दिल्ली-एनसीआर समेत पूरे भारत में इन दिनों गर्मी का कहर देखा जा रहा है। उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान से लेकर महाराष्ट्र, तेलंगाना तक तापमान का बढ़ता स्तर देखने को मिल रहा है। इस बीच संयुक्त राष्ट्र (United Nations) की एक एजेंसी ने बीते गुरुवार (28 मई) को एक रिपोर्ट जारी की। इस रिपोर्ट में इस बात की पुष्टि की गई कि अगले पांच सालों में गर्मी से संबंधित और भी रिकॉर्ड टूटने की संभावना है। इसके मुताबिक, इस साल के अंत में अल नीनो आने की संभावना है जिससे 2027 के अधिक गर्म होने की आशंका जन्म लेती है।
यह रिपोर्ट विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) द्वारा जेनेवा में प्रकाशित की गई। रिपोर्ट के मुताबिक ” अगले पांच वर्षों में वैश्विक औसत तापमान के रिकॉर्ड स्तर पर या उसके आसपास बने रहने की संभावना है। 2026-2030 के दौरान वार्षिक वैश्विक औसत सतही तापमान 1850-1900 (औद्योगिक क्रांति से पूर्व) के औसत से 1.3°C से 1.9°C अधिक रहने का अनुमान है। अपडेटेड जानकारी के मुताबिक यह संभावना (86% संभावना) है कि 2026 और 2030 के बीच कोई एक वर्ष 2024 को अब तक के सबसे गर्म वर्ष के रूप में पीछे छोड़ देगा।”
UN की रिपोर्ट में क्या कहा गया?
इस रिपोर्ट में इस्तेमाल किए गए ग्राफिक्स के मुताबिक, भारत का लगभग आधा हिस्सा अगले पांच वर्षों के दौरान पूर्व-औद्योगिक मानक की तुलना में औसत तापमान में उच्च वृद्धि का सामना करने की संभावना रखते हैं। इनमें उत्तर और मध्य, पश्चिम और पूर्व के कुछ हिस्से शामिल हैं।
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के पूर्व महानिदेशक के.जे. रमेश ने कहा कि भारत का आधारभूत तापमान पहले से ही 25 डिग्री सेल्सियस है जबकि वैश्विक औसत 13 से 15 डिग्री सेल्सियस है। इसलिए इस रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के उच्च आधारभूत तापमान में किसी भी प्रकार की वृद्धि जो कि बहुत संभव है। यह भारत के भीतर विशेष रूप से अधिक जोखिम वाले संवेदनशील आबादी के बीच लू के तनाव को काफी बढ़ा देगी।
यूएन एजेंसी द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट के प्रमुख लेखक लियोन हरमनसन के मुताबिक, “2026 के अंत में अल नीनो की भविष्यवाणी की गई है जिससे अगले वर्ष 2027 के अगले रिकॉर्ड तोड़ने वाले वर्ष होने की संभावना बढ़ जाती है।”
बताते चलें कि 2024 में वैश्विक औसत सतह तापमान औद्योगिक क्रांति से पहले के स्तर से लगभग 1.55 डिग्री सेल्सियस अधिक था। 1850-1900 की अवधि को वैश्विक तापमान का आधार माना जाता है क्योंकि इस अवधि के बाद मानव जनित औद्योगिक गतिविधियों ने वैश्विक जलवायु को बदलना शुरू कर दिया था।
पेरिस शिखर सम्मेलन में क्या चर्चा हुई थी?
पेरिस शिखर सम्मेलन 2015 में विभिन्न देशों ने इस बात पर सहमति जताई थी कि औद्योगिक क्रांति से पहले के काल की तुलना में वैश्विक औसत तापमान वृद्धि 1.5 डिग्री सेल्सियस के भीतर रहनी चाहिए ताकि दुनिया सुरक्षित रहे। वैश्विक औसत तापमान बढ़ने का असर विशेष रूप से समुद्र तल के निकट रहने वाले करोड़ों लोगों पर पड़ेगा। भारत की सीमा 11,000 किलोमीटर से अधिक लंबी समुद्री रेखा से साझा होती है। इसके निकट लगभग 25 करोड़ लोग रहते हैं। ऐसे में भारत के लिए तापमान का अधिक बढ़ना चिंता का विषय है। भारत वैश्विक स्तर पर ताप प्रदूषण के प्रमुख केंद्रों में से एक है।
भारत के नौ राज्य समुद्री सीमा साझा करते हैं। इनमें गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल हैं जो अरब सागर से सीमा साझा करते हैं। वहीं, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, पश्चिम बंगाल पूर्वी तट पर बंगाल की खाड़ी से सीमा साझा करते हैं। इनमें गुजरात की तटीय रेखा सबसे लंबी करीब 2,340 किमी है और गोवा समुद्र तट से करीब 194 किमी सीमा साझा करता है।
इस रिपोर्ट में आगे कहा गया कि ” यह संभावना है कि 2026-2030 की पांच-वर्षीय औसत तापमान दर 1850-1900 की औसत तापमान दर से 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक हो जाएगी। अगले पांच वर्षों में किसी भी एक वर्ष में तापमान दर 1850-1900 की औसत तापमान दर से 2 डिग्री सेल्सियस से अधिक होने की संभावना बेहद कम (1% से भी कम) है।”
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संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन (यूएन क्लाइमेट चेंज) के कार्यकारी सचिव साइमन स्टिल ने बुधवार (27 मई) को कहा था कि भारत के बड़े हिस्से पहले से ही भीषण गर्मी की मार झेल रहे हैं, जिसके गंभीर मानवीय और आर्थिक प्रभाव हैं। उन्होंने इसका मुख्य कारण बिगड़ती जलवायु परिवर्तन को बताया था जो बड़े पैमाने पर दुनिया द्वारा भारी मात्रा में कोयला, तेल और गैस जलाने के कारण हो रहा है।

