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‘सिर्फ हवाई किले बना रहे’, आवारा कुत्तों से जुड़े मामलों पर SC ने राज्यों को लगाई फटकार, सुरक्षित रखा फैसला

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने बताया कि सरकार राष्ट्रीय रेबीज नियंत्रण कार्यक्रम के माध्यम से राज्यों को बजटीय सहायता और वैक्सीन उपलब्ध करा रही है। हालांकि, कोर्ट ने इस योजना के वास्तविक प्रभाव पर सवाल उठाए।

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को देश में आवारा कुत्तों (स्ट्रे डॉग्स) की बढ़ती समस्या और उनके काटने की घटनाओं से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई पूरी करते हुए अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।

जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने सभी हितधारकों यानी कुत्ता प्रेमियों, पशु अधिकार कार्यकर्ताओं, पीड़ितों और सरकारों की दलीलें सुनने के बाद सभी पक्षों को एक सप्ताह के भीतर अपना लिखित जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।

कोर्ट के समक्ष मुख्य मुद्दा आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या, रेबीज नियंत्रण, टीकाकरण, नसबंदी और आम लोगों की सुरक्षा से जुड़ा रहा। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कई राज्यों द्वारा कुत्तों की नसबंदी, डॉग पाउंड बनाने और शैक्षणिक संस्थानों से आवारा कुत्तों को हटाने के मामले में की गई लापरवाही पर काफी नाराजगी जाहिर की।

शीर्ष अदालत ने कड़े शब्दों में कहा कि राज्य सरकारें सिर्फ ‘हवाई किले’ बना रही हैं और उनकी दलीलें ‘कहानी सुनाने’ जैसी लग रही हैं। कोर्ट ने कहा कि कागजों पर योजनाएं बनाने के बजाय जमीन पर ठोस कार्रवाई की जरूरत है, क्योंकि आम जनता की सुरक्षा दांव पर लगी है।

कुत्तों के काटने और रेबीज नियंत्रण पर राज्यों की दलीलें

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने बताया कि सरकार राष्ट्रीय रेबीज नियंत्रण कार्यक्रम के माध्यम से राज्यों को बजटीय सहायता और वैक्सीन उपलब्ध करा रही है। हालांकि, कोर्ट ने इस योजना के वास्तविक प्रभाव पर सवाल उठाए। सॉलिसिटर जनरल ने जानकारी दी कि अब ‘डॉग बाइट’ के हर मामले को सूचित करना अनिवार्य कर दिया गया है और अब तक 25 राज्यों ने इसे लागू कर दिया है।

अदालत उस समय दंग रह गई जब असम सरकार की ओर से कुत्ते के काटने के आंकड़े पेश किए गए। रिकॉर्ड के अनुसार, असम में साल 2024 में 1.66 लाख कुत्ते के काटने के मामले सामने आए, जबकि पूरे राज्य में नसबंदी के लिए केवल एक केंद्र सक्रिय है। इससे भी अधिक चौंकाने वाली बात यह रही कि अकेले जनवरी 2025 में असम में 20,900 लोगों को कुत्तों ने अपना शिकार बनाया। पीठ ने इन आंकड़ों को ‘खतरनाक’ बताते हुए राज्य सरकार से सवाल किया कि आखिर सुविधाओं के विस्तार के लिए कोई ठोस कार्ययोजना क्यों नहीं तैयार की गई।

बिहार का उदाहरण देते हुए एमीकस क्यूरी (न्याय मित्र) ने बताया कि राज्य में कुल 34 एबीसी केंद्र संचालित हैं, जहां अब तक 20,648 कुत्तों की नसबंदी की जा चुकी है। हालांकि उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि सरकार ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि इन केंद्रों की प्रतिदिन नसबंदी करने की वास्तविक क्षमता कितनी है। इसके अलावा एबीसी केंद्रों का समुचित ऑडिट नहीं कराया गया और यह जानकारी भी उपलब्ध नहीं कराई गई कि संस्थागत परिसरों में बाड़बंदी के लिए कितने स्थानों का सर्वे किया गया है।

इस पर बिहार सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता मनीष कुमार ने दलील दी कि राज्य इस दिशा में लगातार काम कर रहा है और अगले तीन महीनों में ठोस और दिखाई देने वाली प्रगति होगी। लेकिन कोर्ट ने इस जवाब को अपर्याप्त बताते हुए साफ कहा कि केवल सामान्य आश्वासन स्वीकार्य नहीं हैं और ठोस आंकड़ों के साथ प्रगति रिपोर्ट पेश की जानी चाहिए।

उधर, झारखंड सरकार द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों ने कोर्ट को और अधिक नाराज कर दिया। झारखंड ने दावा किया कि राज्य में 1.89 लाख कुत्तों की नसबंदी की गई है। जब कोर्ट ने इन आंकड़ों की गहराई से पड़ताल की, तो सामने आया कि इनमें से करीब 1.6 लाख नसबंदी केवल दो महीनों के भीतर दिखाई गई है। इस पर कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए इसे पूरी तरह अविश्वसनीय और मनगढ़ंत आंकड़ा करार दिया।

पीठ ने तीखे सवाल पूछते हुए कहा कि एक वाहन एक दिन में अधिकतम कितने कुत्तों को पकड़ सकता है और उनकी सुरक्षित नसबंदी कैसे संभव है। कोर्ट ने झारखंड सरकार के दावों पर गंभीर संदेह जताते हुए इन आंकड़ों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए।

मामले में अदालत की सहायता कर रहे एमीकस क्यूरी गौरव अग्रवाल ने आंध्र प्रदेश का उदाहरण देते हुए बताया कि वहां 39 ‘एनिमल बर्थ कंट्रोल’ केंद्र हैं, जिनमें प्रतिदिन 1,619 कुत्तों की नसबंदी करने की क्षमता है। उन्होंने सुझाव दिया कि राज्य को अपनी मौजूदा सुविधाओं का ऑडिट करना चाहिए और नए केंद्रों के लिए एक निश्चित समय सीमा तय करनी चाहिए। असम के संदर्भ में उन्होंने कहा कि राज्य को कम से कम अपने तीन नगर निगमों से व्यवस्थित तरीके से काम शुरू करना चाहिए, क्योंकि वर्तमान में वहां मौजूद संसाधन जनसंख्या के मुकाबले बेहद कम हैं।

वहीं, पशु कल्याण बोर्ड की ओर से बताया गया कि उनके साथ 76 केंद्र मान्यता प्राप्त हैं, जबकि 250 से अधिक आवेदन लंबित हैं। कोर्ट ने इस पर नाराजगी जताते हुए कहा कि लंबित आवेदनों को तेजी से निपटाया जाए और स्पष्ट रूप से स्वीकार या अस्वीकार किया जाए। न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा कि इस प्रक्रिया में अनावश्यक देरी स्वीकार्य नहीं है।

राजमार्गों पर गश्त की जिम्मेदारी एनएचआई की

सड़कों पर मवेशियों के कारण होने वाले हादसों पर भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने अदालत में एक चार्ट पेश किया। एनएचआई ने बताया कि महाराष्ट्र में लगभग 2,691 आवारा मवेशियों को सड़कों से हटाकर गौशालाओं में स्थानांतरित किया गया है, जबकि हरियाणा में यह संख्या 3,261 है।

कोर्ट ने कहा कि राजमार्गों पर गश्त की जिम्मेदारी एनएचआई की होनी चाहिए। सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि पंजाब, राजस्थान, दिल्ली और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों ने इस मुद्दे पर बुलाई गई बैठकों में सक्रिय भागीदारी नहीं दिखाई है, जिसे कोर्ट ने गंभीरता से लिया।

एनएचआई के वरिष्ठ वकील ने केरल जैसे राज्यों का उदाहरण देते हुए बताया कि वहां राजमार्गों के आसपास शहरीकरण अधिक होने के कारण मवेशियों की समस्या कम है, लेकिन वहां आवारा कुत्तों का आतंक समुद्र तटों तक फैला हुआ है। दूसरी ओर, हरियाणा जैसे राज्यों में मवेशियों के पुनर्वास की प्रक्रिया में अभी भी कमियां पाई गई हैं। कोर्ट ने कहा कि जन स्वास्थ्य और स्वच्छता हालांकि राज्य का विषय है, लेकिन केंद्र सरकार को राज्यों की जवाबदेही सुनिश्चित करने और कार्यान्वयन की निगरानी करने की आवश्यकता है।

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अनिल शर्मा
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...
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दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...
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