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कालजयीः प्रेम का स्थगित स्वप्न अर्थात् ‘तीसरी कसम…’ का पुनर्मूल्यांकन

कुछ रचनाएं अपने कथानक और विषयवस्तु से बड़ी हो जाती हैं। वे समय, समाज और मनुष्य की स्मृति में इस तरह बस जाती हैं कि हर पीढ़ी उन्हें अपने ढंग से फिर पढ़ना चाहती है। ऐसी ही कालजयी कहानियों में है- फणीश्वरनाथ रेणु की ‘तीसरी कसम उर्फ़ मारे गए गुलफ़ाम।’ इस कहानी का आकर्षण सात दशकों बाद भी अक्षुण्ण बना हुआ है।

पहली दृष्टि में यह हिरामन और हीराबाई के बीच जन्मे एक असंभव प्रेम की कथा लगती है, लेकिन उसके भीतर लोक-संस्कृति का एक पूरा संसार धड़कता है। यहाँ प्रेम है, पर केवल प्रेम नहीं; यहाँ विरह है, पर केवल विरह नहीं; यहाँ आँचलिकता है, पर केवल अंचल का सौंदर्य नहीं। यह कहानी बदलते समय में लोकजीवन, कला, बाज़ार, सामाजिक नियति और मानवीय संवेदना के जटिल संबंधों को भी उजागर करती है। शायद इसी कारण इसका पुनर्पाठ हमेशा नए अर्थों के द्वार खोलता है। आज हम कालजयी में पढते हैं इस विश्वप्रसिद्ध कहानी पर आलोचक नीरज खरे का लेख। इस पुनर्पाठ में कोशिश है कि ‘तीसरी कसम’ को उसके बहुस्तरीय अर्थ-संसार, कथा-शिल्प और प्रेम की अनकही त्रासदी के संदर्भ में फिर से देखा जाए-

नयी कहानी आंदोलन की किसी आहट के पहले ही फणीश्वरनाथ रेणु कहानियाँ लिख रहे थे। उनकी पहचान का सर्वथा अलग आधार ‘लोक तत्व’ आरंभिक कहानियों में ही थे; वे प्रायः नयी कहानी और उसके उत्तरवर्ती दौर तक कथा यात्रा में मौजूद रहे। ग्राम कथा बनाम आँचलिक कथा की बहुचर्चा और संदर्भों का परिप्रेक्ष्य रेणु की कहानियों के लिए महत्त्व रखता है, पर नयी कहानी में उनकी उपस्थिति निर्मल वर्मा जैसी अलग नज़र आती है। इसके बावजूद कि निर्मल वर्मा की कहानियाँ का परिवेश नगरीय है और कथा बोध का स्तर परस्पर सर्वथा अलग है। नयी कहानी में ‘प्रेम’अनुभव के नए मानवीय धरातल और सामाजिक संदर्भों में दिखायी देता है। ‘परिंदे’ (1957) के कुछ पहले ही रेणु की दो चर्चित प्रेम कहानियाँ ‘रसप्रिया’ (1955) और ‘तीसरी कसम उर्फ़ मारे गए गुलफ़ाम’ (1956) लिखी जा चुकी थीं, पर नयी कहानी के प्रथम पहचानकर्त्ता निर्मल वर्मा ही माने गए! कहानी की संरचना में नएपन की जो बातें ‘परिंदे’ में हैं— वे बेशक अनुभवों को नए स्तरों पर देखती हैं। रेणु के यहाँ नएपन की भिन्नता के लिए कथा सौंदर्य लोकाभिमुख है— अनूठे देशज संसार का कथा में निर्वाह कहानी संरचना में नया प्रस्थान है। ‘आँचलिकता’ के प्रवर्तन का श्रेय वैसे भी उन्हें ही दिया गया है। कहानीकार रेणु की पहचान का पर्याय ‘तीसरी कसम’ है। यह कहानी प्रायः सभी को मोहती रही है। उनके हर मूल्यांकन में इसकी चर्चा ज़रूर रही। इसे फिर से पढ़ते हुए कही जा चुकी उन्हीं चर्चाओं/बातों के दुहराव का अंदेशा बराबर है। तब और ज़्यादा जब आलोचक डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी और कहानीकार अरुण प्रकाश का मुकम्मल लेख मौजूद हो! इस पर बहुत कुछ लिखे-कहे जाने के बावजूद इसका दुर्निवार आकर्षण प्रेरित करता है। बी.एच.यू. में हर वर्ष इसे पढ़ाते हुए कुछ नए विचार मन में आते रहे। कोई ख़ास रचना व्याख्या और मूल्यांकन के लिए हमेशा आमंत्रित करती है। ‘तीसरी कसम’ ऐसी ही विलक्षण कहानी है। इस बहुप्रशंसित कहानी पर पुनर्विचार करते हुए, अगर पूर्व रेखांकित इसकी खूबियों का कुछ दुहराव भी हो जाए तो हर्ज नहीं! इस कहानी के अनेक आलोचना-पाठ हैं। इधर आभासी माध्यमों पर चर्चाएं और बातें भी सामने आयी हैं। उन संदर्भों से सहमति या असहमति के बीच ही कहानी को परखने के कोई नए गवाक्ष खुलते हुए नज़र आ सकते हैं। हिरामन और हीराबाई की इस प्रेम कथा में अनुस्यूत बहुआयामों के साथ ही प्रेम कहानी के सामाजिक संदर्भों तक पहुँचा जा सकता है। कहानी के पुनर्पाठ के साथ इस पर बनी फिल्म भी महत्वपूर्ण है। कई बार कहानी और फिल्म एक दूसरे की पूरक लगने लगती हैं। इन सारे परिप्रेक्ष्यों को ध्यान में रखकर ही यहाँ इस बहुपठित कहानी का पुनर्मूल्यांकन कुछ बिंदुओं के अंतर्गत करना प्रासंगिक होगा—

आँचलिकता की व्याप्ति और यथार्थ दृष्ट

यह कहानी ऐसे समय लिखी गई, जब आज़ाद देश में समय करवट ले रहा था। औद्योगीकरण में नयी गति आ रही थी। ग्राम्य जीवन बदल रहा था। नेहरू युग के मशीनीकरण से औद्योगिक पूँजीवाद के विस्तार को नयी गति मिली। इन परिवर्तनों ने लोक जीवन की पारंपरिकता को अपदस्थ किया। पूंजीवाद का रथ लोक संस्कृतियों को रौंदते हुए बढ़ता है– वह श्रम और कला का शोषक है। समूची बीसवीं सदी में जीवन के आधुनिक परिवर्तनों के साथ विकसित इस तंत्र का रिश्ता जगज़ाहिर है। कथित विकास का जो रास्ता बना और आज तक बनता गया– देश में जो परिवर्तन हुए, खासतौर से आज़ादी के बाद ज़्यादा तेजी के साथ। उनका सीधा आधात पारंपरिक ग्रामीण जीवन या हमारी पारंपरिक जीवन शैली पर पड़ा। आज़ादी के कुछ ही वर्षों बाद साहित्य में आँचलिकता का आगमन इसी वजह माना गया। रेणु की कथा दृष्टि का केंद्र भी यही है। उनकी कहानियों के पात्र जीवन से विदा हो रही जीवन शैली, लोकाचारों, हुनर आदि चीजों के सच्चे वारिस हैं। हिरामन अक्सर ‘जा रे जमाना!’ कह कर उन्हें याद करता है। लोक जीवन की यह अनूठी स्मृति रेणु के कथा संसार में सजीव हुई। सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन से बीत रही वे स्थितियाँ सिर्फ स्मृतिमोह नहीं, रिक्त होती ऐसी जगह है- जिसमें निरंतर बाज़ार अपनी पैठ बनाता रहा है। वैसे तो रेणु ने इसकी गहरी चिंता कई कहानियों में व्यक्त की है, पर ‘तीसरी कसम’में इसका शब्दांकन अनूठा है। इसकी रचना, यथार्थवादी संरचना में सर्वथा मौलिक बदलाव प्रस्तावित करती है। वैसे तो यह प्रस्तावन रेणु की प्रायः हर कहानी कर सकती है, पर ‘तीसरी कसम’उसका सर्वाधिक प्रतिनिधित्व करती है। कायदे से पहली बार यथार्थ से लदी हिंदी कहानी उसके भार से कतिपय मुक्त हुई! बोरों की लदनी ढोने वाली हिरामन की गाड़ी में इस बार कंपनी की औरत हीराबाई जो सवार थी! इसे महज संयोग कहा जाए या इसका लक्ष्यार्थ थोड़ा खींचकर कथा यात्रा में वस्तु निर्वाह से भी जोड़ा जा सकता है! जहाँ कथा के विस्तार में यथार्थ का दबाव नहीं है। वह सधन और केंद्रित नहीं है, पर इसका अर्थ यह नहीं कि कहानी यथार्थ से मुक्त है।

रेणु व्यतीत स्थितियों और लोक संपदा को संजोने-जीने वाले चरित्रों की मार्मिक उपस्थिति कहानियों में दिखाते हैं। आज़ादी के बाद जिस ‘नयी सभ्यता’ ने दस्तक दी थी, उसे रुकना नहीं था– यह स्वयं रेणु भी जानते थे, पर वे उसके आने के कारणों और विकल्पों के विमर्श की ओर ज़्यादा ध्यान नहीं दिलाते। ज़ाहिर है उनके संकेत कथा के ताने-बाने में हैं– आज विकास की जिस जीवन शैली का चरम है, रेणु इस भविष्य को भी जानते होंगे। अतः एक गहरी छटपटाहट उस जीवन से ‘विछोह’ की उनके यहाँ मौज़ूद है। उनके पात्रों की स्वाभिमानी निजता का आत्म प्रतिरोध, पूंजीतंत्र के विरुद्ध खड़ा है। क्या यह स्वयं में ‘यथार्थ’ नहीं? कहानी के बिलकुल आरंभ में ही हिरामन पहली कसम खाकर उस कंट्रोल के जमाने में चोरबाज़ारी का हिस्सा बनने से अपने को अलग कर लेता है। कहानी में समय बिल्कुल आरंभ में ही दर्ज़ है। हालांकि, उसने विपत्ति में पड़कर तात्कालिक सूझी चतुराई से गाड़ी वहीं छोड़, अपना और बैलों का बचाव किया था। लेकिन, बाद में ईमान के रास्ते चलने को ही वह श्रेष्ठ मानता है। उसने घाटा सह कर भी भाड़ा ढोने के लिए आधीदारी पर बैलों को जोता। फिर वह काम भी छोड़ा- बाँस की लदनी से तौबा कर दूसरी कसम खायी! वह सरकस कंपनी के बाध को ढोने से मिली कमाई से फिर नई गाड़ी हासिल करता है। हिरामन ऐसा कर्मठ है। अपने बैलों और गाड़ीवानी से अगाध प्रेम करने वाला। ‘और सब-कुछ छूट जाय, गाड़ीवानी नहीं छोड़ सकता हिरामन!’ आरंभिक दोनों कसमें उसके नैतिक चरित्र को जानने का मजबूत आधार देती हैं। उनके यहाँ यथार्थ की अनुपस्थिति देखने वालों को इन सारे संदर्भों पर ज़रूर ग़ौर करना चाहिए।

रेणु के कथा साहित्य में ‘आँचलिकता’ बहुख्यात है। उनकी अन्य सभी कहानियों से ‘तीसरी कसम’ में आँचलिकता की व्याप्ति और सघनता सर्वाधिक है। उसे रेणु के रचनात्मक सरोकारों और आँचलिक सौंदर्य बोध का समग्र रूपक माना जा सकता है। इसमें आँचलिक उपादानों की श्रृंखला है— बैलगाड़ी और बैलों से हिरामन का आत्मीय रिश्ता, लोक कथा, लोक विश्वास, लोक नृत्य, लोकगीत, लोक नाट्य, प्रकृति, पर्व, विस्मृत हो चुके लोक व्यवहार के आत्मतीय वार्तालाप। उस जीवन की बोली-बानी के लुप्त हो गए शब्दों की बसाहट तो एक बात है। इसके अलावा इन्हें जोड़ने वाली महत्त्वपूर्ण कड़ी अंचल का रूपक ‘मेला’— जो स्वयं में लोक जीवन की अनेक शिल्पकालाओं, चित्रकारी, दस्तकारी से निर्मित अनेक वस्तुओं की मौजूदगी के साथ, गायन-वादन-नृत्य से मोहता था। कठपुतली, बंदर-भालू के नाच, जादू आदि के खेल-तमाशे भी उसका हिस्सा होते थे। कहानी में ‘नौटंकी’ मेले का अहम हिस्सा है। इससे अधिक इन कलाओं और हुनर को जीने वाले हिरामन और हीराबाई अविस्मृत कलाकार युग्म हैं— जिनकी यह कहानी है। हीराबाई पेशेवर-ख्यात कलाकार— नौटंकी की विद्या में पारंगत है। नौटंकी का बरास्ते मेला, बाज़ार से क्या रिश्ता है? यह हीराबाई के एक कंपनी से दूसरी के मंच या बैनर पर काम करने से समझना चाहिए। कहानी में हीराबाई के लिए ‘कंपनी की औरत’ का कई बार जिक्र अकारण नहीं आता! इसमें कला पर हावी बाज़ार के ब्रांड की ध्वनि है। हालांकि यह ध्वनि आज पसर रही कॉरपोरेट संस्कृति और भूमंडलीय बाज़ारवाद की भयावहता में बेहद सीमित लग सकती है, लेकिन इस यथार्थ की अर्थवत्ता को कहानी किसी अतिरिक्त कोशिश के व्यक्त कर देती है। हिरामन पेशे से गाड़ीवान है, पर अपने अंतरमन से जमीनी लोक कलाकार– उसे इस रूप में शायद कोई नहीं जानता। उसके कलाकार मन को ही नहीं, उसके व्यक्तित्व के ‘हीरा’ रूप को पहली बार हीराबाई ने ही परखा है। कलाएं व्यक्ति को निर्मल, संवेदनशील और नेक बनाती हैं- इसके प्रतिरूप यों तो दोनों पात्र हैं, पर हीराबाई की कला बाजार और व्यवसाय को भलीभांति जानती ही नहीं उसके अधीन है। हिरामन की कला को बाज़ार यानी पेशे ने छुआ भी नहीं है। इसलिए कला उसके व्यक्तित्व से अनायास लिपटी है। रेणु ने लिखा है– ‘कहाँ हीरामन और कहाँ हीराबाई! बहुत फ़र्क है!’ दरअसल कहानी का सौंदर्य और मार्मिकता इसी फ़र्क में है, पर दोनों का कला साधक के रूप में मेल होना- उनको जोड़ने वाली बेहद ज़रूरी कड़ी है।

सामाजिक नियति के बीच प्रेम का पलता स्वप्ही

राबाई के जीवन में नियति का न जाने कौन सा अध्याय है? जिसके कारण उसने अपनी कला को बाज़ार के हवाले किया! कहानी में इसका बहुत खुलासा नहीं है, पर वह स्वतः स्पष्ट भी है और संकेत आखिर में है। विदा लेती हीराबाई हिरामन से कहती है— ”तुम्हारा जी बहुत छोटा हो गया है। क्यों मीता ?….महुआ घटवारिन को सौदागर ने खरीद जो लिया है, गुरु जी!” यह कथन एक ओर महुआ घटवारिन की लोक कथा का मुख्य कथा में अंतर्व्याप्त होने का सूचक है, तो दूसरी ओर हीराबाई द्वारा प्रेम की प्रतीति और प्रेम के स्थगित छोड़ जाने की लाचारी का भी। भइया के निषेध पर मीता-उस्ताद-गुरु जी जैसे प्रियकर संबोधनों की यात्रा करता संबंध कंधे पर हाथ रखने से व्यक्त का आलंबन बना था। पहली बार बाएं कंधे पर हाथ रखा गया था, जिससे एक अजानी सुगंध उसके कंधें में बसी रह गई थी— ‘बाएं’ का उल्लेख तो नहीं है, जाहिर है बाद में ‘दाएं’ के जिक्र से स्पष्ट हो जाता है कि पहले बाएं पर रखा गया था। विदा होते वक्त हिरामन की मनोदशा को वह भलीभांति जान रही है, इसलिए ‘इस बार दाहिने कंधे पर’हाथ रखती है। यह उल्लेख सकारण है। रूठे हुए हिरामन के लिए समझाइश और सांत्वना का स्पर्श है— प्रेम का स्वीकार और विदा लेने की विवशता का भी। हीरादेवी ने सामंती समाज द्वारा दिए गए अपमान और लाचारी को सहा है। यह पक्ष कहानी में कम, उस पर निर्मित शैलेंद्र की बेहतरीन फिल्म कृति में ज़्यादा है। हीराबाई के स्त्री जीवन के विडंबनात्मक पक्ष को कहानी संकेत मात्र करती है, वहीं फिल्म में सामंत के रूप में इफ़्तार द्वारा निभाए चरित्र से उसके जीवन संधर्ष का यह अध्याय खुलता है। दौलत के भरोसे झूठे प्रेम की वासनाओं से उसका सौदा करने वाले उसे जीवन में बहुत मिले हैं। उसके मन से बतियाकर सच्चा प्रेम करने वाला कोई नहीं! सामंती समाज के तिरस्कार और वेश्या, रंडी, पतुरिया, बेड़िनी या बाई जैसे अपमानजनक संबोधनों को सुनकर ही हीरा जैसी स्त्रियाँ रहती हैं। उसके लिए दांपत्य की दबी हुई आकांक्षा तो स्वप्न मात्र है।

बहुत पहले बचपन में ही हिरामन की शादी हुई थी, गौने के पहले ही दुलहिन नहीं रही। इसके बावजूद कि उस समय बालविवाह के विरोध में लड़का-लड़की की उचित उम्र पर विवाह के लिए ‘शारदा कानून’ बनाया गया था। इसका जिक्र करके कहानीकार इस कानून की जमीनी हक़ीक़त भी दर्ज़ करते हैं। रेणु अपने नायक का परिचय कराते हैं, वहीं दूसरी शादी न होने के कारण हिरामन गिनाता है– “…भाभी की ज़िद, कुमारी लड़की से ही हिरामन की शादी करवाएगी। कुमारी का मतलब हुआ पाँच-सात साल की लड़की। कौन मानता है सरधा कानून?” बहरहाल, विधुर हिरामन के जीवन में दांपत्य की कामना अधूरी है। कम से कम उसकी सामाजिक वर्गीयता के चलते हीरा जैसी रूपवती, संपन्न और सिनेमा की ख्यातिप्राप्त तारिकाओं जैसी स्त्री से प्रेम करना और पाना स्वप्न है। हिरामन के अवचेतन में तो हीराबाई ‘हू-ब-हू महुआ घटवारिन’है– उसके प्रेम की परतीत (प्रतीति) कथा गायन में व्यक्त होती है। नॅरेट किए इस अंश पर गौर करें– “इस बार लगता है महुआ ने अपने को पकड़ा दिया। खुद ही पकड़ में आ गई है। उसने महुआ को छू लिया है, पा लिया है। उसकी थकन दूर हो गई है। पंद्रह-बीस साल तक उमड़ती हुई नदी की उलटी धारा में तैरते हुए उसके मन को किनारा मिल गया। आनंद के आँसू कोई रोक नहीं मानते…” कथा में यह अवसर प्रेमोत्पत्ति का मार्मिक क्षण है। लिखा है- “उसने हीराबाई से अपनी गीली आँखें चुराने की कोशिश की। किंतु हीरा तो उसके मन में बैठी न जाने कब से सब-कुछ देख रही थी।”प्रेम की पलती इस आकांक्षा में हीरा भी लंबी साँस लेते हुए तादात्म अनुभव करती है— “तुम तो उस्ताद हो, मीता!”

इसके बावजूद कि हिरामन और हीराबाई दो सर्वथा अलग संसार के पात्र हैं, जहाँ ‘प्रेम’ या कम से कम उसकी कोई सामाजिक परिणति सहज संभव नहीं। हिरामन उस संभव का केवल सपना देख सकता है। प्रेम की यह असंभव आकांक्षा, बैलगाड़ी की यात्रा में अवसर आते ही आकार लेना चाहती है। दो कलाकारों के जीवन संधर्ष और नियति के अवरोध, यात्रा में अनुभूत इस प्रेम का कोई स्पष्ट साझा रूप नहीं बनने देते। लेकिन, उसकी प्रतीति दोनों को है और उसके चिह्न कथा व्यापार में बराबर मौजूद हैं। प्रेम की यह प्रतीति हीराबाई की बनिस्बत हिरामन को कहीं ज़्यादा है। प्रायः ‘तीसरी कसम’ हिरामन की प्रेम कहानी मानी गई है। शीर्षक भी यही समर्थन करता है। प्रेम दंश हिरामन को लगा है, पर हीराबाई भी कम विचलित नहीं है। फिर यह हिरामन के एकतरफा प्रेम या आसक्ति की कहानी कैसे कही जाएगी? कुछ ऐसी ही व्याख्या और विवेचना आलोचक संजीव कुमार से सोशल माध्यम पर सुनने को मिली! ऐसी धारणा बनाने का स्पेस कहानी नहीं देती। कथा में हिरामन की चारित्रिक उपस्थिति को देखते हुए देहाकांक्षा तो उसे दूर तक स्पर्श नहीं करती, जो ‘प्रेम’ के निर्मल समर्पण के विरुद्ध ‘आसक्ति’ का मूलाधार है। यह ठीक है कि पीठ में गुदगुदी हिरामन को लगती है, चंपा की महक उसे महसूस होती है, परी की छवि उसके जेहन में उतरती है और तीसरी कसम वही खाता है। कहानी का नॅरेट बिंदु हिरामन है और अनुभवबोध उसी के माध्यम से पाठक को प्राप्त होता है। लेकिन उसमें आसक्ति का भाव नहीं है। प्रेम और आसक्ति के फ़र्क को जानने की पूरी संभावना कथा पाठ में ही मौजूद है। हालांकि हीराबाई की प्रेम प्रतीति को कहानी कम ही खोलती है पर जितना संकेत कर देती है, उनको नजरंदाज नहीं किया जा सकता। बेशक हिरामन से हीराबाई कहीं दुनियादार और व्यवहारिक बुद्धि की है। वह नौटंकी का ऑफर मिलने पर रातोंरात कंपनियां बदलती है। कंपनी बदलने के लिए ही तो वह हिरामन की गाड़ी में बैठी थी। कहानी में यह पूरा पक्ष रहस्य की तरह छिपा है, हीराबाई द्वारा यह करने की लाचारी भी छिपी है। हीराबाई सौदागरी या बाज़ार की व्यवस्था के पीछे-पीछे चलती है। रेणु ने उस व्यवस्था का प्रतीक ‘बक्सा ढोनेवाले आदमी’ के रूप में प्रस्तुत किया है। वह कंपनियों से हीराबाई का सौदा तय करने वाला ऐजेंट जैसा है। और, हिरामन और हीराबाई के बीच खलनायक की तरह बाधक— जैसे लोक कथा में सौदागर। महुआ घटवारिन की लोककथा— मूल कथा को काफी हद तक व्याप्ति देती है, पर अंत में कहानी उससे किनारा कर लेती है। फिर हीराबाई महुआ घटवारिन नहीं रह जाती, उसमें सौदागरी व्यवस्था से मुक्ति की वैसी छटपटाहट नहीं है। हिरामन सौदागर का नौकर भी नहीं रह जाता, उसका प्रेम भी सौदागर के नौकर की भांति यकायक एकतरफा ही उदीप्त नहीं है। महुआ घटवारिन नौकर की प्रेमाकांक्षा से अनजान थी— हीराबाई, हिरामन के प्रेमाभाव से कम से कम अनजान नहीं है।

हिरामन की ओर से प्रेम-प्रतीति की अधिकता है। वह उसके लिए भी अविश्वसनीय है, पर उसे जीवन में अधूरे बल्कि अघटित दांपत्य के कई स्वप्न चित्रों में मिलती है— जिनमें हीराबाई की छवि आ लगी है। ‘लाली-लाली डोलिया’ प्रसंग ‘दांपत्य स्वप्न’ का मुख्य केंद्र समझा जा सकता है। वैसे वह आता है फारबिसगंज पहुँच कर गाड़ी को तिरपाल से घेरते वक्त भी। मेले में अपनी कमाई की थैली सौंपते वक्त भी वह अहसास मौजूद है। यही थैली अंत में हीराबाई के हिरामन से मिलने का सबब भी बनती है। लेकिन, क्या लौटती हुई हीराबाई थैली लौटाने के लिए ही मिलने को बेचैन थी? हिरामन उससे मिलने भागा-भागा आया था, थैली की बात तो दूर तक उसके ख्याल में नहीं थी। वैसे भी पैसों-रुपयों के लेन-देन पर तो उसे हमेशा तकलीफ होती है। लेकिन थैली प्रकरण को दांपत्य-स्वप्न के स्वीकार्य और विघटन के प्रतीक रूप में भी देखना चाहिए। पुराने रिवाज़ के मुताबिक पुरुष अपनी कमायी अपनी स्त्री को सौंपता है, उससे लेता नहीं है। बहरहाल, दांपत्य की यह झलक पहली बार शुरूआत में नामलगर ड्यौढ़ी के जमाने से जुड़ी निजंधरी कथा (इसे जनश्रुति या दंतकथा भी माना जा सकता है, जिसे हिरामन ने हैफवाली कहानी कहा है) का प्रसंग सुनाते बीच में कौंधता है– “हीराबाई ने अपनी ओढ़नी ठीक कर ली। तब हिरामन को लगा कि… लगा कि…” इस ‘लगा कि’का अर्थ पाठकों को समझने के लिए छोड़ रखा है। यहीं भर नहीं कहानी में इस तरह के अंतराल ‘….’ कई जगह छोड़ कर हिरामन की प्रतीति का बारंबार संकेत है– जैसे एक जगह लिखा गया है– ‘उसकी सवारी… उसकी सवारी!’– इस तरह की आवृत्ति, अंतरालों और कहीं भाषा चिह्नों के ख़ास मूक ध्वन्यार्थ हैं। बहरहाल यह हैफवाली कथा सुनाने के बाद ही हिरामन के भीतर सतरंगा छाता धीरे-धीरे खुलता है। ‘उसको लगता है, उसकी गाड़ी पर देवकुल की औरत सवार है।’कथा प्रसंग से उभरी यह छवि जल्दी ही चुक जाती है। हिरामन की प्रतीति को दूर तक ले जाती है– महुआ घटवारिन की छवि ही। जब यह दूसरी अधिक व्याप्त कथा भी अंत में अपर्याप्त हो जाती है तो नौटंकी के गुलबदन और गुलफ़ाम का एक और तीसरा किस्सा भी मामूली स्पर्श करता है, पर वह हिरामन की नियति जानने के लिए महत्त्वपूर्ण है— जो शीर्षक के ‘…उर्फ़ मारे गए गुलफ़ाम’में ही त्रास के रूप में ध्वनित है। जैसे स्वप्न भंग होने पर दिखती सच्चाई– करुणा और त्रास से समन्वित, जो हिरामन को अकेला और उसकी स्मृति में कसक छोड़ जाती है।

भारतीय कथा परंपरा की पुनर्रचना

देर रात से अगले दिनभर और लगभग सांझ तक की यात्रा के दरम्यान हीराबाई का हिरामन से अत्यंत आत्मीय होना– क्या यात्रा में अकेली स्त्री द्वारा हिरामन का इस्तेमाल ‘सुरक्षा कवच’ की तरह मानना चाहिए? वर्तमान साहित्य : शताब्दी कथा विशेषांक, जनवरी-फरवरी 2000 में प्रकाशित अरुण प्रकाश के मूल्यांकन में कुछ इसी तरह का उल्लेख ग़ौरतलब है, जिसकी व्याख्या का स्पेस कहानी एक सीमा में ही देती है। अगर यह हीराबाई के मन में किंचित रहा भी होगा तो उस जमाने में स्त्री को यात्रा में भयवश, पुरुष गाड़ीवान से यह अपेक्षा स्वाभाविक है। जब उसने हिरामन को परखा और उसके मन की भावनाओं को महसूस भी किया, फिर उसे अपनी सुरक्षा का ही स्वार्थ नहीं कहा जा सकता। यह अलग है कि वह हिरामन के स्वप्न और चेतना में अवतरित बिंब-रूपकों को कितना जान रही है? हिरामन का स्वप्न तो महुआ घटवारिन की कथा गायन का साधक हाने से उसके मन में पहले से ही था! हीराबाई का रूप सौंदर्य और आत्मीयता उस स्वप्न की आलंबन बन जाती है। इसी अर्थ में कहानी प्रेम की नायक पक्षीय प्रतीति को भारतीय लोक की मध्यकालीन कथा परंपरा के प्रभाव से जोड़ती है। नायिका को देखते ही नायक का मूर्छित हो जाना लोक कथाओं पर लिखे सूफी आख्यानों की पहचान है। हिरामन की बैलगाड़ी में रह-रह कर चंपा का फूल खिल जाता है। उसके पहले ही उसे सबकुछ ‘अजगुत-अजगुत’प्रतीत हो रहा है। लेकिन हिरामन की मूर्छा यथार्थ है और उसका प्रमुख बिंदु यहाँ घटित होता है– “हिरामन की सवारी ने करवट ली। चाँदनी पूरे मुखड़े पर पड़ी तो हिरामन चीखते-चीखते रुक गया– अरे बाप! ई तॅ परी है!” गंध-ध्वनि-रूप और उसके लोक ज्ञान पर आधारित बिंबों के क्रम में हीराबाई अलग-अलग छवियों में मौजूद है– चंपा का फूल, फेनुगिलासी बोली, तंबाखू बेचने वाली बूढ़ी, डाकिन-पिशाचिन, परी, देवकुल की औरत, महुआ घटवारिन और कुछ हद तक गुलबदन। यहाँ तक कि वह छोकरा नाच के मनुआँ-नटुआ में भी हीराबाई की छवि को याद करता है। लगता है रेणु अपने कथाकार व्यक्ति का लोप करके हीरामन के भीतर पैठ गए हैं। वे हिरामन के पल-पल बदल रहे ‘मन’को ध्यान से गुनते हैं। कथाकार की तरह कभी अलग दिखते भी हैं तो उसके अत्यंत आत्मीय मित्र की तरह। इसीलिए कहानी कहन में कई प्रभावों को स्वीकार करके भी अपना असाधारण रूप लेती है और नए कथा शिल्प का प्रस्तावन करती है।

ख़ास बात यह कि ‘नौटंकी में नाचने वाली’ पर नाक-भौं सिकोड़ने वाले लोगों से हिरामन की भाव-छवियाँ बिलकुल अलग हैं। उसके मन में सच्ची छवि स्त्री के प्रति बेहद सम्मान की है– वह प्रेमाभास भी है– इसका उसे खुद ठीक से अहसास नहीं! बल्कि, एक जगह वह अपना कुछ भ्रम दूर भी कर लेता है– “हीराबाई गाड़ी से नीचे उतरी। हिरामन का कलेजा धड़क उठा… नहीं, नहीं! पाँव सीधे हैं, टेढ़े नहीं। लेकिन, तलुआ इतना लाल क्यों है? हीराबाई घाट की ओर चली गयी, गाँव की बहू-बेटी की तरह सिर नीचा करके धीरे-धीरे। कौन कहेगा कि कंपनी की औरत है!… औरत नहीं, लड़की। शायद कुमारी ही है।” हिरामन की चेतना पर घटित सारे बिंब- क्षण-क्षण रूपक धरते हुए और भाषायी संगीत के बहाव में रेणु अपनी ‘कथा-परंपरा’को पुनः आविष्कृत करते हैं। फ़र्क यह कि ‘तीसरी कसम’गाड़ीवान और नौटंकी की अदाकारा की प्रेम कथा है- किसी राज्य के राजा या राजकुमार और दूर देश की राजकुमारी की नहीं! हालांकि, वह हिरामन के ‘मुलुक की जनाना’ नहीं, ‘पच्छिम की औरत’ है। यही नहीं लोक कथाओं को अनुस्यूत करते हुए, यहाँ रेणु पश्चिमी कहानी के किसी भी प्रभाव के इंकार पर अपना देशज मुहावरा प्रस्तुत कर रहे हैं। संरचना की दृष्टि से कमोबेश तीन लोक कथाओं का मूल ध्येयार्थ कथा से स्पर्श, उसमें अर्थ व्याप्ति की नयी कौंध और सौंदर्य में नायाब रंग छोड़ता है। कमलेश्वर की ‘राजा निरबंसिया’ (1956) के समानांतर लोक कथा शिल्प से भी यह बिल्कुल अलग है। नयी कहानी में रेणु इसलिए भी सर्वथा अलग और नए हुए। प्रेमचंद ने यूरोपीय यथार्थवादी कथा पद्धति द्वारा कहानी के लिए मुकम्मल रास्ता प्रशस्त किया, पर रेणु ने उस रास्ते का अनुकरण नहीं किया। प्रेमचंद के ही जमीनी परिवेश पर उन्होंने लोक तत्वों के भरोसे कहानी का यूरोकेंद्रिक मुहावरा बदला। लोक कथाओं की प्रतीकात्मक शक्ति कहानी को समृद्ध और विश्वसनीय बना सकती है– रेणु ने यह ‘तीसरी कसम’ लिख कर सिद्ध कर दिया।

कहानी और फिल्म

रेणु ने मध्यकालीन स्वप्नजन्य प्रेम की रूढ़ि पर कहानी नहीं लिखी– उनके शिल्प की गद्यात्मक पुनर्रचना की, ऐसा गद्य जिसमें कविता की संगीतिक लय है। वस्तु, भाषा और ग्राम्य बर्ताव के चलते कहानी में स्वयं एक मेला बसा है। मध्यकालीन कथा काव्यों के नायक प्रेम की सच्ची लगन से अपनी प्रेमिकाओं को पा लेते थे। नायकों का समर्पण देख नयिकाएं भी उनसे प्रेम करती थीं। हिरामन-हीराबाई की कहानी ठेठ जीवन यथार्थ की कहानी है— अलौकिक-काल्पनिक रोमांस कथा नहीं। हीराबाई, हिरामन के रूप पर नहीं वफादारी की ओर झुकी उसकी सादगी, समर्पित कला और उसके मानवीय गुणों पर मुग्ध थी— ‘हीराबाई ने हिरामन जैसा निश्छल आदमी बहुत कम देखा है।’ अगर उसे हिरामन से किनारा करना होता तो अपने देश की कंपनी में लौटते हुए उसे न्यौता ही क्यों देती– ‘बनैली मेला आओगे न?’ यह कह कर जाती हुई हीराबाई ने एक झीनी सी संभावना छोड़ दी है! फिल्म ‘तीसरी कसम’ मूल कहानी के पूरक पक्ष को उभारती है— हीराबाई पक्षीय प्रेम को भी उसकी पटकथा भरसक उभारने का जतन करती है। लेकिन, बंबाइया सूत्रीकरण के लिए किसी शर्त पर समझौता न करके रचना की आत्मा को बचाए रखती है। इसका तथ्यात्मक उल्लेख रेणु रचनावली-5 में संकलित उनके लिखे ‘तीसरी कसम को जानबूझ कर फेल किया गया था’ नामक एक संस्मरणात्मक निबंध में मौजूद है।

फिल्म: कहानी के संवेदनात्मक पक्ष और उसके संकेतों को न सिर्फ विस्तार देती है, बल्कि उन पर पर्याप्त रोशनी भी डालती है। कहानी और फिल्म द्वारा पाठक और दर्शक की ज़रूरी युति बनने से साहित्य और सिनेमा का साहचर्य भी परिभाषित हो जाता है। हालांकि आस्वाद की दृष्टि से ‘कहानी’ और ‘फिल्म’ अपने-अपने माध्यम में बेजोड़ हैं। अगर किसी को कहानी पढ़कर कोई सवाल, धारणा या आशंका मन में रह जाए, तो उसकी आधारहीन व्याख्याओं के पहले फिल्म भी देख लेना चाहिए। कारण यह कि फिल्म, कहानी के छिपे हुए मंतव्यों को बिना बंबइया हुए खोलने का जतन करती है। वैसे तो इस फिल्म के बनने की अपनी एक कहानी है, पर फिल्म के बंबइयाकरण के प्रसंग में उल्लेखनीय यह है कि फिल्म के फाइनेंसर अंत में हिरामन और हीराबाई को मिला देना चाहते थे। शैलेंद्र कर्ज में डूबे थे, लेकिन फिल्म का अंत बदलने के लिए किसी हालत में तैयार नहीं थे। साथ ही फिल्म कृति से संतुष्ट होते हुए लेखक के तौर पर रेणु भी उसकी सस्ती लोकप्रियता और व्यवसायिकता के लिए किसी शर्त पर परिवर्तन के पक्ष में नहीं थे।

कहानी और फिल्म का अंत मार्मिक और त्रास से भरा है, हिरामन का हाल यह है कि जैसे भावना के अतिरेक में निःशब्द होना! कहानी से फिल्म पटकथा के आखिरी दृश्यों के संवादों में मामूली परिवर्तन ही है। हिरामन-हीराबाई का वार्तालाप और अंत का विदाई क्षण दोनों के प्रेम की अनकही स्वीकारोक्ति के लिए बहुत कुछ कहते हैं। लेकिन, उसके पहले फारबिसगंज पहुँच कर यात्रा समाप्ति पर प्रेमानुभव का मार्मिक अवसर ख़ासतौर से ग़ौर किया जाना चाहिए– जहाँ प्रेम के छूटने या स्थगित रह जाने की पूर्वपीठिका पहले ही बन गई थी! यह क्षण फिल्म से अधिक कहानी में बेहतर है। कंधे पर हाथ रखने के पहले-पहले आत्मीय स्पर्श से हिरामन अत्यंत भाव से भरा है। यह कथा सुनाने के बाद तुरंत ही दूसरी स्थिति है जब हिरामन की आँखें भर आयी हैं— “सामने फारबिसगंज की रोशनी झिलमिला रही है। शहर से कुछ दूर हटकर मेले की रोशनी… टप्पर में लगते लालटेन की रोशनी में छाया नाचती है आस-पास।… डबडबाई आँखों से, हर रोशनी सूरजमुखी फूल की तरह दिखायी पड़ती है।” आँसू भरी आँखों से किसी रोशनी को देखने का यह सूरजमुखी बिंब हिरामन की मनोदशा का भावार्थ करता है— यात्रा पूरी हुई कि अब हीराबाई उसे छोड़ चली जाएगी। यहीं हिरामन के चार अन्य साथियों के मिलने के रोचक प्रसंग हैं और नौटंकी और उसमें काम करने वाली स्त्री को लेकर समाज की वर्जनाएं ख़ासतौर से रेखांकित हैं। यहीं बक्सा ढोने वाला आदमी प्रगट होकर हिरामन के भाव और स्वप्न को भंग कर देता है— “हीरामन को लगा, किसी ने आसमान से गिरा दिया। किसी ने क्यों, इस बक्सा ढोने वाले आदमी ने।” यहाँ के वार्तालाप और स्थिति— आखिरी विदाई दृश्य से मेल खाती है। चुप खड़े हिरामन का बोल रेणु सुनाते हैं— “कंपनी की औरत कंपनी में जा रही है। हिरामन का क्या!” जाती हुई हीराबाई बैलों को संबोधित करके कहती है— “अच्छा मैं चली भैयन्!” ज़ाहिर है यह विदा कथन बैलों के मार्फ़त हिरामन के लिए है। कथा में बैल हिरामन के बेहद आत्मीय और उसकी जीवन गाथा के सच्चे साथी हैं। रेणु ने उन्हें पात्रों की तरह प्रस्तुत किया है। वे उसके प्रेम के भी साक्षी हैं। अंत में हिरामन ने अपनी मनोदशा दोनों बैलों को झिड़कते, दुआली से मारते हुए ही आत्मसंबोधित की है— “रेलवे-लाइन की ओर उलट-उलट कर क्या देखते हो?”

लंबी कथा योजना और पाठ का सम्मोह

वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी के विशद मूल्यांकन में इस कहानी पर अत्यंत सार्थक विचार मौजूद हैं। उनका यह दृष्टि संपन्न लेख ‘कुछ कहानियाँ: कुछ विचार’ पुस्तक में ‘रेणु की कहानी तीसरी कसम’ शीर्षक से संकलित है। उनके मूल्यांकन से अनेक सहमतियों के बीच एकाधिक जगह तादात्म बनाना मुश्किल होता है। उन्होंने इसकी कथा-योजना को बिखरी और औपन्यासिक कहा है। वे फारबिसगंज मेले पहुँचकर यात्रा समाप्ति तक ही कहानी के वृतांत को पर्याप्त मानते हैं और उसके आगे के हिस्से को वस्तुगत विकास और पात्रों के चारित्रिक विकास की दृष्टि से खास नहीं मानते। औपन्यासिक तो एक सीमा तक कहा भी जा सकता है। बेशक यह लंबी कहानी का शिल्प समेटे है, पर आंतरिक बनक, कथा व्यापार की घटित कालावधि और संवेदना के मार्मिक बिंदुओं— दो कसमों के बाद तीसरी कसम तक किस्सा बकायदे कसा है। बीच में एक-दूसरे से कतिपय असंबद्ध कई कथा खंड हैं, अत्यंत आत्मीयता से रचे गए दृश्य हैं। इनसे जो कतिपय विस्तार दिखता है— वह कथा यात्रा में आए पड़ावों की तरह है। यह सब अंत में एक खास कथा प्रयोजन को फलित करता है, इसलिए बिखराव नहीं कहा जा सकता। बेशक कहानी के दो हिस्से हैं— पहला वृत्त बैलगाड़ी की यात्रा फारबिसगंज पहुँचने पर पूरा हो जाता है। यहाँ पर कहानी के अंत का पूर्वाभास भी मिल जाता है। इस हिस्से में हिरामन की कलाकार छवि और चरित्र भी सामने आ चुका है। हीराबाई की स्त्री छवि को बेहद सम्मान देता हिरामन दूसरे हिस्से में पेशे के कारण उसका अपमान होने से आहत होता है। यहाँ तक कि नौटंकी प्रदर्शन के दौरान वह झगड़ कर विरोध भी करता है। कहानी सिर्फ चरित्र विकास के पारंपरिक रूप में नहीं है— यों हिरामन का यह नायक पक्षीय विरोध दूसरे वृत्त में आकर ही उसके चरित्र में नयी कड़ी जोड़ता है।

इससे अधिक यह हिस्सा हीराबाई की उपस्थिति और उसकी कला के प्रत्यक्षीकरण की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। यहीं हिरामन उसकी कला का साक्षी होने के साथ, उसकी सामाजिक स्थिति से बेचैनी भी अनुभव करता है। पहले हिस्से में उसकी कला के बारे में सिर्फ पता ही चलता है। कला के नज़रिए से पहला हिस्सा हिरामन का है और दूसरा हीराबाई का। पहले हिस्से में हीरा मुग्ध हो हिरामन की बातों और कथा-गायन को सुनती है। दूसरे में हिरामन, हीरा की कला का मूक और हत्प्रभ दर्शक है। इस पक्ष को भी फिल्म में गीतों के माध्यम से बेहतर उभारा गया है। पहले हिस्से में हीराबाई की आँखें हिरामन को मुग्ध होकर ‘गुजुर-गुजुर’हेरती हैं, दूसरे में वह कपड़घर के दरवान के मार्फ़त ‘यह मेरा हिरामन है’— कहने का हक रखती है। नौटंकी के पास देकर नाच देखने आमंत्रित करना– सिर्फ सुरक्षित यात्रा के एवज में कृतज्ञता ज्ञापन ही नहीं है। पहला हिस्सा यात्रा समाप्ति पर बक्सा ढोने वाले के आते ही हिरामन के स्वप्न टूटने का है। दूसरा हिस्सा संभावित प्रेम की जैसे उम्मीद टूटने का सच है— कान पकड़ कर तीसरी कसम खाने या तौबा करने जैसा! कहानी अपने रचे सभी सौंदर्यमूलक उपादान और मार्मिक क्षणों को, अंत करने की कला (सेंस ऑफ एंडिग) से रूपायित करती हैं। यह सब इतनी सुरुचि और कलात्मकता से संभव हुआ है कि कहानीकार का नॅरेटर कम से कम सामने आए बिना, किस्सागोई की नवीन प्रविधि और भाषा के समन्वित प्रभाव का सम्मोहन एक साथ साध लेता है।

सामाजिक अकेलेपन को झेलते पात्र

‘तीसरी कसम’ के पात्रों की वर्गीयता प्रेमचंद के कथा पात्रों से अलग नहीं है— पीड़ा उन पात्रों की भी है पर प्रेम की मार्मिकता, उल्लास और करुणा में बहुत नीचे दबी है। रेणु के पात्र कला और संवेदना के वाहक हैं। वे प्रायः श्रमजीवी हैं। अपने हुनर, पेशे या लोक कला से प्रतिबद्ध होकर जीते हैं। ‘पहलवान की ढोलक’, ‘रसूल मिसतिरी’, ‘रसप्रिया’, ‘ठेस’ आदि कहानियों के पात्रों की भी सामाजिक विषमता, पीड़ा, अन्याय और शोषण को रेणु अव्यक्त रखते हैं, पर वह कहानी में कैसे अंतर्भुक्त है— इसे प्रायः अनदेखा किया जाता रहा। सभी कहानियों की चर्चा का यहाँ अवसर नहीं है। ‘तीसरी कसम’ को अनूठी प्रेमकथा में ही नहीं, हिरामन और हीराबाई की उपस्थिति को अपनी-अपनी सामाजिक हैसियत में भी देखना चाहिए। जहाँ दोनों ‘प्रेम’ से वंचित अकेले है। ‘नयी कहानी’ की बहुतेरी कहानियों में अकेलेपन की नियति को रचनात्मक अभिधान के रूप में अपनाया गया था। हिरामन और हीराबाई के अपने-अपने अकेलपन से बाहर आने और उन क्षणों का मार्मिक अंकन रेणु ने किया। दोनों ने अकेलेपन के आधातों से खुद को अपनी कला और पेशे के बूते ही बचा रखा था। ‘तीसरी कसम’ के पात्रों का अकेलापन ठेठ भारतीय सामाज से उद्भूत है— उनके जीवन संधर्षों की उपज है। इसलिए उनका अकेलापन ओढ़ा-आयातित या कम से कम आत्मधातक और अवास्तविक नहीं है। पता नहीं नयी कहानी के अकेलेपन की व्याख्याओं में यह अकेलापन ठीक से रेखांकित क्यों नहीं हुआ? कथा के लोकप्रिय पाठ के चलते, प्रायः इस अकेलेपन के त्रासद सामाजिक आशय नज़रंदाज रहे।

अंत में खाली गाड़ी लिए हिरामन लौट रहा है। रेणु ने लिखा है— “मरे हुए मुहूर्तों की गूँगी आवाजें मुखर होना चाहती हैं।” कथा विन्यास में उन मरे हुए मुहूर्तों के मुखरित स्वर स्वप्निल आभासी रूपों में पहले ही सुनाई पड़ते हैं। लोकरंग में जीने-रहने वाले कलाकार के सूने साधारण जीवन में हीराबाई की आकस्मिक भेंट से उनके सजीव होने की उम्मीदें बंधी थी… लेकिन जब प्रेम में गुलफ़ाम ही मारे गए, तो मुहूर्त वैसे ही शेष रह गए! हिरामन उन मुहूर्तों का बस अँखुआना और मुरझाना ही देख सकता था! उसका प्रेम वासना रहित, सच्चा और निष्कलुष था– यह प्रतीति हीराबाई को भी थी। प्रेम एकतरफा कैसे कहा जाए! वह स्वीकार में ही नहीं, प्रतीति में भी होता है। वह कहा ही नहीं, अनकहा भी होता है। हमारी नज़र प्रेम को दो टूक देखने की ही अभ्यस्त है! क्या इसे तुला में एक तरफ भारी और दूसरी तरफ कुछ कम जैसा तौला जा सकता है! यह प्रेम अपने स्थगन पर लौटने के दो रास्ते चुनता है। एक बाज़ार की ओर द्रुत गति से जाता रेलगाड़ी का रास्ता है— जिस पर हीराबाई सवार है। और, दूसरा कच्चे रास्ते पर बैलों के कदम खोलकर चाल पकड़ता बैलगाड़ी का है, जिस पर हिरामन सवार है। रेल पर बैठना हिरामन का स्वप्न था और बैलगाड़ी पर बैठना हीराबाई की आकस्मिक लाचारी। हिरामन गाड़ीवानी नहीं छोड़ सकता और हीराबाई नौटंकी कंपनी। आखिर दोनों अपनी जीविका से बंधे हैं— निहायत अलग-अलग इस वापसी में प्रेम तो ओझल या स्थगित होना ही था! क्या पता बाद में हिरामन बनैली मेला गया हो? बहरहाल, रेणु की ‘कहानी’ को इससे लेना-देना नहीं।

नयी कहानी आंदोलन उल्लेखनीय प्रेम कहानियों के लिए भी ख्यात रहा है। वैसे तो प्रेम कहानियाँ उसके पहले भी लिखी गईं थीं पर त्याग, बलिदान और वेदना के महिमाशाली गौरव में छिपे हुए प्रेम विरोधी सामाजिक कारकों की तलाश नयी कहानी में ही आकर हुई। प्रेम की कथित सामाजिक पात्रता से बेदखल दो पात्रों की पीड़ा भी ‘तीसरी कसम’ की तरल संवेदना के साथ घुली है। यह व्यतीत हो चुके अंचल बोध को सहेजने के लिए ही नहीं, हिंदी की अविस्मरणीय प्रेम कथा भी हमेशा मानी जाएगी। उल्लेखनीय कहानियाँ रेणु ने कई और भी लिखीं है, लेकिन उन्हें महत्त्व के ऊँचे शिखर पर इसी कहानी ने पहुँचाया।

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नीरज खरे
नीरज खरे, सुपरिचित आलोचक प्रकाशन - ‘बीसवीं सदी के अंत में हिन्दी कहानी’, ‘कहानी का बदलता परिदृश्य’, ‘आलोचना के रंग’ और ‘उन्मुक्त रास्तों पर हिन्दी कहानी’। सम्पादन - ‘प्रेमचन्द और हमारा समय’, 'हिन्दी कहानी वाया आलोचना' ‘एक कौड़ी दिल से’ (स्वयं प्रकाश की प्रतिनिधि कहानियों का संकलन) और ‘मार्कण्डेय : चुनी हुई कहानियाँ’ पुरस्कार/सम्मान - 'मीरा स्मृति पुरस्कार', ‘स्पंदन आलोचना सम्मान’ और ‘मलयज स्मृति आलोचना सम्मान’। सम्प्रति : प्रोफ़ेसर, हिन्दी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी - 221 005
Portrait of a middle-aged man with short dark hair and black glasses wearing a green striped shirt, looking to the side.
नीरज खरे
नीरज खरे, सुपरिचित आलोचक प्रकाशन - ‘बीसवीं सदी के अंत में हिन्दी कहानी’, ‘कहानी का बदलता परिदृश्य’, ‘आलोचना के रंग’ और ‘उन्मुक्त रास्तों पर हिन्दी कहानी’। सम्पादन - ‘प्रेमचन्द और हमारा समय’, 'हिन्दी कहानी वाया आलोचना' ‘एक कौड़ी दिल से’ (स्वयं प्रकाश की प्रतिनिधि कहानियों का संकलन) और ‘मार्कण्डेय : चुनी हुई कहानियाँ’ पुरस्कार/सम्मान - 'मीरा स्मृति पुरस्कार', ‘स्पंदन आलोचना सम्मान’ और ‘मलयज स्मृति आलोचना सम्मान’। सम्प्रति : प्रोफ़ेसर, हिन्दी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी - 221 005
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2 COMMENTS

  1. नीरज खरे जी का यह आलेख ‘तीसरी कसम’ के पारंपरिक पाठ से आगे बढ़कर उसके सांस्कृतिक, मानवीय और सौंदर्यबोध के पक्षों को नए दृष्टिकोण से उद्घाटित करता है। ‘प्रेम का स्थगित स्वप्न’ जैसी अवधारणा के माध्यम से हिरामन और हीराबाई के संबंध को जिस गहराई से समझाया गया है, वह कहानी के पुनर्पाठ की प्रेरणा देता है। यह आलेख सिद्ध करता है कि कालजयी रचनाएँ हर युग में नए अर्थों के साथ हमारे सामने उपस्थित होती हैं। लेखक को इस संवेदनापूर्ण विश्लेषण के लिए हार्दिक बधाई।

    • लेख पर गौर करने के लिए आपका आभारी हूँ। प्रतिक्रिया देने के लिए हार्दिक धन्यवाद!

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