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‘घर संभालने वाली महिलाएं नेशन बिल्डर’, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- उनके काम की अनुमानित आय 30,000 रुपये महीना

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि सड़क दुर्घटना में मौत होने पर मुआवजा तय करते समय, उनके बिना वेतन वाले घरेलू काम का मूल्य कम से कम ₹30,000 प्रति माह के हिसाब से आंका जाना चाहिए।

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फोटोः समाचार एजेंसी आईएएनएस

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (11 जून) को कहा कि घर संभालने वाली महिलाओं को “राष्ट्र निर्माता” के तौर पर पहचान मिलनी चाहिए। अदालत ने फैसला सुनाया कि सड़क दुर्घटना में मौत होने पर मुआवजा तय करते समय, उनके बिना वेतन वाले घरेलू काम का मूल्य कम से कम ₹30,000 प्रति माह के हिसाब से आंका जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला पंजाब में मोटर दुर्घटना के एक मामले में दायर अपील पर आया। इसमें नवंबर 2001 में सड़क दुर्घटना में रेशमा नाम की महिला की मौत हो गई थी। उनके पति और तीन बच्चों ने मुआवजे के लिए मोटर एक्सीडेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल (MACT) में अर्जी दी। ट्रिब्यूनल ने 2003 में मुआवजा तो दिया लेकिन वे मुआवजे की रकम बढ़वाने के लिए हाई कोर्ट गए। एमएसीटी ने 2.42 लाख रुपये का मुआवजा तय किया था।

घर संभालने वाली महिलाएं हैं नेशन बिल्डर: सुप्रीम कोर्ट

अपील पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने मुआवजे की रकम बढ़ाकर 7.5% ब्याज के साथ ₹8.43 लाख कर दी और साथ ही भुगतान में देरी होने पर ज्यादा ब्याज दर का प्रावधान भी किया। परिवार इस राशि से संतुष्ट नहीं था और सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन.कोटिश्वर की पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी। पीठ ने गृहिणी के बिना पैसे वाले कामों की आर्थिक अहमियत पर जोर दिया और कहा कि ‘होममेकर’ (घर संभालने वाली) शब्द का मतलब अब ‘नेशन बिल्डर’ (राष्ट्र निर्माता) होना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की कि किसी गृहिणी के योगदान को केवल पैसों में मापना बेहद कठिन है। वह परिवार की रीढ़ होती है और उसके काम का मूल्य पारंपरिक आय के आधार पर नहीं आंका जा सकता।

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सुनवाई के दौरान पीठ ने आगे कहा “घरेलू महिलाएं घर में योगदान देती हैं। वे राष्ट्र निर्माता हैं। वे राष्ट्र का निर्माण करती हैं। आप उस योगदान का आकलन कैसे करेंगे और उसे पैसे में कैसे बदलेंगे? ‘होममेकर’ शब्द का मतलब अब ‘नेशन बिल्डर’ माना जाएगा।”

कोर्ट ने अपने फैसले में आगे कहा कि उसने निर्देश जारी किए हैं और उम्मीद व भरोसा जताया है कि सभी हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस इस मामले पर नजर रखेंगे। फैसले का मुख्य हिस्सा सुनाते हुए जस्टिस करोल ने कहा कि “हमने एक नया सिद्धांत बनाया है और तय किया है कि घर की देखभाल न हो पाने से होने वाले नुकसान की कीमत कम से कम 30,000 रुपये प्रति माह आंकी जानी चाहिए। यह राशि ‘प्रणय सेठी केस’ में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के तहत मिलने वाले अन्य सभी लाभों के अतिरिक्त होगी।”

गृहिणियों के अवैतनिक योगदान को मान्यता

पीठ ने आगे कहा कि घरेलू देखभाल की हानि को मुआवजे के एक अतिरिक्त मद के रूप में माना जाना चाहिए। यह परिवारों और समाज के लिए गृहिणियों के महत्वपूर्ण लेकिन अक्सर अवैतनिक योगदान को मान्यता देता है।

अदालत ने माना कि गृहिणियों के लिए पहले तय की जाने वाली काल्पनिक आय बहुत कम थी। इसके चलते उनके योगदान का सही मूल्यांकन नहीं हो पाता था। इसलिए अब ऐसे मामलों में गृहिणी की न्यूनतम मासिक आय 30,000 रुपए मानी जाएगी। इस राशि में हर तीन साल में 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी भी की जाएगी। इसी आधार पर अदालत ने मृतक महिला के योगदान की पुनर्गणना करते हुए कुल मुआवजा 62.77 लाख रुपए तय किया।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में मोटर दुर्घटना मामलों के लंबे समय तक लंबित रहने पर भी चिंता जताई। अदालत ने पाया कि ऐसे मामलों की अपीलें हाईकोर्ट में औसतन आठ साल और ट्रिब्यूनल में लगभग छह साल तक लंबित रहती हैं। अदालत ने सभी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों से पुराने मामलों को प्राथमिकता देने और जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त बेंच गठित करने का अनुरोध किया है।

साथ ही अदालत ने निर्देश दिया कि दुर्घटना दावा याचिकाओं के साथ उम्र, आय, दिव्यांगता प्रमाणपत्र और चिकित्सा बिल जैसे आवश्यक दस्तावेज शुरू से ही जमा किए जाएं, ताकि बार-बार स्थगन की जरूरत न पड़े और पीड़ित परिवारों को समय पर न्याय मिल सके। सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले की प्रति सभी हाईकोर्ट और मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरणों को भेजने का भी निर्देश दिया है।

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अमरेन्द्र यादव
लखनऊ विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातक करने के बाद जामिया मिल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई। जागरण न्यू मीडिया में बतौर कंटेंट राइटर काम करने के बाद 'बोले भारत' में कॉपी राइटर के रूप में कार्यरत...सीखना निरंतर जारी है...

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