नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने कहा कि भारत में अलग-अलग राय जाहिर करने के लिए सार्वजनिक जगहें कम होती जा रही हैं। उन्होंने कैंपस में विरोध-प्रदर्शन के लिए छात्रों की गिरफ्तारी और जमानत मिलने में हो रही देरी की ओर इशारा करते हुए शांतिपूर्ण विरोध को आपराधिक गतिविधि मानने के खिलाफ चेतावनी दी।
संवैधानिक आजादी की रक्षा में अदालतों की भूमिका पर बात करते हुए जस्टिस भुइयां ने कहा कि विरोध करने के अपने अधिकार का इस्तेमाल करने पर नागरिकों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई के मामले बढ़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि हालांकि अदालतें कई मामलों में राहत दे रही हैं लेकिन अक्सर यह राहत देर से मिलती है। इस दौरान उन्होंने यह भी कहा कि जमानत की सख्त शर्तें जायज असहमति को हतोत्साहित कर सकती हैं।
सुप्रीम कोर्ट के जज ने असहमति दर्ज करने पर होने वाली कार्रवाई पर जताई चिंता
उन्होंने कहा कि पर्यावरण के लिए विरोध करने वालों और छात्रों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई तेजी से बढ़ रही थी।
गौरतलब है कि जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने यह टिप्पणी शनिवार (25 जुलाई) को भोपाल स्थित नेशनल लॉ इंस्टीट्यूट यूनिवर्सिटी में जस्टिस जीपी सिंह की याद में चौथे मेमोरियल लेक्चर में छात्रों को संबोधित करने के दौरान ये बातें कहीं।
जस्टिस भुइयां ने कहा कि हालांकि अदालतें राहत देती हैं लेकिन अक्सर इसमें देरी होती है और कई बार इसके साथ कड़ी शर्तें भी जुड़ी होती है। अपनी बात को स्पष्ट करते हुए उन्होंने गंगा नदी में नाव पर रोजा खोलते समय चिकन बिरयानी खाने के कारण युवाओं की गिरफ्तारी का जिक्र किया।
उन्होंने ऐसे मामलों का भी जिक्र किया जिनमें जमानत पाने वाले लोगों को सार्वजनिक बैठकों में शामिल न होने, सोशल मीडिया पर पोस्ट न करने या देश छोड़कर न जाने का निर्देश दिया गया था।
उन्होंने कहा कि ऐसी शर्तें बुनियादी आजादी को कमजोर करती हैं। इसके अलावा जस्टिस भुइयां ने बॉम्बे हाई कोर्ट के एक मामले का जिक्र किया जो गाजा के समर्थन में प्रस्तावित प्रदर्शन से जुड़ा था। उन्होंने कहा कि उन्हें यह बात “काफी मजेदार” लगी कि एक जज ने सवाल उठाया था कि लोग भारत के बाहर हुई घटनाओं को लेकर विरोध-प्रदर्शन क्यों करना चाहते हैं।
अपने लेक्चर के दौरान उन्होंने विश्वविद्यलयों को लेकर भी टिप्पणी की कि उन्हें आलोचनात्मक सोच (क्रिटिकल थिंकिंग) को बढ़ावा देना चाहिए न कि छात्रों के सवालों को दबाने की कोशिश करनी चाहिए।
इस दौरान उन्होंने यूनिवर्सिटी की भूमिका पर बात करते हुए कहा गया कि कानूनी शिक्षा में लकीर का फकीर बनने के बजाय जिज्ञासा को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
जंतर-मंतर पर जारी विरोध प्रदर्शन के दौरान आई टिप्पणी
बताते चलें कि जस्टिस भुइयां की यह टिप्पणी ऐसे वक्त में आई है जब दिल्ली स्थित जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में विरोध प्रदर्शन जारी था। यह प्रदर्शन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद बंद करने का ऐलान किया गया। इसी प्रदर्शन के चलते केंद्रीय विश्वविद्यालयों दिल्ली विश्वविद्यालय (DU), जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) और जामिया मिल्लिया इस्लामिया ने छात्रों के लिए एडवाइजरी जारी की थी।
वहीं मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, 24 जुलाई को कुछ छात्रों और अन्य लोगों को पुलिस ने डिटेन किया और पूछताछ की। सोशल मीडिया पर इसके कई वीडियो वायरल हैं। जामिया मिल्लिया इस्लामिया मेट्रो स्टेशन के पास पुलिसकर्मियों ने आने-जाने वाले लोगों से पूछताछ की और उनका नाम लिखा।
25 जुलाई को हजरत निजामुद्दीन दरगाह के पास से गुजरने वाले यात्रियों से दिल्ली पुलिस ने पूछताछ की और जंतर-मंतर जा रहे लोगों के नाम नोट किए। मौके पर मौजूद बोले भारत की टीम ने जब पुलिसकर्मियों से इसका कारण पूछा तो पुलिस ने इसका कोई जवाब नहीं दिया।



