लिए उन्होंने बड़ी मेहनत से नाचना सीखा था। इसके बाद ‘शारदा’, ‘स्टेशन मास्टर’, ‘संजोग’ और ‘कानून’ जैसी फिल्मों में वह एक बेहतरीन गायिका के रूप में स्थापित हुईं। हालांकि, बॉम्बे टॉकीज की फिल्म ‘हमारी बात’ में उनके नृत्य और स्वर के साथ जुड़े शोख अभिनय ने उन्हें रातों-रात एक बड़ा स्टार बना दिया।
जब गालिब की ‘रूह जिंदा’ हुई और नेहरू हुए मुरीद
सुरैया के करियर का सबसे ऐतिहासिक मोड़ साल 1954 में आया, जब सोहराब मोदी के निर्देशन में फिल्म ‘मिर्जा गालिब’ रिलीज हुई। इस फिल्म में सुरैया ने गालिब की प्रेमिका ‘मोती बेगम’ का किरदार निभाया था। फिल्म के संगीतकार गुलाम मोहम्मद ने सुरैया की गायिकी का समग्र उपयोग किया और गालिब की कुछ मशहूर गजलें उनसे गवाईं। “दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है”, “आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक” और “ये न थी हमारी किस्मत” जैसी गजलों को सुरैया ने जिस भावनात्मक गहराई के साथ प्रस्तुत किया, उसने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। मंत्रमुग्ध होने वालों में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी थे।
दरअसल इसकी विशेष स्क्रीनिंग के दौरान देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू मुख्य अतिथि थे। नेहरू जी उर्दू शायरी और संगीत के बड़े पारखी थे। फिल्म समाप्त होने के बाद वे सुरैया की गायकी और अदाकारी से इस कदर प्रभावित हुए। खासकर गालिब का मशहूर कलाम दिले नादाँ तुझे हुआ क्या है सुरैया से सुनकर तो वे उनकी गायिकी के दीवाने हो गए थे।
नेहरू ने सुरैया की गायिकी की दाद देते हुए कहा था- “लड़की, तुमने मिर्जा गालिब की रूह को जिंदा कर दी!” सुरैया के लिए प्रधानमंत्री के मुंह से निकली यह तारीफ उनके जीवन और करियर की सबसे बड़ी पूंजी बन गई। गौरतलब है कि फिल्म राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में ‘सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म’ का राष्ट्रीय पुरस्कार (स्वर्ण पदक) जीतने वाली इतिहास की पहली फिल्म बनी थी।
व्यावसायिक असफलता और करियर का ढलान
शानदार समीक्षाओं और राष्ट्रीय पुरस्कार के बावजूद, ‘मिर्जा गालिब’ फिल्म अपनी क्लिष्ट (कठिन) उर्दू और भारी-भरकम संवादों के कारण व्यावसायिक दृष्टि से बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं रही। इस असफलता के दबाव में सुरैया ने कुछ गलत फैसले ले लिए। उन्होंने अपनी प्रतिष्ठा के विपरीत ‘मालिक’ और ‘मिस्टर लंबू’ जैसी बी और सी-ग्रेड फिल्मों में काम करना स्वीकार कर लिया, जिससे उनकी स्टार वैल्यू को नुकसान पहुंचा।
यह वह काल था जब हिंदी सिनेमा की पुरानी और लोकप्रिय नायिकाओं का युग धीरे-धीरे ढल रहा था। नरगिस फिल्मों से रिटायर हो चुकी थीं, कामिनी कौशल और निम्मी का फिल्मों में आना कम हो रहा था, और मधुबाला लगातार बीमार चल रही थीं। पुराने युग से केवल वैजयन्तीमाला और नूतन ही अपनी लोकप्रियता बनाए हुए थीं, जबकि नई पीढ़ी की आशा पारेख, सायरा बानो और साधना तेजी से अपनी जगह बनाने में लगी थीं।
सबसे बड़ा बदलाव यह आया कि सिनेमा में ‘नायिकाओं का युग’ खत्म हो रहा था और ‘नायकों का जमाना’ शुरू हो रहा था। सुरैया इस बदलते और नए दौर के समीकरणों में अनफिट थीं, जिसके चलते उन्हें मनमुताबिक रोल मिलने बंद हो गए। 1963 में आई रुस्तम सोहराब उनकी अंतिम फिल्म साबित हुई और इसके बाद उन्होंने फिल्म जगत से लगभग संन्यास ले लिया। फिल्मों से दूरी बनाने के बाद सुरैया मुंबई के मरीन ड्राइव स्थित अपने घर में एकांत जीवन बिताने लगीं। कभी करोड़ों दिलों की धड़कन रही यह कलाकार धीरे-धीरे सार्वजनिक जीवन से दूर हो गई।
भले ही वक्त के साथ सुरैया ने पर्दे से दूरी बना ली, लेकिन ‘ग्लैमर’ और ‘मखमली आवाज’ का जो अनूठा संगम उन्होंने पेश किया था, वह आज भी इतिहास के पन्नों पर दर्ज है। उन्होंने अपने जीवनकाल में करीब 70 फिल्मों में काम किया जबकि 300 से अधिक गीतों में अपनी आवाज दी। 31 जनवरी 2004 को मुंबई में उनका निधन हो गया।

