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सुप्रीम कोर्ट ने रिटायरमेंट से पहले जजों के ताबड़तोड़ आदेश पारित करने के ट्रेंड पर जताई चिंता, कहा- ये फाइनल ओवर में छक्के लगाने जैसा

सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में सुनवाई के दौरान कहा कि जजों द्वारा रिटायरमेंट से पहले आदेशों को पारित करना एक ट्रेंड बन गया है। अदालत ने इसे फाइनल ओवर में बल्लेबाज द्वारा छक्के मारने के समान बताया है।

supreme court concerned over growing trend of so many orders before retirement by judges, सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट, फोटोः IANS

नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने जजों द्वारा रिटायरमेंट से बिल्कुल पहले “बहुत सारे आदेशों” को पारित करने के “बढ़ते ट्रेंड” पर चिंता जताई है। अदालत ने इस मैच के फाइनल ओवर में बल्लेबाज द्वारा छक्के मारने के समान बताया है।

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ मध्य प्रदेश के प्रधान और जिला न्यायाधीश की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इस याचिका में उन्होंने कथित तौर पर कुछ संदिग्ध न्यायिक आदेशों के संबंध में उनकी निर्धारित सेवानिवृत्ति से ठीक 10 दिन पहले उन्हें निलंबित करने के उच्च न्यायालय के पूर्ण न्यायालय के फैसले को चुनौती दी थी।

रिटायरमेंट से पहले छक्के मारना… सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

अदालत में हुई सुनवाई के दौरान कहा “याचिकाकर्ता रिटायरमेंट से बिल्कुल पहले छक्के मारना शुरू कर दिए थे। यह एक दुर्भाग्यपूर्ण प्रवृत्ति है। मैं इस पर विस्तार नहीं करना चाहता।” इस पीठ में सीजेआई के साथ जस्टिस जॉयमाला बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली भी शामिल थे।

सीजेआई ने कहा “जजों द्वारा रिटायरमेंट से ठीक पहले इतने सार आदेश पारित करने का चलन बढ़ता जा रहा है।” मध्य प्रदेश के न्यायिक अधिकारी जो 30 नवंबर को सेवानिवृत्त होने वाले थे। उन्हें कथित तौर पर उनके द्वारा पारित दो न्यायिक आदेशों के कारण 19 नवंबर को निलंबित कर दिया गया।

उनकी तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता विपिन सांघी ने अदालत में दलील दी। उन्होंने कहा कि उनका रिकॉर्ड बेदाग है और उनकी वार्षिक गोपनीय रिपोर्टों में लगातार उच्च रेटिंग रही है।

अधिवक्ता सांघी ने अपनी दलील में उनके निलंबन की वैधता पर सवाल उठाते हुए तर्क दिया कि न्यायिक अधिकारियों को केवल न्यायिक आदेश पारित करने के लिए अनुशासनात्मक कार्रवाई का सामना नहीं करना चाहिए।

उन्होंने पूछा, “किसी अधिकारी को ऐसे न्यायिक आदेशों के लिए कैसे निलंबित किया जा सकता है जिनके खिलाफ अपील की जा सकती है और उच्च न्यायालय द्वारा उन्हें सुधारा जा सकता है?”

पीठ ने सैद्धांतिक रूप से सहमति जताते हुए कहा कि सामान्यतः किसी न्यायिक अधिकारी के खिलाफ गलत आदेशों के लिए अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू नहीं की जा सकती।

सीजेआई ने न्यायिक त्रुटि और कदाचार के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए पूछा – “इस मामले में उन्हें निलंबित नहीं किया जा सकता। लेकिन अगर आदेश स्पष्ट रूप से बेईमानी से दिए गए हों तो क्या होगा?”

सीजेआई ने यह भी उल्लेख किया कि 20 नवंबर को सर्वोच्च न्यायालय ने मध्य प्रदेश सरकार को राज्य में न्यायिक अधिकारियों की सेवानिवृत्ति आयु 60 से बढ़ाकर 61 वर्ष करने का निर्देश दिया था। इसके परिणामस्वरूप न्यायिक अधिकारी अब 30 नवंबर को रिटायर होने वाले हैं।

जस्टिस सूर्यकांत ने क्या कहा?

जस्टिस सूर्यकांत ने यह भी बताया कि विवादित आदेश पारित करते समय अधिकारी को सेवानिवृत्ति की आयु में विस्तार की जानकारी नहीं थी। पीठ ने यह भी पूछा कि अधिकारी ने निलंबन को चुनौती देने के लिए उच्च न्यायालय का रुख क्यों नहीं किया।

सांघी ने जवाब दिया कि चूंकि निलंबन पूर्ण न्यायालय के निर्णय पर आधारित था इसलिए अधिकारी का मानना ​​था कि सीधे सर्वोच्च न्यायालय से राहत मांगना अधिक उचित होगा।

इसके बाद पीठ ने टिप्पणी की कि न्यायिक कार्यवाही में उच्च न्यायालयों द्वारा पूर्ण न्यायालय के निर्णयों को कई बार रद्द किया जा चुका है। इसके अतिरिक्त न्यायालय ने सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत आवेदन के माध्यम से निलंबन का विवरण मांगने पर आपत्ति जताई।

इसमें कहा गया कि “किसी वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी से यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वह सूचना प्राप्त करने के लिए आरटीआई का सहारा लें। वे एक अभ्यावेदन प्रस्तुत कर सकते थे।”

याचिका पर विचार करने से इनकार करते हुए पीठ ने न्यायिक अधिकारी को निलंबन आदेश को रद्द करने की मांग करते हुए उच्च न्यायालय के समक्ष अभ्यावेदन प्रस्तुत करने की स्वतंत्रता दी।

इसके लिए पीठ ने हाई कोर्ट को निर्देश दिया और चार हफ्ते का समय तय किया।

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अमरेन्द्र यादव
लखनऊ विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातक करने के बाद जामिया मिल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई। जागरण न्यू मीडिया में बतौर कंटेंट राइटर काम करने के बाद 'बोले भारत' में कॉपी राइटर के रूप में कार्यरत...सीखना निरंतर जारी है...

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