Home विचार-विमर्श राज की बातः जब लालू प्रसाद जीवन का पहला चुनाव हारे

राज की बातः जब लालू प्रसाद जीवन का पहला चुनाव हारे

पहले पटना विश्वविद्यालय में इंटर यूनिवर्सिटी क्रिकेट होता था, जिसमें जादवपुर, सागर और बम्बई की टीमें खेलने आती थीं। पटना विश्वविद्यालय की टीम हार जाती थी। जब लालू साइंस कॉलेज में प्रचार के लिए गए, उन्होंने घोषणा की, “मैं अध्यक्ष बनने पर सबसे पहले यह व्यवस्था करूंगा कि सभी खिलाड़ियों को हर महीने बोर्नविटा का डिब्बा फ्री दिलवाऊंगा।”

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लालू प्रसाद यादव की एआई जेनरेटेड इमेज।

पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ का चुनाव 28 फरवरी को होने जा रहा है। शनिवार को कुलपति ने इस चुनाव के स्थगन की घोषणा कर दी, फिर छात्र समुदाय के दबाव में मध्य रात्रि में निर्णय वापस ले लिया।

इसके पूर्व उम्मीदवारों ने व्यापक हिंसा की। साइंस कॉलेज में अंग्रेजी के प्रोफेसर की क्लासरूम में पिटाई कर दी। पटना वूमेन्स कॉलेज में छात्राओं के साथ बदतमीजी हुई। पुलिस ने मिन्टो हॉस्टल से बॉम्ब बरामद किया। आठ विद्यार्थियों को गिरफ्तार किया गया।

छात्र संघ, जिसमें 20,000 सदस्य हैं, की स्थापना 1959 में हुई थी। इसके पहले अध्यक्ष शैलेश चंद्र मिश्र थे, जो पटना उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के पुत्र थे। तत्कालीन रक्षा मंत्री वी. के. कृष्णा मेनन उद्घाटन समारोह में आए थे।

1972 के चुनाव में लालू प्रसाद यादव चुनाव हार गए थे। यह उनका पहला चुनाव था। उन्हें साइंस कॉलेज के छात्र रामजतन सिन्हा ने पराजित किया था। बी. एन. कॉलेज के नरेंद्र सिंह महासचिव बने। सिन्हा भूमिहार जाति से थे और सिंह राजपूत। पहली बार अगड़ी और पिछड़ी जाति के छात्रों के बीच मुकाबला था।

अगले साल लालू प्रसाद यादव, जो समाजवादी युवजन सभा के सदस्य थे, ने विद्यार्थी परिषद के सुशील कुमार मोदी के साथ एलायंस किया। यादव और बनिया मतदाताओं का मिलन हुआ। रविशंकर प्रसाद और प्रभात जमायर कायस्थ उम्मीदवार थे। लालू प्रसाद यादव ने भूमिहार प्रत्याशी और इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्र रामशरण प्रसाद सिंह को हराया।

पिछड़ी जाति के विद्यार्थियों को जोड़ने का श्रेय राष्ट्रीय सेवक संघ के स्थानीय नेताओं को जाता है। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के अय्यर हॉस्टल में रहने वाले विद्यार्थी परिषद के प्रचारक राम बहादुर राय पटना आए और चुनाव प्रचार का जिम्मा लिया।

मैं भी पटना विश्वविद्यालय का छात्र रहा। प्रत्याशी रंग-बिरंगे हैंडबिल बांटते, जो खूबसूरत सुगंध से भरे रहते। लालू प्रसाद यादव का चुनावी भाषण विद्यार्थियों के कल्याण पर केंद्रित रहता। वे लड़कियों में अपने चुलबुले भाषण से लोकप्रिय हो गए थे। मगध महिला कॉलेज में उन्होंने देखा कि लड़कियों को काफी झुककर नल का पानी पीना पड़ता था। उन्होंने घोषणा की, “मैं जब अध्यक्ष बन जाऊंगा तब नल को इतना ऊंचा कर दूंगा कि लड़की छाती तान कर पानी पी सकेंगी।”

पहले पटना विश्वविद्यालय में इंटर यूनिवर्सिटी क्रिकेट होता था, जिसमें जादवपुर, सागर और बम्बई की टीमें खेलने आती थीं। पटना विश्वविद्यालय की टीम हार जाती थी। जब लालू साइंस कॉलेज में प्रचार के लिए गए, उन्होंने घोषणा की, “मैं अध्यक्ष बनने पर सबसे पहले यह व्यवस्था करूंगा कि सभी खिलाड़ियों को हर महीने बोर्नविटा का डिब्बा फ्री दिलवाऊंगा।”

निर्वाचन अधिकारी बी. एन. कॉलेज के प्राचार्य श्री एस. के. बोस थे। मतगणना उन्हीं के कॉलेज में दूसरी मंजिल पर हो रही थी। सी. आर. पी. एफ. लगाई गई थी। रात में हॉल में अचानक अंधेरा हो गया, जोरदार आवाज हुई। लालू प्रसाद यादव ने चिल्लाना शुरू कर दिया, “बम फूटा है।” मतगणना स्थगित हो गई। पटना के जिला मजिस्ट्रेट भी पहुंच गए। जांच हुई, पता चला टीन से बने कुछ बैलट बॉक्स ऊपर से फेंके गए थे, जिनमें मतपत्र थे।

अगले दिन लालू प्रसाद यादव भारी मतों से निर्वाचित घोषित हुए। उनकी टीम भी जीती। लालू प्रसाद यादव के पांच कैबिनेट मेंबर भी विजयी हुए। कैबिनेट की पहली बैठक छात्र संघ कार्यालय में हुई।

उस वक्त यह आधिकारिक व्यवस्था थी कि छात्र संघ के अध्यक्ष को विश्वविद्यालय द्वारा टेलीफोन कनेक्शन कार्यालय और घर दोनों जगह दिया जाता था, जिसका भुगतान विश्वविद्यालय करता था। छात्र संघ शक्तिशाली होता था। इसके अध्यक्ष और महासचिव को बिहार सरकार और पटना प्रशासन की समितियों का सदस्य मनोनीत किया जाता था। इन्हीं की सिफारिश पर पटना के सिनेमा घरों में विशेष टिकट काउंटर बनाया गया।

बाद के चुनाव में अश्विनी कुमार चौबे अध्यक्ष बने, जो कालांतर में केंद्र के मंत्री नियुक्त हुए। छात्र संघ के चुनाव प्रचार में कर्पूरी ठाकुर और जॉर्ज फर्नांडिस जैसे नेता आते थे।

1978 में छात्र संघ चुनाव में नारायण नारायण लाल नड्डा निर्वाचन अधिकारी थे। हिंसा हुई थी। उन्हें रानी घाट प्रोफेसर कॉलोनी छोड़कर हार्डिंग रोड में एक विधायक के यहां शरण लेनी पड़ी थी।

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लव कुमार मिश्र
लव कुमार मिश्र, 1973 से पत्रकारिता कर रहे हैं,टाइम्स ऑफ इंडिया के विशेष संवाददाता के रूप में देश के दस राज्यों में पदस्थापित रह। ,कारगिल युद्ध के दौरान डेढ़ महीने कारगिल और द्रास में रहे। आतंकवाद के कठिन काल में कश्मीर में काम किए।

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