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पैटरनिटी लीव को कानून बनाकर मान्यता दे सरकार, सुप्रीम कोर्ट का अहम निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने पैटरनिटी लीव को लेकर अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार को इसे मान्यता देने के लिए कानून बनाने का आग्रह किया है।

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पैटरनिटी लीव पर बनेगा कानून? फोटोः ग्रोक/ आईएएनएस

नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (17 मार्च) को पैटरनिटी लीव पर एक अहम फैसला सुनाया। अदालत ने इस दौरान पितृत्व अवकाश (पैटरनिटी लीव) को मान्यता देने वाला कानून लाने का आग्रह किया।

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने कहा कि यह केंद्र सरकार पर निर्भर है कि वह छोटे बच्चों के पिताओं को किस प्रकार पितृत्व अवकाश दिया जाए जिसमें इसकी अवधि भी शामिल है।

सुप्रीम कोर्ट ने पैटरनिटी लीव पर क्या कहा?

अदालत ने कहा कि ” हम केंद्र सरकार से आग्रह करते हैं कि पितृत्व अवकाश को सामाजिक सुरक्षा लाभ के रूप में मान्यता देने वाला प्रावधान लाए। हम जोर देते हैं कि ऐसे अवकाश की अवधि माता-पिता और बच्चे दोनों की जरूरतों के अनुरूप निर्धारित की जानी चाहिए। “

अदालत ने छोटे बच्चों की देखभाल करने वालों के रूप में पिताओं को मान्यता देने की बात कही। इस दौरान अदालत ने उन प्रावधानों को भी रद्द किया जो 3 महीने से अधिक उम्र के बच्चों को गोद लेने वाली माताओं को मातृत्व लाभ (मैटरनिटी बेनिफिट्स) को प्रभावित करता था।

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सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 की धारा 60 (4) को रद्द कर दिया। यह धारा यह निर्धारित करती थी कि दत्तक माताएं (एडॉप्टिव मदर्स) मातृ्त्व अवकाश के लिए तभी योग्य होंगी जब वे 3 महीने से कम उम्र के बच्चों को गोद लेंगी।

समानता के अधिकार का करता है उल्लंघन

अदालत ने कहा कि इस तरह का भेदभाव दत्तक माताओं के साथ-साथ 3 महीने से अधिक उम्र के दत्तक बच्चों के भी विरुद्ध है। अदालत ने यह भी निष्कर्ष निकाला कि जिस प्रावधान की शिकायत की गई है वह संविधान के अनुच्छेद-14 के अंतर्गत समानता के अधिकार का उल्लंघन करता है।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट में हम्सानंदिनी नंदूरी द्वारा एक जनहित याचिका दायर की गई थी। इस याचिका में मातृत्व लाभ अधिनियम (1961) की धारा 5(4) की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी।

अधिनियम में यह प्रावधान 2017 में लाए गए संशोधन के तहत जोड़ा गया था। जिसमें दत्तक माताओं को केवल 12 हफ्तों का मातृत्व लाभ दिया जाता है। वह भी तब जब बच्चा 3 महीने से कम आयु का हो। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि आयु-आधारित यह प्रतिबंध मनमाना है और संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(जी) और 21 का उल्लंघन करता है।

अदालत ने अपने आदेश में इस बात पर भी जोर दिया कि गोद लिए गए बच्चों की जरूरतें जैविक बच्चों की जरूरतों से भिन्न नहीं होती हैं।

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अमरेन्द्र यादव
लखनऊ विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातक करने के बाद जामिया मिल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई। जागरण न्यू मीडिया में बतौर कंटेंट राइटर काम करने के बाद 'बोले भारत' में कॉपी राइटर के रूप में कार्यरत...सीखना निरंतर जारी है...

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