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अदालतों में AI के इस्तेमाल के लिए सुप्रीम कोर्ट ने क्या प्रस्ताव दिए हैं? क्या हैं ये नियम और किस हद तक एआई के प्रयोग को मंजूरी दी गई है?

सुप्रीम कोर्ट के ड्राफ्ट रेगुलेशन को कोर्ट के कामकाज को बेहतर बनाने के लिए कोर्ट की प्रक्रियाओं में AI के इस्तेमाल को रेगुलेट करने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है।

Split image: left side shows a domed Indian government building with an Indian flag; right side displays a blue circuit-board outline of a human head with the letters 'AI', representing artificial intelligence.
फोटोः समाचार एजेंसी आईएएनएस

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने पिछले महीने अदालतों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के इस्तेमाल के लिए ‘रेगुलेशन्स फॉर यूज ऑफ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) इन कोर्ट्स, 2026’ का ड्राफ्ट जारी किया। इसका मकसद न्यायपालिका में AI के इस्तेमाल के लिए एक गवर्नेंस फ्रेमवर्क बनाना, AI के इस्तेमाल से जुड़े सामान्य सिद्धांत तय करना और इसके लिए एक संस्थागत ढांचा तैयार करना है। अदालत ने 15 जुलाई तक स्टेकहोल्डर्स और आम जनता से इस पर राय और सुझाव मांगे हैं।

ड्राफ्ट रेगुलेशन को कोर्ट के कामकाज को बेहतर बनाने के लिए कोर्ट की प्रक्रियाओं में AI के इस्तेमाल को रेगुलेट करने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी किया गया ड्रॉफ्ट अपने आप ही या एक ही समय लागू नहीं होगा। सुप्रीम कोर्ट के लिए ड्राफ्ट नियम भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा बताई गई तारीख से लागू होंगे।

वहीं, हाई कोर्ट और उनके अधिकार क्षेत्र में आने वाली अदालतों और ट्रिब्यूनल के लिए ये नियम संबंधित हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश द्वारा बताई गई तारीखों पर अलग-अलग लागू होंगे। इस ड्रॉफ्ट के अलग-अलग प्रावधान अलग-अलग तारीखों पर लागू किए जा सकते हैं। इसका मतलब है कि अदालतों की जरूरतों और हालात के हिसाब से AI को अपनाने की प्रक्रिया को चरणों में बांटा जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने एआई के लिए क्या भूमिका तय की है?

सुप्रीम कोर्ट के ड्राफ्ट नियमों में अदालतों से यह अपेक्षा करने का प्रस्ताव है कि वे ऐसे AI सिस्टम और टूल्स को लागू करने के अवसर ” सक्रिय रूप से तलाशें ” जो न्याय तक पहुंच को ” साफ तौर पर ” बेहतर बनाते हों, देरी कम करते हों या प्रशासनिक कार्यक्षमता बढ़ाते हों।

केस मैनेजमेंट, ट्रांसक्रिप्शन, अनुवाद, कानूनी रिसर्च, डॉक्यूमेंट का सारांश बनाना, एक्सेसिबिलिटी और कोर्ट एडमिनिस्ट्रेशन जैसे कई प्रशासनिक और सहायक कामों के लिए AI के इस्तेमाल की साफ तौर पर इजाजत दी गई है। इन सभी कामों के लिए सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट/ट्रिब्यूनल की AI कमिटी (जैसा भी मामला हो) से लिखित मंजूरी लेनी होगी और कोर्ट द्वारा नियुक्त अधिकारियों की देखरेख और पुष्टि की जरूरत होगी।

क्या एआई किसी केस का निर्णय तय कर सकेगा?

इन ड्राफ्ट नियमों में हालांकि साफ तौर पर कहा गया है कि कोई भी न्यायिक फैसला सिर्फ एल्गोरिदम से लिए गए फैसले या सिर्फ AI से मिली जानकारी के आधार पर नहीं लिया जाएगा। सभी न्यायिक फैसलों में इंसानी न्यायिक अधिकार ही निर्णायक होता है। इसलिए किसी मामले से जुड़े फैसले लेने की प्रक्रिया में अगर AI का इस्तेमाल किया भी जाता है तो वह सिर्फ सलाह देने के लिए होगा और उस पर स्वतंत्र इंसानी (न्यायिक) समीक्षा जरूरी होगी।

कई तरह के इस्तेमाल पर ” पूरी तरह और बिना किसी छूट के ” रोक लगाई गई है। नियमों के तहत कोई भी अथॉरिटी बाद में इनकी इजाजत नहीं दे सकती। इनमें उड़ान भरने के जोखिम का पता लगाने के लिए ‘रिस्क स्कोरिंग’, दोबारा अपराध करने की संभावना का अनुमान लगाना, जमानत के लिए पात्रता की जांच करना, गवाहों की विश्वसनीयता तय करना, पार्टियों, आरोपियों, गवाहों या कानूनी प्रतिनिधियों के भविष्य के आचरण या व्यवहार का अनुमान लगाने, प्रोफाइल बनाने या अंदाजा लगाने के लिए AI का इस्तेमाल करना, AI से बने आउटपुट को उसके AI-जनरेटेड होने की पूरी जानकारी दिए बिना स्वतंत्र सबूत के तौर पर पेश करना, और व्यक्तिगत आजादी पर असर डालने वाले मामलों में ब्लैकबॉक्स (जिसे समझाया न जा सके) AI सिस्टम का इस्तेमाल करना शामिल हैं।

मुकदमेबाजों को पता चलेगा कि उनके केस में AI का इस्तेमाल किया गया?

ड्राफ्ट नियमों में यह प्रस्ताव भी है कि अगर कोई कोर्ट केस मैनेजमेंट, डॉक्यूमेंट एनालिसिस या न्यायिक कामकाज के किसी भी पहलू में “महत्वपूर्ण मदद” के लिए AI टूल का इस्तेमाल करता है तो उसे संबंधित पक्षों (मुकदमेबाजों और उनके वकीलों) को समय पर और आसानी से समझ आने वाले तरीके से इसकी जानकारी देनी होगी।

यहां मुख्य बात “महत्वपूर्ण मदद” की है। इसलिए मुकदमेबाजों को उन सभी मामलों के बारे में नहीं बताया जाएगा जहां उनके केस में AI का इस्तेमाल हुआ है, बल्कि सिर्फ तब बताया जाएगा जब AI ने जज को कोई महत्वपूर्ण मदद दी हो।

कौन करेगा इसकी देखरेख?

इस सिस्टम का कामकाज सुप्रीम कोर्ट की एक “एपेक्स बॉडी” (सर्वोच्च समिति) संभालेगी। इस समिति में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के मौजूदा जज, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना मंत्रालय (MeitY) का एक अधिकारी और फाइनेंस व साइबर सिक्योरिटी के एक्सपर्ट शामिल होंगे। यह समिति AI सिस्टम के इस्तेमाल को मंजूरी देने और उन्हें लागू करने के लिए गाइडलाइंस जारी करने के लिए कम से कम जरूरी स्टैंडर्ड तय करेगी। यह समिति पांच खास कमेटियों के जरिए काम करेगी। सुप्रीम कोर्ट और हर हाई कोर्ट अपनी-अपनी AI कमेटियां बनाएंगे जिन्हें AI सचिवालय का सहयोग मिलेगा।

इसके साथ ही एक अलग रिसर्च बॉडी ‘सेंटर ऑफ रिसर्च एंड एक्सीलेंस ऑन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ (CoRE-AI), एपेक्स बॉडी की मदद के लिए टूल्स का मूल्यांकन करेगी और डेवलपमेंट पर नजर रखेगी।

निजी कंपनियां भी होंगी शामिल?

इसमें निजी कंपनियां भी शामिल होंगी लेकिन इसके लिए संबंधित कोर्ट अथॉरिटी की लिखित मंजूरी और कॉन्ट्रैक्ट की जरूरी शर्तों का पालन करना होगा। वेंडर एग्रीमेंट में कोर्ट के डेटा और AI आउटपुट के मालिकाना हक और उन्हें इस्तेमाल करने के अधिकारों के बारे में जानकारी होनी चाहिए। इसके साथ ही इसमें संवेदनशील न्यायिक डेटा के इस्तेमाल पर रोक और AI कमिटी की लिखित मंजूरी के बिना कोर्ट के डेटा का इस्तेमाल करके मॉडल को बनाए रखने या उसे बेहतर (fine-tune) करने पर साफ तौर पर मनाही होनी चाहिए।

ड्राफ्ट नियमों में यह भी कहा गया है कि वेंडर उन टूल्स पर एक्सक्लूसिव IP का दावा नहीं कर सकते जो मुख्य रूप से न्यायिक डेटा या सार्वजनिक संसाधनों के आधार पर बनाए गए हैं।

ड्रॉफ्ट नियमों में सुरक्षा उपायों के लिए जीवनचक्र दृष्टिकोण अपनाते हैं। एआई प्रणाली की तैनाती से पहले, उसके दौरान और उसके बाद। एक तकनीकी और नैतिक प्रभाव आकलन आवश्यक होगा जिसमें प्रणाली की संरचना, प्रशिक्षण डेटा, पूर्वाग्रह, मतिभ्रम के जोखिम और साइबर सुरक्षा स्थिति शामिल होगी।

कुछ प्रणालियों को पहले एक पृथक सेटअप में ” नियंत्रित वातावरण परीक्षण ” से गुजरना पड़ सकता है। तैनाती के बाद प्रणालियों को तकनीकी, कानूनी और नैतिक ऑडिट के साथ-साथ उसी चक्र में अलग से साइबर सुरक्षा ऑडिट का सामना करना पड़ेगा। ये ऑडिट आंतरिक रूप से किए जाएंगे क्योंकि स्रोत कोड और प्रशिक्षण डेटा को ऑडिट उद्देश्यों के लिए किसी तीसरे पक्ष के साथ साझा नहीं किया जा सकता है।

इसके अलावा हर कोर्ट को एक AI रजिस्टर भी रखना होगा जिसमें मंजूर किए गए सिस्टम और ऑडिट के नतीजों का रिकॉर्ड हो। इसके साथ ही हर AI सेक्रेटेरिएट को एक AI इंसिडेंट डेटाबेस रखना होगा जिसमें खराबी, गलतियों और बायस (पक्षपात) का रिकॉर्ड रखा जाए। अगर कोई टूल काम करना बंद कर देता है या उसे सस्पेंड कर दिया जाता है तो 24 घंटे के अंदर इसकी सूचना देना जरूरी होगा। हर हाई कोर्ट को एक इमरजेंसी फ़ॉल-बैक प्रोटोकॉल भी रखना होगा ताकि सिस्टम के काम न करने पर भी कोर्ट की प्रक्रियाएं मैन्युअल रूप से चलती रहें।

AI के इस्तेमाल से नुकसान होता है तो मुकदमेबाज के पास क्या उपाय है?

शिकायत का यह तरीका खास तौर पर तब लागू होगा जब AI के मना किए गए इस्तेमाल (जिसके बारे में ऊपर बताया गया है) से कोई नुकसान हुआ हो। प्रभावित पक्ष जल्द से जल्द उस कोर्ट में अर्जी दे सकता है जहां संबंधित AI सिस्टम का इस्तेमाल किया गया था या किया जा रहा है। उस कोर्ट को प्रभावित पक्ष की बात सुननी होगी और ” उचित आदेश ” देने होंगे जो उसे सही लगें।

हाई कोर्ट अलग से आसान प्रक्रियाएं और शिकायत के फॉर्मेट तय कर सकते हैं ताकि कम कानूनी जानकारी वाले लोग भी इसका फायदा उठा सकें। शिकायत दूर करने का यह तरीका आम कानून के तहत पहले से मौजूद किसी भी दूसरे कानूनी उपाय के साथ-साथ काम करेगा।

किन देशों की न्यायपालिका में एआई का इस्तेमाल हो रहा है?

UNESCO के 2025 में किए गए सर्वे से पता चला है कि 96 देशों में 44% न्यायिक अधिकारी काम से जुड़े कामों के लिए पहले से ही ChatGPT जैसे AI टूल का इस्तेमाल कर रहे हैं। 2024 में UNESCO ने AI से जुड़े कई कार्यक्रमों का आयोजन किया और उनमें हिस्सा लिया। इनमें MDP और यूरोपियन कमीशन के सहयोग से आयोजित एक कार्यक्रम भी शामिल था जिसमें मोरक्को की न्यायिक प्रणाली में AI की भूमिका पर ध्यान दिया गया था।

इसके साथ ही यूरोपियन कमीशन की फंडिंग से एक ट्रेनिंग भी आयोजित की गई जिसका मकसद सदस्य देशों को इनोवेटिव टूल के जरिए AI की नैतिकता पर UNESCO की सिफारिशों को लागू करने में मदद करना था।

दुनियाभर के कई देश न्यायपालिका के अलग-अलग कामों के लिए एआई का इस्तेमाल करते हैं। सिंगापुर में स्मॉल क्लेम्स ट्रिब्यूनल में जेनरेटिव AI का इस्तेमाल उन लोगों की मदद के लिए किया जाता है जो अपना केस खुद लड़ रहे हैं और उन्हें केस से जुड़े दस्तावेज तैयार करने में सहायता की जरूरत है।

चीन में एआई “स्मार्ट कोर्ट्स” सिस्टम चलाता है, इसमें AI फैसले का मसौदा तैयार करने और कानूनी रिसर्च में मदद करता है। इसके अलावा अमेरिका, ब्राजील, दक्षिण कोरिया, कोलंबिया, एस्टोनिया में भी अलग-अलग कामों के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है।

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अमरेन्द्र यादव
लखनऊ विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातक करने के बाद जामिया मिल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई। जागरण न्यू मीडिया में बतौर कंटेंट राइटर काम करने के बाद 'बोले भारत' में कॉपी राइटर के रूप में कार्यरत...सीखना निरंतर जारी है...

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