नई दिल्ली: वर्षों से लंबित किशाऊ डैम परियोजना को लेकर आखिरकार बड़ा फैसला हो गया है। केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में मंगलवार को नई दिल्ली में हुई उच्चस्तरीय बैठक में इस परियोजना के क्रियान्वयन को लेकर 6 राज्यों के बीच सहमति बन गई। यमुना के पुनर्जीवीकरण और उत्तरी भारत के कई राज्यों की जल एवं ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने वाली इस महत्वाकांक्षी परियोजना को अब मंजूरी मिलने का रास्ता साफ होता नजर आ रहा है।
क्या है किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना?
किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की सीमा पर टोंस नदी पर प्रस्तावित है। टोंस नदी, यमुना की प्रमुख सहायक नदियों में से एक है। परियोजना स्थल हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले में स्थित है। यह डाकपत्थर से लगभग 50 किलोमीटर और मौजूदा इछारी बांध से करीब 10 किलोमीटर ऊपर स्थित है।
यह परियोजना जल संरक्षण, बिजली उत्पादन, सिंचाई और पेयजल आपूर्ति जैसे कई उद्देश्यों को ध्यान में रखकर तैयार की गई है। इसके अलावा यमुना में स्वच्छ जल के प्रवाह को बढ़ाकर उसके पुनर्जीवीकरण में भी इसकी अहम भूमिका मानी जा रही है।
किन राज्यों के बीच बनी सहमति?
अमित शाह की पहल पर हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना के क्रियान्वयन के लिए समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर सहमत हो गए हैं। समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर होने के बाद परियोजना को अंतिम मंजूरी के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा।
बैठक में केंद्रीय विद्युत मंत्री मनोहर लाल, केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल, हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू, उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सहित विभिन्न मंत्रालयों और राज्यों के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।
परियोजना की लागत कितनी है?
किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना की अनुमानित लागत करीब 11,500 करोड़ रुपये है। बैठक में यह निर्णय लिया गया कि परियोजना के जल घटक के कार्य पर आने वाले खर्च का 90 प्रतिशत हिस्सा केंद्र सरकार केंद्रीय सहायता के रूप में वहन करेगी, जबकि शेष 10 प्रतिशत राशि का भार छह संबंधित राज्य उठाएंगे।
वहीं, हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने इसे राज्य की ‘बड़ी जीत’ बताते हुए कहा कि हिमाचल प्रदेश को इस परियोजना के निर्माण में कोई वित्तीय योगदान नहीं देना होगा। उनका कहना है कि राज्य के प्राकृतिक संसाधन, विशेषकर जल और भूमि, हिमाचल प्रदेश की संपत्ति हैं, इसलिए राज्य पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ नहीं डाला जाएगा।
बैठक में यह भी सहमति बनी कि हिमाचल प्रदेश के विद्युत घटक के हिस्से की लागत को साझा करने के बदले हिमाचल प्रदेश के हिस्से का पानी दिल्ली और राजस्थान को उपलब्ध कराया जाएगा।
परियोजना से क्या होंगे फायदे?
किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना से कई स्तरों पर लाभ मिलने की उम्मीद है।
- परियोजना से 660 मेगावाट जलविद्युत उत्पादन किया जाएगा।
- यमुना नदी में स्वच्छ जल का प्रवाह बढ़ेगा, जिससे उसके पुनर्जीवीकरण में मदद मिलेगी।
- कई उत्तरी राज्यों को पेयजल और सिंचाई के लिए अतिरिक्त जल उपलब्ध होगा।
- हिमाचल के मुख्यमंत्री के दावे के अनुसार बिजली उत्पादन शुरू होने के बाद राज्य को बिना निवेश किए हर साल 600 करोड़ रुपये से अधिक की आय होगी।
- इससे क्षेत्रीय जल सुरक्षा और ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में भी सहायता मिलेगी।
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यह परियोजना वर्षों से विभिन्न कारणों से अटकी हुई थी। इससे होने वाले विस्थापन और पर्यावरणीय प्रभाव को लेकर भी लगातार चिंताएं जताई जाती रही हैं। वर्ष 2020 की अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार, हिमाचल प्रदेश में करीब 1,498 हेक्टेयर भूमि जलमग्न हो सकती है। इससे 8 गांवों के लगभग 2,092 लोग प्रभावित होने की आशंका है।
वहीं, उत्तराखंड में करीब 1,452 हेक्टेयर भूमि प्रभावित होगी, जिससे 9 गांवों के लगभग 3,406 लोगों पर असर पड़ सकता है। कुल मिलाकर लगभग 2,950 हेक्टेयर क्षेत्र के जलमग्न होने का अनुमान है।
गौरतलब है कि परियोजना को लागू करने के लिए संयुक्त उपक्रम स्थापित करने संबंधी समझौता ज्ञापन हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड सरकारों के बीच जून 2015 में हस्ताक्षरित किया गया था। अब ताजा सहमति के बाद माना जा रहा है कि किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना के सामने मौजूद एक बड़ी बाधा दूर हो गई है और यह महत्वाकांक्षी योजना जल्द धरातल पर उतर सकती है, जिससे यमुना के पुनर्जीवीकरण के साथ-साथ उत्तरी भारत के कई राज्यों को जल और ऊर्जा के क्षेत्र में दीर्घकालिक लाभ मिल सकेगा।
(समाचार एजेंसी IANS के इनपुट के साथ)
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