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राज की बातः जब ‘जिगर के टुकड़ों’ ने बिहार में प्रथम गैर कांग्रेसी सरकार बनवाई और एक मुख्यमंत्री को हरा दिया था

बिहार विधानसभा चुनाव से पहले कई नारे दिए जा रहे हैं। ऐसे में एक और नारा जो कि 1967 के चुनाव की याद दिलाता है। वह है “जिगर के टुकड़ों।”

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BIHAR ASSEMBLY ELECTION, जिगर के टुकड़े
जब जिगर के टुकड़े नारे ने बदल दी थी बिहार में सरकार, फोटोः ग्रोक (प्रतीकात्मक)

अब बिहार विधान सभा का चुनाव फिर आ गया है, नेता लोग विभिन्न प्रकार के नारे लगाते हैं। जैसे- चिराग पासवान का ‘बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट’ और प्रशांत किशोर का ‘बिहार बदलाव की ओर’ लेकिन 1967 के विधान सभा के चुनाव में एक नारा काफी लोकप्रिय था – “जिगर के टुकड़े” जिसने बिहार की राजनीति की दशा और दिशा ही बदल दी। बिहार प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रहे महामाया प्रसाद सिन्हा युवाओं और छात्रों को इसी नारे से संबोधित करते थे।

चुनाव के कुछ सप्ताह पहले पटना में बी एन कॉलेज के छात्रों पर पुलिस फायरिंग हुई जिसमें दीना नाथ पांडे नामक एक छात्र की मौत हो गई, छात्रों ने कई सरकारी भवनों में आग लगा दी। श्री कृष्ण वल्लभ सहाय मुख्यमंत्री रहे, वह एक कुशल प्रशासक थे। बिहार पहला राज्य था जहां जमींदारी प्रथा समाप्त हुई, इसे सहाय ने ही लागू किया था।

महामाया बाबू ने कांग्रेस छोड़ दिया और जन क्रांति दल का गठन किया। उन्होंने पूरे बिहार में घूम कर कांग्रेस के खिलाफ अभियान शुरू कर दिया और “मेरे जिगर के टुकड़ों” का आह्वान करते हुए कहा कि कांग्रेस को उखाड़ फेंकों।

छात्रों के बीच एक सभा में उन्होंने अपना कमीज फाड़ दिया और चिल्ला कर बोले – जब हमारे जिगर के टुकड़ों पर गोली चलती है तो मैं कैसे ठीक रहूं।”

कॉलेज और स्कूल के छात्र साइकिल पर समूह में उनके लिए प्रचार करते, रंगीन हैंड बिल, पर्चे बांटा करते थे, जिसमें महामाया बाबू का “जिगर के टुकड़ों के लिए अपील रहता।”

जब चुनाव परिणाम आया तब कांग्रेस के मुख्यमंत्री कृष्ण वल्लभ सहाय को निर्दलीय महामाया प्रसाद सिन्हा ने पटना पश्चिम क्षेत्र से 7000 वोट से पराजित कर दिया।

नई सरकार में जिगर के टुकड़ों के लिए पहला निर्णय लिया – पास विदाउट इंग्लिश(PWE)। मैट्रिक की परीक्षा में अंग्रेजी में फेल विद्यार्थी भी उत्तीर्ण होने लगे।

पहली बार हुआ कि महामाया बाबू की सरकार में जनसंघ और दोनों कम्यूनिस्ट पार्टियां (CPI,CPM), संसोपा और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी, स्वतंत्र पार्टी शामिल थी, कर्पूरी ठाकुर उप मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री बने। विद्यार्थियों के लिए राज्य परिवहन की बसों में कंसेशनल टिकट तथा सिनेमा घरों में विद्यार्थियों के लिए अलग अलग काउंटर खोले गए।

तब चुनाव प्रचार बहुत साधारण और कम खर्चीला था। मैंने रामअवतार शास्त्री, जो पटना से लोकसभा के CPI सांसद थे, उन्हें पैडल रिक्शा पर प्रचार करते देखा है। वे चितकोहरा बाजार की निम्न मध्यमवर्गीय बस्ती में सभा कर रहे थे, जहाँ दो लकड़ी के खटियों पर एक अस्थायी मंच बनाया गया था। ऐसे ही कांग्रेस प्रत्याशी और शिक्षा मंत्री रहे दीनानाथ वर्मा, जिनका निवास और कार्यालय जक्कनपुर में था, वे भी रिक्शा पर बैठकर वोट माँग रहे थे (उस समय ऑटो नहीं हुआ करता था)।

अधिकांश प्रभावशाली उम्मीदवारों जैसे डॉ. ए.के. सेन और प्रो. नरमदेश्वर प्रसाद के लिए उनके छात्र ही स्टार प्रचारक बने हुए थे। स्वतंत्र पार्टी के कामाख्या नारायण सिंह, जिन्हें रामगढ़ का महाराजा कहा जाता था, हेलीकॉप्टर से चुनाव प्रचार करते थे और मैंने देखा कि उन्होंने अपने परिवार के सभी सदस्य, नौकर, ड्राइवर यहाँ तक कि अपने बावर्ची को भी पदमा पैलेस से विधानसभा चुनावों में प्रत्याशी बनाया था।

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लव कुमार मिश्र
लव कुमार मिश्र, 1973 से पत्रकारिता कर रहे हैं,टाइम्स ऑफ इंडिया के विशेष संवाददाता के रूप में देश के दस राज्यों में पदस्थापित रह। ,कारगिल युद्ध के दौरान डेढ़ महीने कारगिल और द्रास में रहे। आतंकवाद के कठिन काल में कश्मीर में काम किए।

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