नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (18 मई) को फैसला सुनाया कि “जमानत नियम है और जेल अपवाद है।” अदालत ने कहा कि यह सिद्धांत सख्त गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत आने वाले मामलों में भी लागू रहता है। सुप्रीम कोर्ट ने इसके साथ ही 2020 के दिल्ली दंगों की साजिश के मामले में जेएनयू के पूर्व छात्र नेता उमर खालिद को जमानत देने से इनकार करने के अपने ही पहले दिए गए आदेश पर गंभीर आपत्ति जताई।
अदालत ने कहा कि सितंबर 2020 से जेल में बंद उमर खालिद को जमानत देने से इनकार करने वाले फैसले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित सिद्धांतों को ठीक से लागू नहीं किया गया है। यह लंबी अवधि की पूर्व-परीक्षण (प्रोलांग्ड प्री-ट्रायल) हिरासत के संबंध में लागू होते हैं। गौरतलब है कि खालिद की जमानत याचिका इस साल जनवरी में खारिज कर दी गई थी और अप्रैल में उनकी पुनर्विचार याचिका को भी अस्वीकार कर दिया गया था।
UAPA में भी जमानत नियम और जेल है अपवादः सुप्रीम कोर्ट
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि भले ही यूएपीए की धारा 43डी(5) आतंकवाद से संबंधित मामलों में जमानत देने पर सख्त शर्तें लगाती है। फिर भी ये प्रतिबंध अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता (राइट टू पर्सनल लिबर्टी) की संवैधानिक गारंटी को रद्द नहीं कर सकते। इसलिए, इसने इस दीर्घकालिक कानूनी सिद्धांत की पुष्टि की कि “जमानत नियम है और कारावास अपवाद है।”
अदालत ने इस दौरान यह स्पष्ट करते हुए कहा कि अदालतों को केवल इसलिए जमानत से इंकार सिर्फ इसलिए नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि आरोप यूएपीए के अंतर्गत हैं।
अदालत ने टिप्पणी की कि “इसलिए, हमें यह कहने में कोई संदेह नहीं है कि यूएपीए के तहत भी जमानत नियम है और कारावास अपवाद।” सुप्रीम कोर्ट ने ने 2021 में यूनियन ऑफ इंडिया बनाम के.ए. नजीब मामले में एक ऐतिहासिक फैसले में कहा था कि त्वरित सुनवाई के मौलिक अधिकार का उल्लंघन यूएपीए मामलों में संवैधानिक अदालतों द्वारा जमानत देने का आधार बन सकता है। सोमवार (16 मई) को हुई सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि इस बाध्यकारी मिसाल को खालिद की जमानत याचिका खारिज करते समय ठीक से लागू नहीं किया गया जो कि न्यायिक अनुशासन (ज्युडिशियल डिसिप्लिन) पर आधारित है।

जस्टिस भुइयां ने कहा, “कम सदस्यों वाली पीठ द्वारा दिया गया फैसला अधिक सदस्यों वाली पीठ द्वारा घोषित कानून से बंधा होता है। न्यायिक अनुशासन यह अनिवार्य करता है कि ऐसे बाध्यकारी फैसले का या तो पालन किया जाए या संदेह की स्थिति में उसे उच्च पीठ के समक्ष प्रस्तुत किया जाए। एक छोटी पीठ उच्च पीठ के फैसले को कमजोर, दरकिनार या उसकी अवहेलना नहीं कर सकती।” वह जनवरी में खालिद की जमानत याचिका खारिज करने वाली दो जजों की पीठ का जिक्र कर रहे थे।
यूएपीए के अन्य मामले में जमानत देते हुए की टिप्पणी
अदालत ने सैयद इफ्तिखार अंद्राबी को जमानत देते हुए ये टिप्पणियां कीं। उसने कथित तौर पर मादक पदार्थों की आपूर्ति के माध्यम से आतंकवाद के वित्तपोषण के आरोप में यूएपीए मामले में छह साल से अधिक समय हिरासत में बिताया है। उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार करने वाले जनवरी 2026 के फैसले का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि उसे पिछली पीठ द्वारा अपनाए गए दृष्टिकोण को “स्वीकार करना मुश्किल” लगता है।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का यूपीए मामलों में लंबित जमानत याचिकाओं पर व्यापक प्रभाव पड़ने की संभावना है। इनमें 2020 के दिल्ली दंगों की साजिश की जांच से जुड़े मामले भी शामिल हैं जहां कई आरोपी व्यक्ति मुकदमे की प्रतीक्षा में वर्षों से हिरासत में हैं।
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बताते चलें कि खालिद जेएनयू के पूर्व छात्र नेता हैं। खालिद को दिल्ली में फरवरी 2020 में हुए दंगों में कथित ‘बड़ी साजिश’ के आरोप में सितंबर 2020 में गिरफ्तार किया गया था। दिल्ली पुलिस ने खालिद पर सीएए विरोधी प्रदर्शनों के दौरान भड़काऊ भाषण देने का आरोप लगाया और दावा किया कि वह हिंसा को जन्म देने वाली पूर्व नियोजित साजिश का हिस्सा थे।



