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सड़कों पर अनाथ बच्चों को गोद क्यों नहीं लिया जाता?, सुप्रीम कोर्ट ने डॉग लवर से पूछा सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों के मामले में सुनवाई के दौरान कहा कि सड़कों पर अनाथ बच्चों को गोद क्यों नहीं लिया जाता है।

supreme court on hearing on stray dogs why not adopt children on street, सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट, फोटोः आईएएनएस

नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार, 13 जनवरी को इस बात पर खेद व्यक्त किया कि डॉग लवर्स की तरफ से आवारा कुत्तों के पक्ष में वकीलों ने जिरह की लेकिन कोई भी मनुष्य की ओर से विचार या बहस नहीं कर रहा था।

जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और एनवी अंजारिया की पीठ इस मामले में सुनवाई कर रही थी। सुनवाई के दौरान डॉग लवर की ओर से पेश हुए वकील से अदालत ने पूछा कि वह खुद को आवारा कुत्तों को गोद लेने तक ही क्यों सीमित रख रहे हैं, वे सड़कों पर अनाथ बच्चों को गोद लेने की वकालत क्यों नहीं कर रहे हैं?

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने यह सवाल तब पूछा जब 80 वर्षीय डॉग लवर महिला की ओर से दलील देने वाले वरिष्ठ वकील वैभव गग्गर ने आवारा कुत्तों को गोद लेने के लिए प्रोत्साहन देने का सुझाव दिया।

वरिष्ठ वकील गौरव गग्गर ने कहा “मैं एक 80 वर्षीय महिला का प्रतिनिधित्व करता हूं जो सड़क पर रहती है। वह 200 कुत्तों की देखभाल करती है। दिल्ली में उन्हें ‘डॉग अम्मा’ के नाम से जाना जाता है। गोद लेने के लिए एक नीति पर विचार किया जाना चाहिए – प्रोत्साहन के साथ। यहां कई वकील हैं जिनके घर में 8-10 देसी कुत्ते हैं। एक राष्ट्रीय गोद लेने का अभियान चलाया जा सकता है। प्रोत्साहन के तौर पर नसबंदी और टीकाकरण जैसी सरल चीजें भी की जा सकती हैं।”

इसके बाद जस्टिस संदीप मेहता ने तीखे शब्दों में कहा कि क्या आप सचमुच ऐसा कह रहे हैं? एक युवा वकील ने अभी-अभी हमें सड़कों पर अनाथ बच्चों के आंकड़े दिखाए। शायद कुछ वकील उन बच्चों को गोद लेने की पैरवी कर सकते हैं। 2011 में न्यायाधीश बनने के बाद से मैंने इतनी लंबी बहसें कभी नहीं सुनीं। और अब तक किसी ने भी इंसानों के लिए इतनी लंबी बहस नहीं की है।

आज हुई सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय का 7 नवंबर, 2025 का वह आदेश जिसमें देश भर के संस्थानों और परिसरों से आवारा पशुओं को हटाने और उन्हें वापस उन क्षेत्रों में न छोड़ने का निर्देश दिया गया था, उचित था।

उन्होंने कहा, “मेरा निवेदन है कि 7 नवंबर का आदेश पूरी तरह से उचित है और कानून द्वारा समर्थित है। दूसरा, किसी विशेषज्ञ समिति की कोई आवश्यकता नहीं है। तीसरा, एबीसी नियमों को चुनौती देने वाली कई याचिकाएं दायर की गई हैं। एबीसी नियम 60 से अधिक केंद्रीय और राज्य कानूनों के विरुद्ध हैं।”

अरविंद दातार ने आवारा कुत्तों के खतरों पर डाला प्रकाश

अपनी दलील में उन्होंने कई क्षेत्रों में आवारा कुत्तों से उत्पन्न होने वाले खतरों पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि विवाद का मूल मुद्दा यह है कि क्या कुत्तों को संस्थागत परिसरों में वापस छोड़ा जाना चाहिए या नहीं।

इस संबंध में उन्होंने तर्क दिया कि किसी संस्था या गेटेड सोसाइटी के परिसर में रहने वाले आवारा/गली के कुत्ते को वहां रहने का कोई अधिकार नहीं है।

विशेष रूप से पशु जन्म नियंत्रण नियमों (एबीसी नियमों) पर, दातार ने कहा कि उनमें प्रयुक्त कई शब्द अपरिभाषित हैं। यह दलील देते हुए उन्होंने कहा कि शीर्ष अदालत का 7 नवंबर, 2025 का आदेश हवाई अड्डों और अदालत परिसरों पर भी लागू होना चाहिए।

वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने समस्या से निपटने के लिए संतुलित दृष्टिकोण अपनाने का आह्वान किया। वरिष्ठ अधिवक्ता पिंकी आनंद ने कहा कि 7 नवंबर, 2025 के आदेश के अनुसार कुत्तों को हटाना अप्रभावी होगा।

वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि इस मामले में बेहद भावनात्मक मुद्दे शामिल हैं। उन्होंने कहा, “आवारा कुत्तों और उनसे जुड़े संघर्ष से संबंधित ये बेहद विवादास्पद और भावनात्मक मुद्दे…”

इस पर अदालत ने कहा कि ऐसा लगता है कि भावनाएं सिर्फ कुत्तों के लिए ही हैं। इस दौरान गुरुस्वामी ने 1957 की संसदीय बहसों का जिक्र किया। अदालत ने आगे कहा कि वह केंद्र और राज्य सरकारों से यह पता लगाने के लिए समय लेगी कि क्या आवारा कुत्तों से निपटने के लिए कोई कार्य योजना बनाई गई है।

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अमरेन्द्र यादव
लखनऊ विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातक करने के बाद जामिया मिल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई। जागरण न्यू मीडिया में बतौर कंटेंट राइटर काम करने के बाद 'बोले भारत' में कॉपी राइटर के रूप में कार्यरत...सीखना निरंतर जारी है...

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