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दिल्ली में ‘ओजोन प्रदूषण’ बन रहा नया खतरा? सांस से लेकर दिल तक पर असर, गर्मियों में बढ़ रही चिंता

अक्सर हम ओजोन का नाम सुनते ही यही सोचते हैं कि यह अच्छी चीज है। ऐसा इसलिए कि ओजोन परत पृथ्वी को बचाती है। लेकिन सच यह है कि ओजोन अच्छी भी है और खतरनाक भी, यह इस बात पर निर्भर करता है कि वह वातावरण में कहां मौजूद है।

नई दिल्ली: देश की राजधानी नई दिल्ली में प्रदूषण को लेकर तरह-तरह की चर्चा सर्दियों में खूब सुनने को मिलती है। यही नहीं, आमतौर पर राजधानी में प्रदूषण की जब भी बात होती है, पीएम2.5 और पीएम10 जैसे सूक्ष्म कणों का जिक्र आता है। हालांकि अब विशेषज्ञों की चिंता का एक नया कारण सामने आया है। हालिया विश्लेषण बताते हैं कि दिल्ली-एनसीआर में ग्राउंड-लेवल ओजोन प्रदूषण भी एक बड़े पर्यावरणीय और सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट के रूप में उभर रहा है।

यह समस्या इसलिए भी गंभीर मानी जा रही है क्योंकि ओजोन प्रदूषण लंबे समय तक लोगों को प्रभावित कर सकता है। इसका असर फेफड़ों से लेकर दिल की बीमारियों तक नजर आता है।

क्या है ग्राउंड-लेवल ओजोन प्रदूषण?

अक्सर हम ओजोन का नाम सुनते ही यही सोचते हैं कि यह अच्छी चीज है। ऐसा इसलिए कि ओजोन परत पृथ्वी को बचाती है। लेकिन सच यह है कि ओजोन अच्छी भी है और खतरनाक भी, यह इस बात पर निर्भर करता है कि वह वातावरण में कहां मौजूद है।

ओजोन क्या है, पहले इसे समझते हैं। ओजोन दरअसल एक गैस है जो तीन ऑक्सीजन परमाणुओं यानी एटम से बनती है। ओजोन और सामान्य ऑक्सीजन में फर्क इतना है कि ऑक्सीजन में 2 एटम होते हैं, जबकि ओजोन में 3 एटम। ओजोन कैसे बनती है, इसे भी समझ लेते है। आमतौर पर जब ऑक्सीजन के अणु यानी O₂ सूर्य की पराबैंगनी (UV) किरणों के प्रभाव से टूटकर अलग-अलग ऑक्सीजन परमाणु (O) बनाते हैं, तो ये मुक्त परमाणु दूसरी ऑक्सीजन (O₂) के साथ मिलकर ओजोन (O₃) बना लेते हैं।

पृथ्वी की वायुमंडल की लगभग 15 से 35 किलोमीटर की ऊंचाई पर बनी हुई यही ओजोन परत सूर्य से आने वाली हानिकारक अल्ट्रावायलेट किरणों को रोकती है। लेकिन जब यही गैस जमीन के करीब यानी निचले वायुमंडल (ट्रोपोस्फीयर) में बनती है, तो यह प्रदूषण की वजह बन जाती है। इसका जमीन के पास बढ़ता स्तर ही ग्राउंड-लेवल ओजोन या ओजोन प्रदूषण कहा जाता है।

ग्राउंड-लेवल ओजोन प्रदूषण सीधे किसी फैक्ट्री या वाहन से उत्सर्जित नहीं होता। यह वातावरण में होने वाले केमिकल रिएक्शन से शुरू होता है। नाइट्रोजन ऑक्साइड और वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (VOcs) जब तेज धूप की मौजूदगी में आपस में रिएक्शन करते हैं, तो ओजोन तैयार होने लगता है। VOCs ऐसे कार्बनिक (ऑर्गेनिक) रसायन होते हैं, जो सामान्य तापमान पर आसानी से गैस बनकर हवा में उड़ जाते हैं। इनका इस्तेमाल आमतौर पर पेट्रोल, फर्नीचर, पेंट, थिनर, एयर फ्रेशनर आदि में होता है।

यही वजह है कि ओजोन प्रदूषण सबसे ज्यादा गर्म और धूप वाले दिनों में, खासकर दिन के समय बढ़ता है। जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ते तापमान के साथ इसके और गंभीर होने की आशंका है।

दिल्ली-एनसीआर में कितनी गंभीर है स्थिति?

दिल्ली-एनसीआर के हालिया आंकड़े बताते हैं कि ओजोन प्रदूषण अब व्यापक और लगातार बनी रहने वाली समस्या बनती जा रही है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) ने कंटीन्युअस एम्बिएंट एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग सिस्टम (CAAQMS) के आंकड़ों का विश्लेषण करते हुए पाया कि 1 मार्च से 31 मई 2025 के बीच दिल्ली-एनसीआर के कई इलाकों में राष्ट्रीय आठ घंटे के ओजोन मानक 100 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर का हर दिन उल्लंघन हुआ।

यही नहीं, पिछले पांच सालों में ऐसे मॉनिटरिंग स्टेशनों की संख्या लगातार बढ़ी है, जहां प्रतिदिन ओजोन का स्तर तय सीमा से ऊपर दर्ज किया गया। औसतन यह स्थिति हर दिन 14.2 घंटे तक बनी रही, यानी ज्यादा बड़ी आबादी ज्यागा लंबे समय तक इसके संपर्क में रही।

दिल्ली के किन इलाकों में सबसे ज्यादा असर?

ओजोन प्रदूषण का पैटर्न पीएम 2.5 और ऐसे पार्टिकुलेट मैटर यानी सूक्ष्म कणों से बहुत अलग पाया गया। नेहरू नगर, नजफगढ़, ओखला फेज-2, अशोक विहार और आया नगर में ओजोन मानकों के उल्लंघन के सबसे ज्यादा दिन दर्ज किए गए। इनमें से कई इलाके दिल्ली के सबसे ज्यादा पीएम2.5 प्रदूषित क्षेत्रों में शामिल नहीं हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, भारी ट्रैफिक वाले इलाकों में वाहनों से निकलने वाला नाइट्रिक ऑक्साइड (NO) स्थानीय स्तर पर रिएक्शन कर ओजोन को तोड़ देता है। इसके विपरीत, रिहायशी और शहर की बाहरी सीमाओं वाले इलाकों में यह प्रक्रिया कम होती है, जिससे वहां ओजोन जमा होने लगता है।

सबसे अधिक दैनिक अधिकतम आठ घंटे का औसत स्तर ओखला स्थित सेंट्रल रोड रिसर्च इंस्टीट्यूट (CRRI)- मथुरा रोड स्टेशन पर 472 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज किया गया। इसके अलावा अन्य स्टेशनों पर भी ये 300 से 400 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से अधिक स्तर रिकॉर्ड किए गए।

ओजोन प्रदूषण से क्या नुकसान हैं?

ओजोन प्रदूषण कई मायनों में इंसानी शरीर को प्रभावित कर सकता है। इसमें सांस संबंधी तात्कालिक समस्याएं भी शामिल हैं। ओजोन एक अत्यधिक रिएक्टिव गैस है, जो सीधे श्वसन नलिकाओं की अंदरूनी परत को नुकसान पहुंचाती है। कम समय तक संपर्क में आने पर भी लोगों में ये लक्षण दिखाई दे सकते हैं-

खांसी
गले में जलन
सीने में जकड़न
घरघराहट
सांस फूलना
गहरी सांस लेने पर दर्द

ये लक्षण उन लोगों में भी दिखाई दे सकते हैं जिन्हें पहले से कोई सांस की बीमारी न हो।

इसके अलावा ये फेफड़ों की क्षमता पर असर करता है। ओजोन के बढ़े हुए स्तर के संपर्क में आने से स्वस्थ लोगों में भी फेफड़ों की क्षमता कम हो सकती है। बच्चे, बुजुर्ग और पहले से सांस की बीमारी से जूझ रहे लोग पर इसका और बुरा असर नजर आ सकता है। इसके अलावा अस्थमा के लक्षण बढ़ सकते हैं।

पहले ओजोन को मुख्य रूप से श्वसन तंत्र का प्रदूषक माना जाता था, लेकिन हालिया शोध बताते हैं कि इसका असर हृदय स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है। इससे हृदय संबंधी मृत्यु, हार्ट अटैक, स्ट्रोक, अनियमित धड़कन (अरिदमिया/Arrhythmias) जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं।

दिल्ली के लिए क्या हैं इसके मायने?

विशेषज्ञों का कहना है कि दिल्ली अब केवल पार्टिकुलेट मैटर (जैसे पीएम2.5 और पीएम10) के संकट से नहीं जूझ रही, बल्कि यह बहु-प्रदूषक संकट की ओर बढ़ रही है। ऐसे में प्रदूषण से निपटने की रणनीति को भी बदलना होगा।

ओजोन प्रदूषण नियंत्रण के लिए परिवहन, उद्योग, बिजली उत्पादन, कचरा जलाने से पैदा होने वाले नाइट्रोजन ऑक्साइड और VOC उत्सर्जन में कमी लाने की जरूरत होगी। ओजोन प्रदूषण चूकी अपने स्रोत से काफी दूर तक भी फैल सकता है, इसलिए इससे निपटने की रणनीति केवल दिल्ली तक सीमित नहीं रह सकती। इसके लिए पूरे एनसीआर स्तर पर प्रयास जरूरी होंगे।

वैसे ये भी है कि भारत में ओजोन के स्वास्थ्य प्रभावों को लेकर पर्याप्त अध्ययन उपलब्ध नहीं हैं। अब तक अधिकांश शोध कणीय प्रदूषण के प्रभावों पर केंद्रित रहे हैं। ऐसे में ओजोन के संभावित दुष्प्रभावों को समझने के लिए स्वास्थ्य अध्ययनों का दायरा बढ़ाने की जरूरत है।

यह भी पढ़ें- हिजाब पहने बिना गाने के लिए ईरान में गायिका को 74 कोड़ों की सजा

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विनीत कुमार
पूर्व में IANS, आज तक, न्यूज नेशन और लोकमत मीडिया जैसी मीडिया संस्थानों लिए काम कर चुके हैं। सेंट जेवियर्स कॉलेज, रांची से मास कम्यूनिकेशन एंड वीडियो प्रोडक्शन की डिग्री। मीडिया प्रबंधन का डिप्लोमा कोर्स। जिंदगी का साथ निभाते चले जाने और हर फिक्र को धुएं में उड़ाने वाली फिलॉसफी में गहरा भरोसा...
विनीत कुमार
पूर्व में IANS, आज तक, न्यूज नेशन और लोकमत मीडिया जैसी मीडिया संस्थानों लिए काम कर चुके हैं। सेंट जेवियर्स कॉलेज, रांची से मास कम्यूनिकेशन एंड वीडियो प्रोडक्शन की डिग्री। मीडिया प्रबंधन का डिप्लोमा कोर्स। जिंदगी का साथ निभाते चले जाने और हर फिक्र को धुएं में उड़ाने वाली फिलॉसफी में गहरा भरोसा...
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